भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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द्वितीय उच्छ्वासः १२५ उपायमिव पुरंदरदर्शनस्य, आवर्तनमिव धर्मस्य, कन्यान्तःपुरमिव कलानाम्, परमप्रमाणमिव सौभाग्यस्य, राजसर्गसमाप्त्यवभृथस्नान- दिवसमिव सर्वप्रजापतीनाम्, गम्भीरं च, प्रसन्नं च, त्रासजननं च, रमणीयं च, कौतुकजननं च, पुण्यं च, चक्रवर्तिनं हर्षमद्राक्षीत् । दृष्ट्वा चानुगृहीत इव निगृहीत इव साभिलाष इव तृप्त इव रोमाञ्च- मुचा मुखेन मुञ्चन्नानन्दबाष्पवारिबिन्दून्दूरादेव विस्मयस्मेरः सम- चिन्तयत्—'सोऽयं सुजन्मा, सुगृहीतनामा, तेजसां राशिः, चतुरुदधि- केदारकुटुम्बी, भोक्ता ब्रह्मस्तम्भफलस्य, सकलादिराजचरितजयज्येष्ठ- जिह्मप्रकृतित्वं प्रसज्येत । एवं त्रासेत्यादौ बोद्धव्यम् । तथा च कालिदासः 'भीम- कान्तैर्नृपगुणैः स बभूवोपजीविनाम् । अधृष्यश्चाभिगम्यश्च यादोरत्नैरिवार्णवः ॥' इति दिलीपं प्रति वर्णितवान् । कौतुकजननपुण्यत्वादपि संभाव्यते । अत आह— पुण्यमिति । गम्भीरं च प्रसन्नं चेत्यादौ सर्वत्र विरोध उद्भाव्यः । गम्भीरं सतमिस्रं प्रसन्नं निर्मलं न भवतीति । अनुगृहात इवेत्यादि । एवंविधमहीपतिप्रसादवशात् । निगृहीत श्वेति । संकोच- वशात् । साभिलाष इवेति । तस्य दर्शनीयत्वात् । तृप्त इवे.ते । तथैव तस्य कृतार्थ- त्वात् । विरोधो ह्यत्र सुबोधः । केदारं क्षेत्रम् । ब्रह्मस्तम्भं जगत् । फलं रत्नादि । यच्च स्तम्भस्य फलं धान्यादि, तद्भोक्ता कर्षको भवति, राजन्वती प्रशस्तराजयुता । खान वाले पर्वत, सरस्वती का समस्त विद्या वाला संगीतकभवन, लक्ष्मी के उदय का दूसरा अमृतमथनदिवस, विदग्धता के बल का दर्शन, मर्यादाओं के एक ही स्थान, कान्ति के सर्वस्वकथन, रूपपरमाणुओं की सृष्टि के मोक्ष, राज्य के समस्त दुश्चरितों के प्रायश्चित्त, काम के सारे बलों के सहित आक्रमण, इन्द्र के दर्शनार्थ उपाय, धर्म के आवर्तन, कलाओं के कुमारीअन्तःपुर और सौभाग्य के परम प्रमाण थे। समस्त प्रजापतियों ने मानों उन्हीं का निर्माण करके राजाओं की सृष्टि का यज्ञ समाप्त कर अन्त में अवभृथस्नान कर लिया। इस प्रकार सम्राट हर्ष गम्भीर, हँसमुख, भय उत्पन्न करने वाले और रमणीय, आह्लाद उत्पन्न करने वाले और पवित्र थे। बाण ने सम्राट हर्ष को देखकर अपने आपको अनुगृहीत, निगृहीत, साभिलाष और तृप्त-जैसा अनुभव किया। उसके मुख के रोंगटे खड़े हो गए, आँखों में आनन्द के आँसू छल-छला उठे। उसने दूर ही से चकित और प्रसन्न होते हुए मन में सोचा— 'ये ही शोभन जन्मवाले, सुगृहीतनामा, तेजोराशि, चारों समुद्रों तक फैले हुए कुटुम्ब वाले, जगत् के रत्नादि फलों का उपभोग करने वाले एवं समस्त प्राचीन राजाओं के