हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 148, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उच्छ्वासः १०३ जनानलरद्यमाणैरिवोपरिविततवितानैः, पुरः पूजिताभिमतदेवतैः, भूपाल- वल्लभैस्तुरङ्गैरारचितां मन्दुरां विलोकयन् , कुतूहलाक्षिप्तहृदयः किंचिदन्त- रमतिक्रान्तो हस्तवामेनात्युन्नतया निरवकाशमिवाकाशं कुर्वाणम् , महता कदलीवनेन परिवृतपर्यन्तं सर्वतो मधुकरमयीभिर्मदस्स्रुतिभिर्नदीभिरिवाप- तन्तीभिरापूर्यमाणम् , आशामुखविसर्पिणा बकुलवनानामिव विकसतामा- मोदेन लिम्पन्तं घ्राणेन्द्रियं दूरादव्यक्तमभिधिष्ण्यागारमपश्यत् । अपृच्छच्च- 'अत्र देवः किं करोति ?' इति । असावकथयत्—'एष खलु देवस्यौप- वाह्यो बाह्यं हृदयं जात्यन्तरित आत्मा बहिश्चराः प्राणा विक्रमक्रीडा- सुहृद्दर्पशात इति यथार्थनामा वारणपतिः । तस्यावस्थानमण्डपोऽयं नकं रक्तकम् । देवतात्र गोविन्दः । आरचितां भूषिताम् । हस्तवामशब्दो भाष्य- कृता वामहस्तमार्ग इत्यर्थे धृतः । बकुलेत्यादिना प्राशस्त्यमेव पोषयति । तदुक्तम्- 'मालतीमुक्तपुंनागबकुलोपमसौरभम् । दानं पिष्टाम्बुसदृशं मुञ्चञ्छु ते तं तु शीतलम् ॥' इति । श्लैष्मिका दानलक्षणम् । एवं च धर्मलक्षणे तु प्रकोपसमयेऽपि तथाविधम- दवर्णनया श्लेषप्रकृतिकत्वं प्रकाशयति—'श्लेषप्रकृतिकं श्लेष्ठं भद्रजातिं तथैव च' इति च शास्त्रकृता दर्शितम् । धिष्ण्यं मण्डपम् । औपवाह्यः क्रीडा हस्ती । यस्मात्केचन संनाह्याः केचिद्भद्रजातीया उभयस्वभावा भवन्ति करिणः । अस्य च यद्यपि विक्रम- क्रीडासुहृदित्यनेन दर्पशात इति यथार्थनामा वारणपतिरित्यनेन च सांनाह्यत्व- मेवोक्तम् , तथाप्यौपवाह्य इति कथनेऽर्थद्वयेऽपि योग्यत्वाद्वद्रजातीयत्वं चास्य खरोंच रहे थे । सामने घास के पड़ते ही चंचल होकर फटकने लगते थे । सईसों की डपटान सुन कर मारे डर के उनको पुतलियाँ दीन भाव से फिरने लगती थीं। उनके अङ्ग मानों केसर से मले गए थे । उनके समीप सदा नीराजन अग्नि जलती थी । उनके ऊपर चँदोवे तने हुये थे । उनके सामने अभीष्ट देवता पूजे गये थे । मन्दुरा को देखकर बाण का हृदय कुतूहल से भर गया और कुछ आगे बढ़कर बायीं ओर अव्यक्त रूप में दूर ही से हाथीसाल को देखा, जो आकाश में बहुत ऊँचा उठा हुआ था । केलों के वन से वह चारों ओर घिरा हुआ था । सब ओर से नदियों की भाँति बहती हुई मद की धारायें थीं जिन पर भौंरे लुझ रहे थे । उसकी गन्ध दिशाओं में इस प्रकार फैल रही थी मानों मौलसिरी के फूलने की गन्ध नाक में भर रही हो । बाण ने मेखलक से पूछा—'यहाँ महाराज क्या करते हैं ?' उसने कहा—'यह महाराज का क्रीड़ाहस्ती दर्पशात है, जिसे वे युद्ध में साथ ले जाते हैं । यह हाथी नहीं बल्कि महाराज का बाहरी हृदय है, दूसरे स्वरूप में आत्मा है, बहिश्चर प्राण है।' बाण ने उससे कहा—'भद्र, मैंने दर्पशात का नाम