हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ हर्षचरितम् तैर्लोहपीठकठिनखुरमण्डलैः, अतिजवतृटनभयादनिर्मितान्त्राणीवोदराणि वृत्तानि धारयद्भिः, उच्चद्रोणीविभज्यमानपृथुजघनैः, जगतीदोलायमान- बालपल्लवैः, कथमप्युभयतो निखातदृढभूरिपाशसंयमननियन्त्रितैः, आय- तैरपि पश्चात्पाशबन्धपरवशप्रसारितैकाङ्घ्रिभिरायततरैरिवोपलक्ष्यमाणैः, बहुगुणसूत्रग्रथितश्रीबागण्डकैः, आमीलितलोचनैः, दुर्वारसश्याम लफेन- लवशबलान्दंशनगृहीतमुक्तान्फरफरितत्वचः कण्डूजुषः प्रदेशान्प्रचाल- यद्भिः, सालसवलितवालधिभिः, एकशफविश्रान्तिश्रमस्रस्तशिथिलितज- घनार्धैः, निद्रया प्रध्यायद्भिblack/श्न, स्खलितहुंकारमन्दमन्दशब्दायमानैश्च, ताडितखुरधरणीरणितमुखरशिखरखुरलिखितदमातलैर्घासमभिलषद्भिblack/श्च, प्रकीर्यमाणयवसमासरसमत्सरसमुद्भूतक्षोभैश्च, प्रकुपितचण्डचडालहु- ङ्कारकातरतरलतारकैश्च, कुङ्कुमप्रमृष्टिपिञ्जराङ्गतया सततसन्निहितनीरा- अस्थूलप्रगुणप्रस्थितैर्निमांसऋजुजङ्घैः । उक्तं च—'जङ्गे वृत्ते दीर्गे निर्मांसे पूजिते निगूढसिरे' इति । मण्डलशब्देन वृत्तत्वमुच्यते । तदुक्तम्—'सुरास्तुरङ्गे वृत्ताश्च ह्रस्वाश्च सुदृढा घनाः' इति । तथा शिलातलगिभैः खुरैरिति । उदराणीति । तदुक्तम्- 'उदरं वृत्तमगुरु मृगस्योपचितं तथा । अच्छिद्रह्रस्ववृत्ताल्पसमकुक्षि च पूजितम् ॥' इति । द्रोणी शोभाविशेषः । यदाह—'पृष्ठोरु कटिपार्श्वस्थमांसोत्कर्षणनिर्मिता । द्रोणिकेति प्रशंसन्ति शोभा वाजिनि पश्चमी ॥' इति । बाला एव पल्लवाः । उभयत इति । अत्युद्दामवेगवत्त्वादुभयत्र पाशबन्धः । गण्डको भूषणभेदः । फरफरिताः पुनः पुनरीषत्कम्पिताः । वालधिः पुच्छः । शफः समुद्रयुक्तः पादः । खुरधरणी खुराद्यःकाष्ठपट्टाच्छादिता भूः । चण्डालोऽश्वपालः । प्रमृष्टिः प्रमार्जनम् । विता- से रहित और गोल उदर भाग था, पुट्ठे चौड़े और मांसल होने से उठे हुए थे, पूँछ के बाल जमीन तक लटक रहे थे। किसी किसी प्रकार अगाड़ी और पिछाड़ी दो रस्सियों से कसकर उन्हें नियन्त्रण में रखा गया था। वे लम्बे थे, फिर भी पिछाड़ी बाँधने से उनका एक पैर बिलकुल फैल गया था, इससे और भी उनकी लम्बाई बढ़ गई थी। उनके गले का गण्डक नामक अलंकार तिगुने चौगुने सूत में गुथा हुआ था। वे कुछ कुछ झपकी ले रहे थे। खुजान मिटाने के लिये अपने शरीर में दाँतों से रह-रहकर कोड़ते रहते और त्वचा को फरफराते रहते थे। उन स्थानों पर मुँह की दूब के रस की गाज लग-लग जाती थी। कभी कभी पूँछ टेढ़ी करते थे। एक ही पैर की टेक लेकर विश्राम करने से वे थक जाते और उनकी जाँघ टटाने लगती। नींद में कुछ सोच रहे थे। हूँककर धीरे धीरे हिनहिनाने लगते थे। घास की इच्छा से खुर पटककर धरती को