भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 506 में से

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११८ हर्षचरितम् नाभोगमिव भासमानम् , इभपतिदशनमुसलसहस्रोल्लेखकठिनमसृणे- नापर्याप्ताम्बरप्रथिम्ना विविधवाहिनीसंक्षोभकलकलसंमर्दसहिष्णुना कैला- समिव महता स्फटिकतटेनोरुणोरःकपाटेन विराजमानम् , श्रीसरस्वत्यो- रुरोवदनोपभोगविभागसूत्रेणेव पतितेन शेषेणेव च तद्भुजस्तम्भविन्य- स्तसमस्तभूभारलब्धविश्रान्तिसुखप्रसुप्तेन हारदण्डेन परिवलितकन्धरम् , जीवितावधिगृहीतसर्वस्वमहादानदीक्षाचीरेणेव हारमुक्ताफलानां किरण- निकरेण प्रावृतवक्षःस्थलम् , अजजिगीषया बालैर्भुजैरिवापरैः प्ररोहद्भि- र्बाहूपधानशायिन्याः श्रियाः कर्णोत्पलमधुरसधारासंतानैरिव गलद्भिर्भु- वजन्मनः प्रतापस्य निर्गमनमार्गैरिवाविर्भवद्भिररुणैः केयूररत्नकिरणदण्डै- रुभयतःप्रसारितमणिमयपक्षवितानमिव माणिक्यमहीधरम् , सकल- नक्षत्राणि च । अम्बरं वासः, नभश्च । इभपतीत्यादि साधारणम् । अपर्याप्तमम्बरं वासो यस्य तादृक्प्रथिमा यस्य, अम्बरं च खम् । वाहिनी सेना, नदी च । अन्यपर्वतसाधारण्येऽपि छायावत्त्वादुन्नतत्वाच्च कैलासमिवेत्युक्तम् । हारेत्यादिना उरुत्वं काठिन्यमाह । परिवलिता । 'परिवेष्टिता-' इति पाठे व्याप्तेत्यर्थः । अजो हरिः । भुजेत्यादिना सेनादिकृतं नयादिकृतं च प्रतापं व्यवच्छिनत्ति । माणिक्य- पर्वत की शोभा होती है उसी प्रकार उनका अधोवस्त्र अत्यन्त महान्, श्वेत फेन की तरह, मेखलामणि की किरणों से खचित, नितम्बों से सटा हुआ था और उसके ऊपर रेशम का पटका लगा हुआ था। दूसरा वस्त्र उत्तरीय था जिसमें जामदानी की भाँति छोटे छोटे तारे या सूत्रबिन्दु कढ़े हुए थे, वह सम्राट् को उस प्रकार शोभित कर रहा था जैसे तारों-भरा आसमान भुवनाभोग को। जैसे कैलास-पर्वत का स्फटिक तट ऐरावत के दाँतों के हजारों प्रहार से कठिन और चिकना हो गया है और आकाश के लिए जिसका विस्तार पर्याप्त नहीं, एवं विविध नदियों के कोलाहलपूर्ण संमर्द को जो सहता है उसी प्रकार सम्राट् का उरःकपाट भी गजों के दशनों के घात-प्रतिघात से कठिन और कोमल, एवं विविध सेनाओं के कोलाहल में भी क्षुब्ध न होने वाला था। उनका हारदंड कंधे से घिर कर लटक रहा था, मानों वह लक्ष्मी और सरस्वती के क्रम से वक्ष और मुख के उपभोग का विभाग-सूत्र था, अथवा मानों शेषनाग सम्राट् की भुजाओं पर सारे पृथिवी के भार को रख कर विश्राम की नींद ले रहे हों। हार में पिरोई हुई मुक्ताओं की किरणे फैलकर उनके वक्ष में लिपट रही थीं मानों सम्राट् ने जो प्रति पाँचवें वर्ष सर्वस्वदक्षिण महादान दिए हैं उन्हीं के दीक्षावस्त्र हों। उनके बिजाइठ के रत्नों की दंडाकार किरणें उनके दोनों ओर फैल रही थीं, मानों चतुर्भुज

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