हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उच्छ्वासः १२३ न्तीभिर्वारविलासिनीभिर्विलुप्यमानमसौभाग्यमिव, सर्वतःस्पर्शस्विन्न- वेपमानकरकिसलयगलितचरणारविन्दां चरणग्राहिणीं विहस्य कोणेन लीलालंलं शिरसि ताडयन्तम्, अनवरतकरकलितकोणतया चात्मनः प्रियां वीणामिव श्रियमपि शिक्षयन्तम्, निःस्नेह इति धनैः, अनाश्रयणीय इति दोषैः, निग्रहरुचिरितीन्द्रियैः, दुरुपसर्प इति कलिना, नीरस इति व्यसनैः, भीरुरित्ययशसा, दुर्नग्रहचित्तवृत्तिरिति चित्तभुवा, स्त्रीपर इति सरस्वत्या, षण्ढ इति परकलत्रैः, काष्ठामुनिरिति यतिभिः, धूर्त इति वेश्याभिः, नेय इति सुहृद्भिः, कर्मकर इति विप्रैः, सुसहाय इति परस्परानुबन्धस्थितकरद्वयाङ्गुलिविन्यासः । विलुप्यमानसौभाग्यादिना ताः इत्यर्थः । कोणो वीणादिवादनभाण्डम् । प्रियामिति । वीणायाः शियाश्च विशेषणम् । निःस्नेह इत्यादौ । एतैरैकमप्यनेकधा गृह्यमाणमिति संबन्धः । षण्ढः प्रजनना- क्षमः । काष्ठा पराधारा, तत्प्रधानो मुनिः काष्ठामुनिरतिशयवांस्तपस्वी । नेयः परवशः । शन्तनुर्नाम राजा भीष्मस्य पिता वाहिन्या गङ्गायाः पतिः, अयं तु तस्मादपि महतीनां वाहिनीनां सेनानां पतिः शन्तनुरीति । 'पञ्चमी विभक्ते' इति पञ्चमी । भीष्मो जितकाशी जितेन्द्रियः । यतस्त्वयि त्वत्पुत्रे वा सत्यस्मद्दौहित्रस्य कुतो राज्यमिति । यदा हि दाशाधिपतिना स्वसुता मत्स्योदरोद्गता मत्स्यावती नामास्मै पित्रर्थमर्थयते न दत्ता, तदैतेन प्रतिज्ञातम्-'नाहं राज्यं विवाहं वा करिष्यामि' इति । अत एव ब्रह्मचार्यैवाभूत् । राजा च ततोऽपि जितकाशितमः, जितकाशी वा । जितेन जयेन काशते शोभते यः । तथा हि भीष्मेन रामो जितः। सर्वराजमहितं काशिराजं च जित्वा भ्रात्रर्थमम्बादिकन्यात्रयमनेषीत् । राजा तु उनके चरणों पर गिरता जा रहा थी, हँसत हुए अपन बाणादण्ड द्वारा उसके सिर पर धीरे से ठोंका । निरन्तर वे अपने वीणादंड को अपने हाथ में लिए रहते थे, इस प्रकार अपनी प्रिया वीणा के समान श्री को भी शिक्षा देते रहते थे । धन उन्हें समझते कि इनमें हमारे प्रति स्नेह कुछ भी नहीं; दोष कहते कि हमारे ये आश्रय के योग्य नहीं हैं; इन्द्रियाँ कहतीं कि सम्राट हमें निगृहीत रखना चाहते हैं; कलि कहता कि इनके समीप जाना कठिन है; व्यसन कहते कि ये नीरस हैं; अयश चिल्लाता कि सम्राट डरपोंक हैं; काम समझता कि इनकी चित्तवृत्ति दुर्ग्रह है; सरस्वती कहती कि ये स्त्रैण हैं; परकीया स्त्रियाँ कहतीं कि ये नपुंसक हैं; यती लोग कहते कि ये पहुँचे हुए तपस्वी हैं; वेश्याएँ उन्हें धूर्त कहतीं; सुहृद्वर्ग कहता कि ये नेय हैं अर्थात् इनकी बुद्धि दूसरों पर निर्भर रहती है, ब्राह्मण कहते कि ये हमारे भृत्य हैं; शत्रु कहते कि बहुत से दूसरे इनके सहायक हैं । इस प्रकार एक ही सम्राट को लोग अनेक प्रकार से