हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ हर्षचरितम् ल्लगोलाङ्गूललिह्यमानमधुगोलचलितसरघासंघातै रोमाञ्चितमिव दग्ध- स्थलीरूढस्थूलाभीरुकन्दलशतैः शनैश्चण्डिकायतनकाननमतिक्रम्य मल्ल- कूटनामानं ग्राममगात् । तत्र च हृदयनिर्विशेषेण भ्रात्रा सुहृदा च जग- त्पतिनाम्ना संपादितसपर्यः सुखमवसत् । अथापरेद्युरुत्तीर्य भगवतीं भागीरथीं यष्टिगृहकनाम्नि वनग्रामके निशामनयत् । अन्यस्मिन्दिवसे स्कन्धावारमुपमणिपुरमन्वजिरवति कृतसन्निवेशं समाससाद । अतिष्ठच्च नातिदूरे राजभवनस्य । निर्वर्तितस्नानाशनव्यतिकरो विश्रान्तश्च मेखलकेन सह याममात्रा- वशेषे दिवसे भुक्तवति भूपुजि प्रख्यातानां क्षितिभुजां बहूनिशिबिरसंनि- वेशान्वीक्षमाणः शनैः शनैः पट्टबन्धार्थमुपस्थापितैश्च डिण्डिमाधिरोहणा- याहूतैश्चाभिनवबद्धैश्च विद्वेषोपार्जितैश्च कौशलिकायतैश्च प्रथमदर्शनकु- वितमिवेत्युत्प्रेक्षा । जिह्वैव लता, दीर्घत्वात् । गोलाङ्गुलः कृष्णमुखो वानरः । मधुगोलं माक्षिककरण्डः । सरघा मधुमक्षिकाः । अभीरुः शतावरी । कन्दलानि नवनालानि । भ्रात्रेति चन्द्रसेनेन । हृदयत्याद्यभिप्रायेण सुखमित्युक्तम् । उपमणिपुरं पत्तनभेदम् । अन्वजिरवति नदीभेदनिकटे । संनिवेशो गृहादिरचना । निर्वर्तितस्त्यादौ राजद्वारमीदृशमगमदिति संबन्धः । निर्वर्तितेत्यादि । राज- दर्शनेऽकातरत्वमात्मनः प्रतिपादयति । वारणेन्द्रैः श्यामायमानमिति राजद्वारवि- वहाँ कहीं जल का ठिकाना न था और न घनी छाया वाले पेड़ ही मिले । कहीं-कहीं वन के वृक्षों पर कात्यायनी की मूर्तियाँ खुदी हुई थीं जिन्हें रास्ते में आते जाते पथिक नमस्कार करते थे । वह वन सूख गया था, फिर भी श्वापद जन्तुओं की लपलपाती जीभें उस वन को मानों पल्लवित कर रही थीं । भालू और लंगूर मधुमक्खियों के छत्ते को चाटने लगते तो ये भन्नाकर उड़ने लगतीं मानों वन इस दृश्य से पुलकित हो रहा था । दावाग्नि से जली हुई वनभूमि में सतावर के पौधे इस तरह निकल आये थे मानों वह जंगल रोमाञ्चित हो उठा हो । मल्लकूट ग्राम में बाण के परममित्र और भाई जगत्पति ने उसकी आवभगत की और सुखपूर्वक ठहराया । दूसरे दिन बाण ने गङ्गा पार कर यष्टिगृहक नाम के वन गाँव में रात बिताई । फिर राप्ती ( अजिरवती ) के किनारे मणिपुर नामक ग्राम के समीप छावनी में पहुँचा और राजभवन के पास ही ठहरा । बाण ने स्नान-भोजन आदि से निवृत्त होकर विश्राम किया और जब एक पहर दिन रहा और हर्ष भी भोजन आदि से निवृत्त हो चुके थे तब मेखलक को साथ लेकर उनसे