हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ हर्षचरितम् विषमराजमार्गविनिहितपदस्खलनभियेव संलग्नं धर्मे, सकलभूपालपरि- त्यक्तेन भीतेनेव लब्धवाचा सर्वात्मना सत्येन सेव्यमानम्, आसन्नवार- विलासिनीप्रतियातनाभिश्चरणनखपातिनीभिर्दिग्भिरिव दशभिर्विग्रहावर्जि- ताभिः प्रणम्यमानम्, दीर्घैर्दिगन्तपातिभिर्दृष्टिपातैर्लोकपालानां कृताकृतमिव प्रत्यवेक्षमाणम् मणिपादपीठपृष्ठप्रतिष्ठितकरेणोपरिगमनाभ्यनुज्ञां मृग्य- माणमिव दिवसकरेण, भूषणप्रभासमुत्सारणबद्धपर्यन्तमण्डलेन प्रद- क्षिणीक्रियमाणमिव¹ दिवसेन, अप्रणमद्भिर्गिरिभिरपि² दूयमानं, शौर्यो- ष्मणा फेनायमानमिव चन्दनधवलं लावण्यजलधिमुद्वहन्तमेकराज्यो- र्जितेन, निजप्रतिबिम्बान्यपि नृपचक्रचूडामणिधृतान्यसहमानमिव, दर्पदुःखासिकया चामरानिलनिभेन बहुधेव श्वसन्तीं राजलक्ष्मीं दधानम्, स कयाचिदालिङ्गयेत । विषमोऽशक्यानुष्ठानो नतोन्नतरूपः । मार्गो व्यवहारः, पन्थाश्च । विषमे पथि च स्खलति येन क्वचित्सुलभेन भूयते । लब्धवाचेति । सत्यस्य वागेवाश्रयणीयश्च । सर्वैस्त्यक्तः सन्भीतः संस्थां त्यजामीति वाचं लब्ध्वान्यं सेवते, वारविलासिनी शरीरोपचारचतुरा मुख्यललनाप्रतिबिम्बम् । दशभिरिति । नखानां दिशां च दशसंख्याकत्वात् । मणिपादेति । मणिसंबन्धप्र- तिष्ठानमेव पोषयति । करो हस्तोऽपि । फेनायमानमिति । जलं संतापेन सफेनं एकरस रहने वाले राजर्षि थे। टेढ़े-मेढ़े राजमार्ग (राजा के पद) पर पैर फिसलने के भय से मानों उन्होंने धर्म का आश्रय लिया था। मानों सत्य दूसरे राजाओं से तिरस्कृत होकर डरते-डरते वचन लेकर सब प्रकार से उन्हीं की सेवा में तत्पर था। पास में एक वेश्या (चामरग्राहिणी) खड़ी थी जिसकी परछाइयाँ उनके चरण के नखों पर पड़ रही थीं, मानों दसो दिशाएं शरीर धारण करके उनको प्रणाम कर रही हों। वे दूर तक लम्बे दृष्टिपात करते हुए मानों लोकपालों की गलती-सही देख रहे थे। सूर्य की किरणें उनके मणिमय पादपीठ पर पड़ रही थीं मानों वह आकाश में दूर जाने के लिए सम्राट् की अनुमति पाने की इच्छा से प्रार्थना कर रहा था। आभूषणों की प्रभा से उनके चारों ओर मंडल-सा बन गया था मानों दिन उनकी प्रदक्षिणा कर रहा हो। उन्नत होने के कारण न झुकने वाले पर्वत भी मानों उनसे प्रभावित थे। वह उस चन्दन के सदृश उज्ज्वल लावण्य के समुद्र को धारण कर रहे थे जो उनके ऐकाधिपत्य के बढ़े शौर्य के प्रताप से खौल कर फेनिल हो रहा था। अपने ही प्रतिबिम्बों को जो राजाओं की चूड़ामणियों में पड़ रहे थे, सहन नहीं कर पाते थे। चंवर की हवा के १. मिव गलितोष्मणा दिवसेन । २. भूभृद्भिर्दूयमानं ।