भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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अगोचरे गुणानामभूमौ सौभाग्यानामविषये वरप्रदानानामशक्य आशि- षाममार्गे मनोरथानामतिदूरे दैवस्यादिश्युपमानानामसाध्ये धर्मस्या- दृष्टपूर्वे लक्ष्म्या महत्त्वे स्थितम्, अरुणपादपल्लवेन सुगतमन्थरोरुणा वज्रायुधनिष्ठुरप्रकोष्ठपृष्ठेन वृषस्कन्धेन भास्वद्विम्बाधरेण प्रसभावलो- कितेन चन्द्रमुखेन कृष्णकेशेन वपुषा सर्वदेवतावतारमिवैकत्र दर्श- यन्तम्, अपि च मांसलमयूखमालामलिनितमहीतले महति महार्हे माणि- क्यमालामण्डितमेखले महानीलमये पादपीठे कलिकालशिरसीव सलीलं विन्यस्तवामचरणम्, आक्रान्तकालियफणाचक्रवालं बालमिव पुण्ड- रीकाक्षम्, क्षौमपाण्डुरेण चरणनखदीधितिप्रतानेन प्रसरता महीं महादेवीपट्टबन्धेनेव महिमानमारोपयन्तम्, अप्रणतलोकपालकोपने-

तीति विरोधः। अरुणो लोहितः, अनूरुश्च। शोभनं गमनं ययोस्तौ मन्थरावूरू यस्य । बुद्धश्च सुगतः। वज्राख्यमायुधं तद्वन्निष्ठुरं कठोरं प्रकोष्ठस्य पृष्ठं यस्य तेन। इन्द्र- श्चास्य वज्रमायुधम् । 'प्रकोष्ठमन्तरं विद्यादरत्निमणिबन्धयोः' । वृषो दान्तः, धर्मश्च । भास्वद्भास्वरम्, रविश्च भास्वान्। बिम्बं फलभेदः, मण्डलं च। अवलोकितं वीक्षि- तम्, बुद्धिभेदश्चावलोकितः। कृष्णः कालः, हरिश्च कृष्णः। कलिकालेति । कलिका- लस्य मलिनत्वादेवमुत्प्रेक्षा । वामपादेन पराभवनीयत्वमेव पोष्यते। कालियो

उत्कर्ष था जो गुणों का अगोचर, सौभाग्य का अभूमि, वरदान का अविषय, आशीर्वचनों का अशक्य, मनोरथों का अमार्ग, भाग्य से भी अतिदूर, उपमानों का अविषय, एवं धर्म का असाध्य था। अपने आप को समस्त देवताओं के अवतार के रूप में प्रकट कर रहे थे, उनके पादपल्लव अरुण (लाल, सूर्य का सारथी अरुण), सुगत (बुद्ध) अर्थात् सुन्दर गमन करने वाले और मन्दगामी दोनों ऊरु, हाथ के गट्ट वज्र के समान (वज्रायुध = इन्द्र) कड़े, वृष (बैल, धर्म) के समान कंधे, चमकते हुए (भास्वत = सूर्य) बिम्बाधर, दृष्टिपात (अवलोकितेश्वर) प्रसन्न, चन्द्र के सदृश मुख एवं केश काले (कृष्ण) थे। सम्राट् का बायाँ पैर महानीलमणि के बहुमूल्य, विविध रत्नों से मंडित पादपीठ पर रखा हुआ था जिसकी गहरी कृष्ण वर्ण की आभा चारों ओर फैल रही थी मानों उन्होंने कलिकाल के सिर पर अपना पैर रख दिया हो। अथवा बालक श्रीकृष्ण ने कालिय नाग के फनों पर आक्रमण किया हो। क्षौम वस्त्र के समान उनके चरणों के नखों की रश्मियाँ फैलती थीं मानों पृथिवी को पट्टबंध द्वारा राजमहिषी के पद पर प्रतिष्ठित कर रहे थे। सम्राट् के दोनों चरण प्रणत होने वाले लोकपालों पर क्रोध के कारण मानो लाल हो रहे थे, राजाओं के मुकुट में पद्मराग