हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उच्छ्वासः ६३ तूहलोपनीतैश्च नागवीथीपालप्रेषितैश्च पल्लीपरिवृढढौकितैश्च स्वेच्छायुद्ध- क्रीडाकौतुकाकारितैश्च दूतसंप्रेषणप्रेषितैश्च दीयमानैश्चाच्छिद्यमानैश्च मुच्य- मानैश्च यामावस्थापितैश्च सर्वद्वीपविजिगीषया गिरिमिरिव सागरसेतुबन्ध- नार्थमेकीकृतैर्ध्वजपटपटुपटहशङ्खचामराङ्गरागरमणीयैः पुष्याभिषेकदिव- तैरिव कल्पितैर्वारणैन्द्रैः श्यामायमानम् , अनवरतचलितखुरपुटप्रहतमृद- ङ्गैश्च नर्तयद्भिरिव राजलक्ष्मीमुपहसद्भिरिव सृक्विपुटप्रसृतफेनाट्टहासेन जबजडजङ्घां हरिणजातिमाकारयद्भिरिव संघट्टहेतोर्हर्षहेषितेनोच्चैःश्रव- समुत्पतद्भिरिव दिवसकररथतुरगरुषा पक्षायमाणमण्डनचामरमालैर्ग- गनतलं तुरङ्गेस्तरङ्गायमाणम्, अन्यत्र प्रेषितैश्च प्रेष्यमाणैश्च प्रेषितप्रतिनि- वृत्तैश्च बहुयोजनगमनगणनसंख्याक्षरावलीभिरिव वराटिकावलीभिर्घटित- मुखमण्डनकस्तारकितैरिव संख्यातपच्छेदरुणचामरिका रचितकर्णपूरैः शोषणम् । डिण्डिमः पटहः । विक्षेपः करः । नागवीथी हस्तिभूः । पल्ली शवरवसतिः । परिवृढः स्वामी । आकारितैराह्वानैः । आच्छिद्यमानैरपहियमाणैः । यत्र दिने पुष्यनक्षत्रे राजा स्नाति तद्दिनं पुष्याभिषेकाख्यम् । श्यामायमानं कालत्वमाप- द्यमानम् । अथ च दिवसः श्यामायति रात्रिवदाचरतीति वक्रोक्तिः । अभि- षेकदिनानि च ध्वजादिरम्याणि । अनवरतत्यादौ । तुरङ्गैस्तरङ्गायमाणमिति संबन्धः । मृदोऽङ्गं मृदङ्गश्च मुरजः । सृक्किण्योष्ठपर्यन्तौ । अन्यत्रेत्यादौ—क्रमेलककुलैः कपि- मिलने के लिए चला । वह राजाओं के अनेक शिविरों को देखता हुआ धीरे-धीरे राजद्वार के पास आया । राजद्वार पर बड़े-बड़े हाथी झूम रहे थे, कुछ पट्टबन्ध के लिए लाए गए, कुछ धौँसे चढ़ाने के लिए लाए गए, कुछ नए पकड़ कर लाए हुए, कुछ कर रूप में प्राप्त, कुछ नागवीथी या नागवन के अधिपतियों द्वारा भेजे गए, शबर बस्तियों के सरदारों द्वारा भेजे हुए, कुछ गजयुद्ध की क्रीडाओं और खेल-तमाशों के लिए बुलाए गए या स्वेच्छा से दिए गए, कुछ तो बलपूर्वक छीने गए, कुछ बंधन से मुक्त हुए और कुछ पहरे के लिए रखे गए थे। मानो समस्त द्वीपों पर विजय पाने की इच्छा से समुद्रों में पुल बाँधने के लिए पहाड़ के पहाड़ जुटाए गए हों। ध्वजपट, पटह, शंख, चामर, अंगराग आदि से सजे हाथी दीख पड़े, मानों अभिषेक के पुण्य दिन ही एकत्र हो गए। वहाँ घोड़े लहरों के समान मचल रहे थे। उनके चंचल खुरों की टाप हमेशा मृदंग की आवाज में जमीन पर पड़ रही थी मानों राजलक्ष्मी को नचा रहे थे। थूथून तक बहते हुए मुँह के गाज के अट्टहास से वे मानों वेग से विडंडित जाँघ वाले हरिणों का उपहास कर रहे थे। प्रसन्नता से इस तरह हिनहिना रहे थे मानों होड़ के लिए इन्द्र के घोड़े उच्चैःश्रवा को पुकार रहे हों। सूर्य के रथ के घोड़ों की मानों ईर्ष्या से वे