भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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द्वितीय उच्छ्वासः १०७ वनानीवोपभुक्तानि पुनःपुनः करटाभ्यां बहलमदामोदव्याजेन विसृज- न्तम्, अहर्निशं विभ्रमकृतहस्तस्थितिभिरर्धखण्डितपुण्ड्रेक्षुकाण्डकण्डूयन- लिखितैरलिकुलवाचालितैर्दानपट्टकैरिवलभमानमिव सर्वकाननानि करिप- तीनाम्, अविरलोदबिन्दुस्यन्दिना हिमशिलाशकलमयेन विभ्रमनक्षत्र- मालागुणेन शिशिरीक्रियमाणम्, सकलवारणेन्द्राधिपत्यपट्टबन्धबन्धुर- मिवोच्चैस्तरां शिरो दधानम्, मुहुर्मुहुः स्थगितापावृतदिङ्मुखाभ्यां कर्णता- लतालवृन्ताभ्यां वीजयन्तमिव भर्तृभक्त्या दन्तपर्यङ्किकास्थितां राजल- सतां मतः ॥' इति । करटाभ्यां गण्डाभ्याम् । अर्धेत्यादिनेक्षुकाण्डकस्य लेखनीसा- दृश्यमाह । लिखितैः कृतलेखैरप्यलिकुलेषु सत्सु वाचालितशब्दयोगो येषामित्यने- नालिकुलस्य लिप्यक्षररूपतां ध्वनयति । लिप्यक्षरेषु च सत्सु पाठ्यमानेषु वाचा- लता । दानपट्टकलिखितैः किंचिद्धि लभ्यते । अक्षरपाटिकाैश्च तेषां हस्तस्थितिर्न क्रियते । तानि च वाच्यन्ते । यद्वा स्वहस्तेनाक्षरकरणं हस्तस्थितिः । हिमशिला वातवन्नीभूतं हिमम् । केचित्तु 'हिमानि हिमशकलानि चन्द्रकान्ताः' इत्याहुः । हिमस्य च तदा वर्णनानुचितत्वात् पर्वतेभ्यो हिमानयनं सुलभमेवेति पूर्वोक्तमेव श्रेष्ठम् । यतश्चन्द्रकान्तानां दिवा स्रुतिर्न भवतीति । नक्षत्रमाला हस्त्याभरणभेदः । उच्चैस्तरामिति । उच्चं हि शिरः करिणः शस्यते । यदुक्तम्—'समं महत् पूर्ण च नातिस्तब्धोञ्चमस्तकम् । नावानं नातिपृथुलं वितानावग्रहं मृदु ॥' इति । दन्तावेव तदवस्थानसमुचितत्वात् । पर्यङ्किका च दन्तमयः पर्यङ्कः आस्त इति श्लेषः । आय- व्याज से वह उन्हीं की गन्ध को फैला रहा था । १ उसे मानों राजकीय दानपट्ट मिले थे जिनसे हाथियों के जंगलों को अपने वश में कर रखा था । उसके द्वारा तोड़े गये इक्षुकांड की लेखनी से उन पट्टों पर अक्षर खोदे गये थे, उन पर सजावट के साथ हस्ताक्षर भी बनाये गये थे और भौंरे मानों उन्हें पढ़कर सुना रहे थे । नक्षत्रमाला नाम के आभूषण से वह विभूषित था जो मानों बर्फ के टुकड़ों से बनाया गया था और उससे निरन्तर जलबिन्दु के रूप में प्रभा निकल रही थी । उसका मस्तक निम्नोन्नत और ऊँचा था मानों उसने समस्त गजों के आधिपत्य का पाट बाँध लिया था । बारबार उसके कानों के पंखे चलते रहते थे जिससे दिशायें ढकती और खुलती रहती थीं । इस प्रकार वह अपने स्वामी की भक्ति से दाँत के पलंग पर बैठी हुई राजलक्ष्मी को पंखा झल रहा था । उसके पृष्ठवंश से १. उस समय सहकार, कपूर, कङ्कोल, लवंग, पारिजातक आदि सुगन्धद्रव्य थे जिनसे मुखवास बनाया जाता था, उसी की गन्ध दर्पशात के मदजल में थी, क्योंकि जंगलों में उसने भी इनके वृक्षों का उपभोग किया था ।