भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 506 में से

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द्वितीय उच्छ्वासः १२१ मालागुणेन परिकलितकेशान्तम्, शिखण्डाभरणभुवा मुक्ताफलालोकेन मरकतमणिकिरणकलापेन चान्योन्यसंवलनवृजिनेन प्रयागप्रवाहवेणि- कावारिणेवागत्य स्वयमभिषिच्यमानम्, श्रमजलविलीनबहलकृष्णागुरु- पङ्कतिलककलङ्ककल्पितेन कालिम्ना प्रार्थनाचाटुचतुरचरणपतनशत- श्यामिकाकिणेनेव नीलायमानललाटेन्दुलेखाभिः क्षुभितमानसोद्गतै- रुत्कलिकाकलापैरिव हारैरुल्लसद्भिरवष्टभ्यमानाभिर्विलासवलानचटुलै- र्भ्रूलताकल्पैरैर्य्या श्रियमिव तर्जयन्तीभिरायामिभिः श्वसितैरविरल- परिमलैर्मलयमारुतमयैः पाशैरिवाकर्षन्तीभिर्विकटबकुलावलिवराटक- वेष्टितमुखैर्बृहद्भिः स्तनकलशैः स्वदारसंतोषरसमिवाशेषमुद्धरन्तीभिः दयति । स्वरव्याकरणविशारदमित्यादिना गानं दर्शयति । परिवेषः परिधिः । वृजिनेन शकलेन, कलुषेण वा । प्रयागो गङ्गायमुनासंगमः । तत्प्रवाहस्य वेणिका- रूपेण वारिणेव । श्रमजलेत्यादौ वारविलासिनीभिः सर्वतो विलुप्यमानसौभाग्य- मिवेति संबन्धः । प्रार्थनाचाटूत्थियादौ प्रार्थनादीनि सर्वाणि श्रीहर्षविषयाणि ज्ञेयानि । मानसं सरः, चेतश्च । उत्कलिका, रुहरुहिकाः, वीचयश्च । अविरले- त्यादिना धारणं आकर्षणं वशीकरणम्, समीपप्रापणं च । विकटेत्यादिनोद्दीपनभाव- मेव पोषयति । वराटकों रज्जुः । बृहद्भिरिति । बृहत्त्वेन हृद्यत्वमेषामाह । बृहत्त्वादेव च वक्ष्यति—अशेषमिति । स्तनकलशैरिति । कलशैः किल रज्जुवेष्टितमुखै रसो जलमु- भरण में मोती और मरकत दोनों लगे थे, दोनों की किरणें परस्पर मिल कर उन पर पड़ रही थीं, मानो प्रयाग से गंगा और यमुना के जल स्वयं आकर उनका अभिषेक कर रहे हों । वहाँ गणिकाएँ थीं जो उनके सौभाग्य को बढ़ा रही थीं । उनके ललाट की चन्द्रलेखा पसीने से पसीज कर बहते हुए कृष्णागुरु की धार से काली पड़ गई थी, मानों प्रिय वचन बोलकर प्रार्थना करने में चतुर होने के कारण सैकड़ों बार प्रिय के चरण पर सिर पटकने से वहाँ दाग पड़ गया हो । उनके वक्ष पर हार उल्लसित हो रहे थे मानों वे उनके उथल-पुथल होते हुए मानस की वीचियाँ हों । वे इस प्रकार विलास के साथ अपनी भौंहें मटकाती थीं मानों जैसे ईर्ष्या से लक्ष्मी पर तरक रही हों । मलयानल की तरह निरन्तर निकलती हुई सुगन्धित लम्बी साँसें लेतीं तो मालूम होता कि साँसों की डोर से कुछ खींच रही हों । बकुलमाला की लम्बी-लम्बी डोर से उनके स्तन रूपी कलश बँधे हुए थे जिनसे अपनी पत्नियों में होने वाले सम्राट् के सन्तोष-रस को मानों वे रिक्त कर रही थीं । हाँफने से हिलते हुए उनके स्तन पर हार की तरल मणियों की किरणों से मानों वे सम्राट् के हृदय को खींच कर हठात् अपने में प्रविष्ट

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