भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पादपं भूनन्दनस्य, तथा च संगीतगृहं कर्णतालताण्डवानाम्, आपान- मण्डपं मधुपमण्डलानाम्, अन्तःपुरं शृङ्गाराभरणानाम्, मदनोत्सवं मदलीलालास्यानाम्, अक्षुण्णप्रदोषं नक्षत्रमालामण्डलानाम्, अकाल- प्रावृट्कालं मदमहानदीपूरप्लवानाम्, अलीकशरत्समयं सप्तच्छद- वनपरिमलानाम्, अपूर्वहिमागमं शीकरनीहाराणाम्, मिथ्याजलधरं गर्जिताडम्बराणां दर्पशातमपश्यत् । आसीच्चास्य चेतसि—'नूनमस्य निर्माणे गिरयो ग्राहिताः परमाणु- ताम् । कुतोऽन्यथा गौरवमिदम् । आश्चर्यमेतत् । विन्ध्यस्य दन्तावादिव- राहस्य करः' इति विस्मयमानमेवं दौवारिकोऽब्रवीत्— 'पश्य,— मिथ्यैवालिखितां मनोरथशतैर्निःशेषनष्टां श्रियं चिन्तासाधनकल्पनाकुलधियां भूयो वने विद्विषाम् । नन्दनम्' । कर्णतालानां ताण्डवानीव ताण्डवानि । अन्यत्र,—लाभप्रधानानि ताण्ड- वानि । मधुपा भ्रमराः, विटाश्च । शृङ्गारः सिन्दूरादिदानम्, रसभेदश्च । अक्षुण्णः परिपूर्णः, अत्रादिनानावृतः, अपूर्वो वा । ग्राहिताः प्रापिताः । मिथ्यैवेति । तस्या निःशेषनष्टत्वात्पुनरभावप्रसङ्गाच्चिः- शेषेत्याद्यभिप्रायेणाह—मनोरथशतैरिति । तस्यां व्यापाररहितत्वाच्छून्यमनस्कत्वा- थे। पृथ्वी के नन्दनवन का वह मानों पारिजात वृक्ष था जिसमें सैकड़ों भौरे झंकार रहे थे । कानों के संचालन रूप नृत्य का वह संगीतगृह था, भौरों का आपानमण्डप था, शृङ्गार और आभरणों का अन्तःपुर था, मदलीला के नृत्य का मदनोत्सव था, नक्षत्रमाला ( एक अलंकार ) का वह कभी नष्ट न होने वाला प्रदोष था, मद की महानदी के प्रवाह का वह असामयिक वर्षाकाल था, सप्तच्छदवन के सौरभोँ का मिथ्या शरत्काल था। जलकण के शीकरों का वह अपूर्व समागम था । गरज-तरज के आडम्बर का वह मिथ्या मेघ था । बाण ने मन में सोचा—निश्चय ही दर्पशात के बनाने में पर्वत के परमाणु लगे होंगे, नहीं तो इसमें इतनी गुरुता कहाँ से आती ? आश्चर्य होता है। यह हाथी क्या है ? दाँतों वाला विन्ध्य पर्वत है। अथवा सूँड से युक्त भगवान् आदिवराह है ।' इस तरह आश्चर्य में पड़े हुए बाण से दौवारिक ने कहा—'देखो— पराजित होकर वनमें भागे हुए शत्रु राजा अपनी समूल नष्ट धन-सम्पत्ति को फिर १. अकाण्डप्रावृट् ।