भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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द्वितीय उच्छ्वासः ११६ लोकालोकमार्गार्गलेन चतुरुदधिपरिचेपखातशातकुम्भशिलाप्राकारेण सर्वराजहंसबन्धवज्रपञ्जरेण भुवनलक्ष्मीप्रवेशमङ्गलमहामणितोरेणना- तिदीर्घदोर्दण्डयुगलेन दिशां दिक्पालानां च युगपदायतिमपहरन्तम्, सोदर्यलक्ष्मीचुम्बनलोभेन कौस्तुभमणेरिव मुखावयवतां गतस्याधरस्य गलता रागेण पारिजातपल्लवरसेनेव सिञ्चन्तं दिङ्मुखानि, अन्तरान्तरा सुहृत्परिहासस्मितैः प्रकीर्यमाणविमलदशनशिखाप्रतानैः प्रकृतिमूढाया राजश्रियाः प्रज्ञालोकमिव दर्शयन्तम्, मुखजनितेन्दुसन्देहागतानि कुमुदिनीवनानीव प्रेषयन्तम्, स्फुटस्फटिकधवलदशनपङ्किकृतकुमुद- वनशङ्काप्रविष्टां शरज्ज्योत्स्नामिव विसर्जयन्तम्, मदिरामृतपारिजात- गन्धगर्भेण भरितसकलककुभा मुखामोदेनामृतमथनदिवसमिव सृज- मुत्कृष्टो मणिः । चतुर्णामुदधीनां संबन्धी परिचेप एव खातं परिखा यस्य स तादृग्दाढ्र्याच्छिलाप्राकार इव तेन । परिखां कृत्वान्तरे प्राकारो दीयते इति स्थितिः। विष्णु को जीतने की इच्छा रखने वाले सम्राट् के दो और हाथ वृद्धिंगत हो रहे हों, अथवा विष्णुतुल्य सम्राट् की भुजाओं को उपधान बना कर सोने वाली लक्ष्मी के कर्णोत्पल का मधु रस धारारूप में प्रवाहित होकर चू रहा हो, मानों उनकी भुजाओं से उत्पन्न होने वाले प्रताप के निकलने के लिए वे मार्ग हों, इस प्रकार वे उन किरण- दण्डों से मणिमय पक्षवितान को फैलाए हुए माणिक्यपर्वत के समान विराजमान थे। वे अपने दोनों अतिदीर्घ भुजदंडों से दिशाओं के विस्तार और दिक्पालों के प्रताप को एक काल में हर ले रहे थे, मानों उनके वे भुजदंड सारे संसार के ( वीर्यशाली लोगों के ) तेजमार्ग को अवरुद्ध कर देने वाले अर्गलादंड हों, मानों चारों समुद्रों के घेरे की खाई में सुवर्ण के चट्टानों को जोड़कर बनाए गए प्राकार हों; समस्त राजसमूह रूपी हंसों के रहने के लिए वज्र के पिंजड़े हों; भुवनलक्ष्मी के स्वागत के अवसर पर मंगलार्थ लगाए जाने वाले बड़े बड़े मणिमय तोरण हों। मानों उनका कौस्तुभ मणि के समान अधर अपनी बहन लक्ष्मी को चूमने के लिए मुख का अवयव बन गया हो; वैसे अधर से पारिजातपल्लव के रस के समान द्रवित होते हुए राग से मानो वे दिशाओं को सींच रहे थे। बीच-बीच में मित्रों के साथ हँसी मजाक के प्रसंग में सम्राट् हँस पड़ते तो उनके दाँतों की निर्मल किरणें चारों ओर फैल जातीं मानों प्रकृतिमूग्धा राजलक्ष्मी की श्रद्धा के आलोक हों, अथवा उन किरणों के रूप में मुख को चन्द्र समझ कर पहुँचे हुए कुमुदवनों को मानों वे लौटा रहे थे; स्फटिक के समान जड़े हुए दाँतों को कुमुद- वन समझ कर प्रविष्ट हुई शारदी ज्योत्स्ना को मानों वापिस कर रहे थे। उनके मुख से मदिरा, अमृत और पारिजात के मुखवास की मिली हुई सुगन्ध . निकल रही थी