हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ हर्षचरितम् शत्रूयोधैः, एकमप्यनेकधा गृह्यमाणम्, शन्तनोर्महावाहिनीपतिम्, भीष्माजितकाशितमम्, द्रोणाच्चापलालसम्, गुरुपुत्रादमोघमार्ग णम्, कर्णान्मित्रप्रियम्, युधिष्ठिराद्बहुक्षमम्, भीमादनेकनागायुतबलम्, धनंजयान्महाभारतरणयोग्यम्, कारणमिव कृतयुगस्य, बीजमिव विबुधसर्गस्य, उत्पत्तिद्वीपमिव दर्पस्य, एकागारमिव करुणायाः, प्रातिवेशिकमिव पुरुषोत्तमस्य, खनिपर्वतमिव पराक्रमस्य, सर्वविद्या- संगीतगृहमिव सरस्वत्याः, द्वितीयामृतमन्थनदिवसमिव लक्ष्मी- समुत्थानस्य, बलदर्शनमिव वैदग्ध्यस्य, एकस्थानमिव स्थितीनाम्, सर्वस्वकथनमिव कान्तेः, अपवर्गमिव रूपपरमाणुसर्गस्य, सकलदुश्च- रितप्रायश्चित्तमिव राज्यस्य, सर्वबलसंदोहावस्कन्दमिव कन्दर्पस्य, ततोऽपि जितकाशितमः। द्रोणश्चापाचार्यः। स हि चापे धनुषि लालसः। चापलं न करोतीत्यर्थः। यद्वा चः समुच्चये। अपगता लालसा यस्य सोऽपलालसः। निर- भिलाष इत्यर्थः। गुरुपुत्रोऽश्वत्थामा तस्य सफलशरता। तथा शस्त्रोपसंहारो- ऽश्वमया याचितोऽपि कस्यचिदेकस्य मारणमन्तरेण न तदुपसंजहार। तत उत्तराया उदरस्थे परीक्षिति पातिते तस्मिंस्तदुपसंहृतवान्। अन्यत्र,-अमोघा मार्गणा याचका यस्येति। मित्रः सूर्यः, सुहृच्च मित्रम्। क्षमा क्षान्तिः, भूश्च। अनेकानि बहूनि, अनन्यसदृशानि च। एकशब्दस्य च साधारणार्थ तृच्। बलं सामर्थ्यम्, सैन्यं च। धनंजयोऽर्जुनः। महाभारतानां कुरूणां यो रणः संग्रामः। अन्यत्र,- महतो भारस्य कार्यधुरायास्तरणं निर्वाणम्। प्रातिवेशिकं प्रतिबिम्बम्। खनि- राकरः। अपवर्गः समाप्तिः। संदोहः समूहः। अवभृथो यज्ञान्तः। गम्भीरं प्रसन्नं चेति परस्परापेक्षं बोद्धव्यम्। तथा च सति गम्भीरत्वे प्रसन्नत्वं ऋजुत्वं चेन्न स्यात्ततो ग्रहण करते थे। शान्तनु केवल वाहिनीपति (अर्थात् गंगा के पति) थे, उनकी अपेक्षा ये सम्राट महावाहिनी (अर्थात् महासेना) के पति थे। भीष्म की अपेक्षा ये अधिक जितेन्द्रिय थे। द्रोण की अपेक्षा वे अधिक चापलालस (अर्थात् धनुष के प्रेमी अथवा चपलता से शून्य या निरभिलाष) थे। अश्वत्थामा की अपेक्षा वे अधिक बाण चलाने में निपुण (अमोघमार्गण) थे। कर्ण की अपेक्षा अधिक वे अपने मित्रों के प्रिय थे। युधिष्ठिर की अपेक्षा अधिक क्षमावान् थे अथवा विस्तृत पृथिवी के स्वामी थे। भीम की अपेक्षा अधिक हाथियों का उनमें बल था। अर्जुन की अपेक्षा अधिक वे महाभारत के युद्ध के योग्य थे, अथवा कार्य के बड़े बोझ को सम्हालने में निपुण थे। मानों वे सतयुग के कारण, विद्वानों की सृष्टि के बीज, दर्प के उत्पन्न होने के द्वीप, करुणा के एकागार, पुरुषोत्तम विष्णु के पड़ोसी, पराक्रम की