हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 160, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंसकलमिव चतुःसमुद्रलावण्यमादायोत्थितया श्रिया समुपश्लिष्टम्, आभरणमणिकिरणप्रभाजालजायमानानीन्द्रधनुःसहस्राणीन्द्रप्राभृतप्रहि- तानि बिभ्रमानमिव, राज्ञां संभाषणेषु परित्यक्तमपि मधु वर्षन्तम्, काव्यकथास्वपीतमप्यमृतमुद्वमन्तम्, विश्रम्भभाषितेष्वनाकृष्टमपि हृदयं दर्शयन्तम्, प्रसादेषु निश्चलामपि श्रियं स्थाने स्थाने स्थापयन्तम्, वीरगोष्ठीषु पुलकितेन कपोलस्थलेनानुरागसंदेशमिवोपांशु रणश्रियः शृण्व- न्तम्, अतिक्रान्तसुभटकलहालापेषु स्नेहवृष्टिमिव दृष्टिमिष्टे कृपाणे पातय- न्तम्, परिहासस्मितेषु गुरुप्रतापभीतस्य राजकस्य स्वच्छमाशयमिव दशनांशुभिः कथयन्तम्, सकललोकहृदयस्थितमपि न्याये तिष्ठन्तम्, भवति । असहमानमिवेति । कथं सामान्येन समान इति । सकलमित्यादि । सकल- पदेन चतुःशब्देन च शौरेरस्य विशेषमाह । यतो लवणत्वस्य तत्राद्यापि शिष्यमा- णत्वात् । अलं लावण्यमादाय । एकस्माच्च समुद्रादुत्थाय लक्ष्म्या शौरिः समुप- श्लिष्टः । लावण्यं लवणता, सौन्दर्यं च । प्राभृतं ढौकनिकम् । मधु मद्यम्, अमृतं च। विश्रम्भ आश्वासः । उपांश्वप्रकटम् । अतिक्रान्ते कलहे रणे शस्त्राणां स्नेहो दीयते रुधिरादिसलिलनिवारणाय । स्वच्छं निर्मलम् । सुप्रसादमाशयं भावं, प्रकृष्टतापभी- तस्य च स्वच्छो निर्मल आशयो जलाधारो दृश्यते । अत्र प्रतापेत्यादि प्रकरणसाह- चर्यात्स्वच्छतान्यथानुपपत्त्या च जलशब्दं विना जलाशय एव प्रतीयते । न्याये तिष्ठन्तम् । न्यायमनुरुन्धन्तमित्यर्थः । य सर्वेषां हृदयस्थितः स एकस्मिन्नेव तिष्ठ- बहाने दर्प के दुःख से बार-बार साँस ले छोड़ती हुई राजलक्ष्मी को धारण कर रहे थे, मानों चारों समुद्रों के लावण्य को लेकर निकली हुई श्री ने उनका आलिंगन किया था, मानों उपहार के रूप में इन्द्र द्वारा भेजे गए उनके आभरणों की प्रभा से हजारों इन्द्रधनुष बन गए थे, मानों उपहार के रूप में इन्द्र ने भेजा हो। राजाओं के साथ बातचीत के प्रसंग में छुटे हुए भी मधु (मदिरा अथवा मधुरस) की मानों वर्षा कर रहे थे। कविता की गोष्ठियों में न पिए हुए अमृत को भी मानों उगल रहे थे। विस्रंभालाप करते हुए अपने अनाकृष्ट हृदय को मानों दिखा रहे थे। प्रसन्न होकर स्थान-स्थान में अपनी निश्चल श्री को भी अर्पित कर रहे थे। वीरगोष्ठियों में उनके कपोल रोमांच से भर आए थे मानों एकान्त में रणश्री द्वारा भेजे गए अनुरागसंदेश को सुन रहे थे। बड़े-बड़े योद्धाओं की बातचीत के प्रसंग के बाद अपने प्रिय कृपाण पर दृष्टिपात कर रहे थे। हँसी-मजाक में मुस्कुराते हुए वे अपने प्रचंड प्रताप से भीत राजाओं के प्रति दाँत की किरणों से अपने स्वच्छ मनोभाव को व्यक्त कर रहे थे। सारे जन-समूह के हृदय में स्थित होकर भी न्याय में स्थिर थे। उनमें लक्ष्मी का