हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ हर्षचरितम् दर्पम्, आयतवंशक्रमांगतेन गजाधिपत्यचिह्नेन चामरेणेव चलता बाल- धिना विराजमानम्, स्वच्छशिशिरशीकरच्छलेन दिग्विजयपीताः सरित इव पुनःपुनर्मुखेन मुञ्चन्तम्, क्षणमवधानदाननिःस्पन्दीकृतसक- लावयवानामन्यद्विरदडिण्डिमाकर्णनाङ्गवलनानामन्ते दीर्घफूत्कारैः परिभव- दुःखमिवावेदयन्तम्, अलब्धयुद्धमिवात्मानमनुशोचन्तम्, आरोहाधिरू- ढिपरिभवेन लज्जमानमिवाङ्गुलीलेखितमहीतलं, मदं मुञ्चन्तम्, अवज्ञा- गृहीतमुक्तकवलकुपितारोहाटनानुरोधेन मदतन्द्रीनिमीलितनेत्रत्रिभागम्, कथं कथमपि मन्दमन्दमनादरादाददानं कवलान्, अर्धजग्धतमालपल्लवर- तश्यामलरसेन प्रभूततया मदप्रवाहमिव मुखेनाप्युत्सृजन्तम्, चेलन्तमिव तवंशः, चक्रवंशः, शरवंशः, बालवंशश्चेति चत्वारो वंशाः । तेषु बालवंश आयत एव शास्त्रकृतामभिप्रेतः । तथा च—'यावत्पूरितपार्श्वश्च वंशश्चापलताकृतिः। शुभो ज्ञेयो गजेन्द्राणामायतः कुरुते सुखम् ॥' इति तैरुक्तम् । आयताद्वंशात्क्रमेण गोपु- च्छवदायत इति विग्रहः । समानाहों हि बालधिः शोकं करोति । यदुक्तम्—'वक्रं स्थूलं च हस्वं च पुच्छं कचविवर्जितम् । समानाहं हि नागस्य भर्तुः शोककरं स्मृतम् ॥' इति । वंशं पृष्ठनाभि, कुलं च । क्रम आनुपूर्वी, पारम्पर्यं च । वालधिः पुच्छम् । लज्जमानमिति । यश्च लज्जते स भूमिं लिखति, दर्प चोज्झति । अङ्गुली करिकराग्रावयवः, करशाखा च । तन्द्री आलस्यम्, गाढनिद्रा वा । चलन्तमि- चँवर के समान पूँछ निकली थी जिससे यह स्पष्ट प्रतीत होता था कि वह गजों का अधिपति है। वह अपने मुँह से ठण्डे और सफेद जल के फुहारे बारबार फेंकता रहता था, मानों दिग्विजय के समय सोखी हुई नदियों को उगल रहा हो । वह दूसरे हाथी के डिण्डिम घोष को सुनकर क्षण भर ध्यान से स्थिर होकर खड़ा हो जाता और अन्त में जोर से शीत्कार करते हुए मानों अपना परिभव समझ कर कष्ट व्यक्त करता था और ऐसा अपने आपको सोचता कि उसे युद्ध करने का अवसर नहीं दिया जा रहा है। दूसरे उसकी पीठ पर चढ़ते तो वह अपना परिभव महसूस करता, अपने नखों से जमीन पर कुछ लिखने लगता, लज्जित होता और मद का त्याग करने लगता। उसने कौर लेकर भी अवज्ञा से छोड़ दिया, इसपर महावत ने कुपित होकर खाने के लिये हठ किया तो उसने मद से अलसा कर आँखें बन्द कर लीं। बहुत प्रयत्न करने पर रह-रहकर अनादर से कौर ले लेता था। आधे चबाये हुए तमाल-पल्लव के रस की काली धारा धीरे धीरे मद के समान उसके मुँह से चू रही थी। दर्प से वह मानों काँप रहा था, शौर्य से जीवित १. दृप्तन्त ।