भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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द्वितीय उच्छ्वासः ११७ वातिलोहितौ सकलनृपतिमौलिमालास्वतिपीतं पद्मरागरत्नआतपबिंबं वमन्तौ सर्वतेजस्विमण्डलास्तमयसंध्यामिव धारयन्तावशेषराजककुसुम- शेखरमधुरसस्रोतांसीव स्रवन्तौ समस्तसामन्तसीमन्तोत्तंसस्रक्सौरभ- भ्रान्तैर्भ्रमरमण्डलैरमित्रोत्तमाङ्गैरिव मुहूर्तमप्यविरहितौ संवाहनतत्परायाः श्रियो विकचरक्तपङ्कजवनवासभवनानीव कल्पयन्तौ जलजशङ्खमीन- मकरसनाथतलतया कथितचतुरम्भोधिभोगचिह्नाविव चरणौ दधा- नम्, दिङ्नागदन्तमुसलाभ्यामिव विकटमकरमुखप्रतिबन्धबन्धुराभ्यामु- द्वेल्ललावण्यपयोधिप्रवाहाभ्यामिव फेनाहितशोभाभ्यां कूलाचन्दनद्रुमा- भ्यामिव भोगिमण्डलशिरोरत्नरश्मिरज्यमानमूलाभ्यां हृदयारोपितभूभार- धारणमाणिक्यस्तम्भाभ्यामूरुदण्डाभ्यां विराजमानम्, अमृतफेनपिण्ड- पाण्डुना मेखलामणिमयूखखचितेन नितम्बबिम्बव्यासङ्गिना विमल- पयोधौतेन नेत्रसूत्रनिवेशशोभिनाधरवाससा वासुकिनिर्मोकेणेव मन्दरं द्योतमानम्, अघनेन सतारागणेनोपरिकृतेन द्वितीयाम्बरेण भुव- नागभेदः। पुण्डरीकाक्षमिवि राज्ञो विशेषणम्। तेजस्विनो वीराः, आदित्याश्च। जलजेत्यादीनि महाराजविशेषणानि लक्षणानि। एवमादि च संभवति। मकर- मुखं जानुसंधिः, मकरमुखवच्चिह्नित्तान्तकपोलश्च। उद्वेलतया लावण्यस्य समु- च्छलद्रूपत्वमाह। फेनो रससंतानः, डिण्डीरश्च। भोगिनो नृपाः, सर्पाश्च। फेनवत्तैश्च पाण्डु। मेखला रशना, पर्वतमध्यभूमिश्च। पयो जलम्, क्षीरं च। नेत्रसूत्रं पट्टसूत्रम, मन्थनरज्जुश्च। अघनेन छातेन, अनभ्रेण च। ताराः सूत्रबिन्दवः मणि का आतप वमन कर रहे थे, मानों समस्त तेजस्वियों के अस्त हो जाने के कारण संध्याराग को धारण कर रहे थे, समस्त राजाओं के सिर की पुष्परचित माल के मधुरस बरस रहे थे, सामन्तों के केशविन्यास की माला की सुगन्ध में लुभाए हुए भौरे शत्रुओं के सिर के रूप में चरणों को नहीं छोड़ते, सेवा में लीन लक्ष्मी के निवास के लिए खिले हुए लाल कमलों के भवनों को मानों बना रहे थे, तलवे में कमल, शंख, मछली और मकर के चिह्न थे जिनसे व्यक्त होता था कि उन्होंने चारों समुद्रों के उपभोग के चिह्नों को प्राप्त किया था। उनको दोनों जांघें दिग्गजों के मूसल जैसे दांतों के समान थीं, मकर के विकट मुह के प्रतिबंध से ऊपर-नीचे तरंगित होते हुए लावण्य- समुद्र के दो प्रवाह के सदृश थीं, जिसमें फेनों द्वारा शोभा बढ़ गई थी, कला के चन्दनवृक्ष की भाँति थीं जो भोगिमण्डल (धनिकसमूह, सर्पमण्डल) के सिर के रत्नों की रश्मियों से मूल में रंजित हो रही थीं, मानों हृदय पर पृथिवी के भार को धारण करने के लिए दो बड़े बड़े खम्भे गाड़ दिए गए हों। वासुकि सर्प के केंचुल से मंदराचल