हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ हर्षचरितम् कुचोत्कम्पिकाविकारप्रेक्षितानां हारतरलमणीनां रश्मिभिराकृष्य हृदय- मिव हठात्प्रवेशयन्तीभिः प्रभामुचामाभरणमणीनां मयूखैः प्रसारितै- र्बहुभिरिव बाहुभिरालिङ्गन्तीभिर्जृम्भानुबन्धबन्धुरवदनारविन्दावरणी- कृतैरुत्तानैः करकिसलयैः सरभसप्रधावितानि मानसानीव निरुन्धती- भिर्मदनान्धमधुकरकुलकीर्यमाणकर्णकुसुमरजःकणकूर्णतकोणानि कुसुम- शरशरनिकरप्रहारमूर्च्छामुक्कुलितानीव लोचनानि चतुरं संचारयन्ती- भिरन्योन्यमत्सरादाविर्भवद्भङ्गुरभ्रुकुटिविभ्रमक्षिप्तैः कटाक्षैः कर्णेन्दी- वराणीव ताडयन्तीभिरनिमेषदर्शनसुखरसराशि मन्थरितपक्ष्मणा चक्षुषा पीतमिव कोमलकपोलपालीप्रतिबिम्बितं वहन्तीभिरभिलाषलीलान्नि- र्निमित्तस्मितैश्चन्द्रोदयानिव मदनसहायकाय संपादयन्तीभिरङ्गभङ्गवल- नान्योन्यघटितोत्तानकरवेणिकाभिः स्फुटनमुखराङ्गुलीकाण्डकुण्डली- क्रियमाणनखदीधितिनिवहनिभेनाकिंचित्करकामकार्मुकाणीव रुषा भङ्ग- दध्रियते। रसोऽभिलाषः, जलं च। बन्धुरं हृद्यम्। कूर्णितः संकोचितः। मदनादि- शब्दे विद्यमानेऽपि मदनान्धेत्यभिप्रायेण कुसुमसरग्रहणम् । अत्रपक्षे कर्णपदं त्य- ज्यते। अनिमेषदर्शनसुखरसराशिमिव श्रीहर्षम्। प्रतिबिम्बितमिति। अथ च रसो जलादिः विमले मणिभाजनावान्तर्वर्त्यपि प्रतिबिम्बितो लक्ष्यते। करवेणिका कर रही थीं। उनके चमचमाते हुए आभूषणों की किरणें इस प्रकार फैल रही थीं मानों वे सम्राट् के आलिङ्गन के लिए अनेक भुजाएँ पसार रही हों। जंभाई लेते हुए अपने उत्तान हाथों से मुँह ढँक कर मानों वे वेग से निकल भागते हुए अपने चित्त को रोक रही थीं। वे बड़ी चतुरता से आँखें मटका रही थीं, मानों मदांध भौरें उनके कर्ण- फूल की रज उड़ाकर आँखों में भरते या मानों काम के निरन्तर प्रहार से मूच्छित होकर वे अपनी आँखें मुकुलित करतीं। आँखों से परस्पर मत्सर के कारण भौंहें ऐंच कर छोड़े गए कटाक्षों से मानों अपने कर्णोत्पलों का ताड़न कर रही हों। सम्राट् के निरन्तर दर्शन-सुख की राशि जिसे उन्होंने अपनी निश्चल आँखों से पी रखा था उनके कपोल पर प्रतिबिम्बित हो रही थी। मानों काम की सहायता करने के लिए अभिलाषाओं के कुतूहल से निर्निमित्त हँसी हँसकर बहुत से चन्द्रों को उदित कर रही थीं। कभी कभी अपने अङ्गों की तोड़-मरोड़ करते हुए हाथों की उँगलियाँ एक दूसरे में फँसाकर हथेली ऊपर उठाए हुए नाचती थीं। उँगलियाँ चटका कर नखों की किरणों को कुंडलाकार बनाते हुए मानों काम की निकम्मी धनुहियों को क्रोध से तोड़ रही थीं। सम्राट पास में खड़ी चामरग्राहिणी को जो घाम के पसीने से हाथ के भीग जाने और काँपने के कारण