हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ हर्षचरितम् क्षैर्दोलयमानम्, अपि च हंसयूथायमानं करिकर्णशङ्खैः, कल्पलता- वनायमानं कदलिकाभिः, माणिक्यवृक्षकवनायमानं मायूरातपत्रैः, मन्दाकिनीप्रवाहायमानमंशुकैः, क्षीरोदायमानं क्षौमैः, कदलीवनायमानं मरकतमयूखैः, जन्यमानान्यदिवसमिव पद्मरागबालातपैः, उत्पद्यमाना- परम्बरमिवेन्द्रनीलप्रभापटलैः, आरभ्यमाणापूर्वनिशमिव महानीलमयू- खान्धकारैः, स्यन्दमानानेककालिन्दीसहस्रमिव गारुडमणिप्रभाप्रतानैः, अङ्गारकितमिव पुष्परागरश्मिभिः, कैश्चित्प्रवेशमलभमानैरधोमुखैश्चरण- नखपतितवदनप्रतिबिम्बनिभेन लज्जया स्वाङ्गानीव विशद्भिः कैश्चिदङ्गु- लीलिखितायाः क्षितेर्विकीर्यमाणकरनखकिरणकदम्बव्याजेन सेवाचाम- कलेरियं कालेयी। सर्वत्राभिकलिभ्यां ढक्। पद्मरागा इव बालातपास्तैः। महानीला गरुडमणयः। पुष्परागाश्च मणिभेदाः। कैश्चिदित्यादौ शत्रुमहासामन्तैः समन्तादा- सेव्यमानमित्यन्वयः। सेवेत्यादि। स्वयेदानीं चामरग्रहणेन सेवनीय इति तेषां हि क्षितिः कलत्रमतस्तद्द्वारेण सेवनेच्छा। 'हारस्य यो मध्यमणिस्तरलंः स प्रकी- उनके फूल चारों ओर खिल जाते हैं, मानों आकाश को मृणालसूत्रों से भर रहे थे। हाथी के कानों के शंख हंससमूह की भाँति लग रहे थे। केले के खम्भे इस तरह लगाए गए थे कि राजद्वार कल्पलतावन के समान लग रहा था। नाचते हुए मोर के बर्हमंडल की आकृति वाले मायूर आतपत्रों से वह स्थान माणिक्य के वृक्षों का वन हो रहा था। वहाँ अंशुक इस तरह लहरा रहे थे कि आकाश गंगा का प्रवाह बन गया। क्षौम वस्त्रों से क्षीर- समुद्र का दृश्य उत्पन्न हो रहा था। मरकत मणियों की हरी हरी किरणें इस तरह फैल गई थीं मानों वह केले का वन हो। पद्मराग मणियों की लाल-लाल किरणें उषाकाल की लाली के समान छिटक रही थीं मानों दूसरा दिन होने लगा हो। इन्द्रनीलमणियों की नीली प्रभा के फैलने से दूसरा आकाश उत्पन्न हो गया ऐसा लग रहा था। महानील मणियों की किरणें इस तरह फैल रही थीं मानों कोई अपूर्व रात्रि ही उत्पन्न होने वाली हो। गारुड मणियों की प्रभा इस प्रकार फैलती जा रही थी मानों यमुना के हजारों प्रवाह चल पड़े हों। पुष्पराग मणियों की रश्मियाँ अंगारे की भाँति लग रही थीं। भुजनिर्जित अनेक शत्रु महासामन्त वहाँ उपस्थित थे। कुछ तो भीतर प्रवेश नहीं पाने के कारण मुख नीचा किए हुए खड़े थे, चरण के नखों पर उनका मुख प्रतिबिम्बित हो रहा था, मानों वे लज्जा के कारण अपने ही अङ्गों में निमटते जा रहे थे। कुछ बैठे बैठे उँगलियों से जमीन पर लिख रहे थे। अपने नख के फैलते हुए किरणजाल से महाराज की सेवा में मानों