भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 155

११० हर्षचरितम् कालं परिणतिषु, राहुं तीक्ष्णकरग्रहशेषु, लोहिताङ्गं वक्रचारेषु, अलातचक्रं मण्डलश्रान्तिविज्ञानेषु, मनोरथसंपादकं चिन्तामणिपर्वतं विक्रमस्य, दन्तमुक्ताशैलस्तम्भनिवासप्रासादमभिमानस्य, घण्टाचामरमण्डनमनो- हरमिच्छासंचरणविमानं मनस्वितायाः, मदधारादुर्दिनान्धकारं गन्धो- दकधारागृहं क्रोधस्य, सकाञ्चनप्रतिमं महानिकेतनमहंकारस्य, सगण्ड- शैलप्रस्रवणं क्रीडापर्वतमवलेपस्य, सदन्ततोरणं वज्रमन्दिरं दर्पस्य, उच्चकुम्भकूटाट्टालकविकटं संचारिगिरिदुर्गं राज्यस्य, कृतानेकबाणविव- रसहस्रं लोहप्राकारं पृथिव्याः, शिलीमुखशतझांकारितं पारिजात- दिकर्मविपाकेषु च कालमहरादिरूपम् । तीक्ष्णं कृत्वा करेण हस्तेन ग्रहणम्, रविश्च तीक्ष्णकरः । लोहिताङ्गोऽङ्गारकः । वक्रं कुटिलम् । पश्चाच्च मण्डलाकृत्या भ्रान्तेर्भ्र- मणस्य विज्ञानानि कौशलातिशयगतिः । गोमूत्रिकामण्डले त्रिविधा हि गतिः । तन्नालातचक्रमुलमुकचक्रं भ्रमणं करोति । मनोरथसंपादकमिति । शेषे षष्ठीसमासः । ‘कर्मण्यण्’ इति वाऽणि कृते स्वार्थे कः । दन्तौ मुक्ताशैलस्य श्वेतपाषाणस्य स्तम्भा- विव यस्य । अन्यत्र, -दन्तस्थ मुक्ताशैलानां च स्तम्भा यत्र । प्रतिमा दन्तकोशः, देवताकृतिश्च । महानिकेतनं साधुदेवगृहम् । गण्डावेव शैलौ तत्र प्रस्रवणं दाननि- र्यासः । संह तेन वर्तते निर्झरश्च । 'महतो मुक्त्तपाषाणानगण्डशैलान्प्रचक्षते' । संचारी जङ्गमः । यदाह कौटिल्यः—'हस्तिनो हि जङ्गम दुर्गम्' इति । कृतान्यनेकानि बाणैर्विवरसहस्राणि यस्य तम् । प्राकारेषु बाणानुत्स्त्रष्टुं विवरसहस्राणि क्रियन्ते, य इन्द्रकोशा इति चाणक्यादिषु प्रसिद्धाः । भून्न्दनो राजा । 'देवोद्यानं च मंगलग्रह और मण्डलाकार भ्रमण करने में अलातचक्र था। वह विक्रम का चिन्तामणि पर्वत था जो सब प्रकार के मनोरथ को सम्पन्न करने वाला था। वह अभिमान का निवास-भवन था जिसमें मुक्ताशैल के दो खम्भे दाँतों के रूप में लगे थे। वह मनस्विता का स्वेच्छाचारी विमान था जो घण्टा और चँवर के आभूषणों से सुसज्जित था। क्रोध का वह सुगन्धित जल से भरा हुआ धारा-गृह था जिससे मद की धारा के हमेशा बरसते रहने से अन्धकार छाया हुआ था। वह अहङ्कार का महानिकेतन था जिसमें सोने की मढ़ी हुई प्रतिमायें थीं। वह अवलेप का क्रीड़ापर्वत था, उसके गण्डस्थल से झरने के रूप में मद की धारा झरती रहती थी। दर्प का वह वज्रमन्दिर था जिसमें दाँतों के तोरण लगे हुए थे ! वह राज्य का संचरणशील गिरिदुर्ग था, जिसके कुंभ के रूप में ऊपरी भाग में अट्टालक था। वह पृथ्वी की लौह दीवार था जिसमें बाणों की मार से हजारों छिद्र

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 155, कुल 506 में से · BharatKosha