हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उच्छ्वासः ६७ राणीबार्पयद्भिः कैश्चिदुरःस्थलदोलायमानेन्द्रनीलतरलप्रभापट्टैः स्वामि- कोपप्रशमनाय कण्ठबद्धकृपाणपट्टैरिव कैश्चिदुच्छ्वाससौरभभ्राम्यद्भ्रम- रपटलान्धकारितमुखैरपहृतलक्ष्मीशोकधृतलम्बश्मश्रुभिरिवान्यैः शेखरोड्डी- यमानमधुपमण्डलैम्रैः प्रणामविडम्बनाभयपलायमानमौलिभिरिव निर्जितै- रपि सुसंमानितैरिवानन्यशरणैरन्तरान्तरा निष्पततां प्रविशतां चान्तर- प्रतीहाराणामनुमार्गप्रधावितानेकार्थिजनसहस्राणामनुयायिनः पुरुषानश्रा- न्तैः पुनः पुनः पृच्छद्भिः 'भद्र ! अद्य भविष्यति भुक्तास्थाने दास्यति दर्शनं परमेश्वरः, निष्पतिष्यति वा बाह्यां कक्षाम्' इति दर्शनाशया दिवसं नयद्भिर्भुजनिर्जितैः शत्रुमहासामन्तैः समन्तादासेव्यमानम् , अन्यैश्च प्रतापानुरागगतैर्नानादेशजैर्महामहीपालैः प्रतिपालयद्भिर्नरपतिदर्शनकाल- मध्यास्यमानम् , एकान्तोपविष्टैश्च जैनैराहतैः पाशुपतैः पाराशरिभिर्वर्णि- भिः सर्वदेशजन्मभिश्च जनपदैः सर्वाम्भोधिवेलावनवलयवासिभिश्च म्ले-
र्त्तितः' । चपलो वा । शेखरं मुण्डमालिकम् । मौलयः केशाः । निर्जितैः पुरस्कृत- न्यक्कृतैः, राजसेवाप्राप्तैः, संमानितैः पूजितैरिव । अनुयायिन इति । तेषां स्वयं सुलभत्वात् । जैनैः शाक्यैः । आर्हतैर्नग्नक्षपणकैः । पाशुपतैः शैवभेदैः । पाराशरेण
चँवर अर्पित कर रहे हों । कुछ के वक्ष पर लटकते हुए इन्द्रनील की प्रभा तरल हो रही थी मानों उन्होंने महाराज के क्रोध को शान्त करने के लिए अपने-अपने [कंठ में कृपाण बाँध लिए थे । कुछ के मुख पर उच्छ्वास की सुगन्ध से भौंरे छा गए थे, मानों लक्ष्मी के अपहरण कर लिए जाने के शोक से उन्होंने बड़ी लम्बी दाढ़ी बढ़ा रखी थी। उनके मस्तक के ऊपर भौंरे मँडरा रहे थे, मानों प्रणाम करने के लिए झुकने के तिरस्कार के भय से उनके धम्मिल्ल उड़े जा रहे थे । वे पराजित थे, फिर भी सम्मानित के समान थे । उनका कोई दूसरा आश्रय नहीं था । बीच-बीच में अन्तःपुर से द्वारपाल निकलते तो उनके पीछे-पीछे अनेक याचक दौड़ पड़ते, आगे जानेवाले पुरुषों से ये शत्रुसामन्त बिना थकते पूछते रहते थे कि 'भद्र, सजाए जाते हुए भुक्तास्थानमंडप में सम्राट् आज दर्शन देंगे या वे बाहरी आस्थानमंडप में निकल कर आएँगे ?' इस प्रकार सम्राट् के दर्शनों की आशा में दिन बिताते थे । भिन्न-भिन्न देशों के दूसरे राजे जो प्रताप के अनुराग से पधारे हुए थे, महाराज के दर्शनों के अवसर की प्रतीक्षा में वहाँ विराजमान थे । एक ओर बौद्ध, जैन, शैव, संन्यासी, ब्रह्मचारी, अनेक देशों के लोग, समुद्रों के तटवर्ती जंगलों के निवासी म्लेच्छ, अनेक देशों के आए हुए राजदूत वहाँ वर्तमान थे । वह राजद्वार मानों प्रजा- ७ ह० च०