भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 171

१२६ हर्षचरितम् मल्लो देवः परमेश्वरो हर्षः । एतेन च खलु राजन्वती पृथिवी । नास्य हरेरिव वृषविरोधीनि बालचरितानि, न पशुपतेरिव दक्षजनोद्वेगकारीण्यै- श्वर्यविलसितानि, न शतक्रतोरिव गोत्रविनाशपिशुनाः प्रवादाः, न यमस्येवातिवल्लभानि दण्डग्रहणानि, न वरुणस्येव निस्त्रिंशग्राहसहस्र- रक्षिता रत्नालयाः, न धनदस्येव निष्फलाः सन्निधिलाभाः, न जिनस्ये- वार्थवादशून्यानि दर्शनानि, न चन्द्रमस इव बहुलदोषोपहताः श्रियः । वृषो धर्मः, अरिष्टासुरो दान्तरूपश्च । बालेति । बाला हि विवेकहीनत्वादधर्मविरुद्धमा- चरन्ति । अस्य तु तस्यामपि दशायां धर्मविरोधाभावः । दक्षः कुशलः, प्राजापति- भेदश्च । महेश्वरपक्ष ऐश्वर्यशब्दो मुख्यवृत्तिः, इतरत्र गौणः । गोत्रं कुलम्, कुल- पर्वताश्च गोत्राः । अतिवल्लभानीति । अतिशब्देन युक्तदण्डत्वमाह । दण्डः करः, यमायुधं च । निस्त्रिंशग्राहाः खङ्गहस्ताः; अन्यत्र,-जलचरभेदाश्च । रत्नालया भाण्डा- गाराणि, समुद्राश्च । निष्फला ऐश्वर्यादिफलप्राप्तिशून्याः, दानादिविनाकृताश्च । सन्निधिः सन्निधानम् । एतस्य दर्शनं सर्वस्य फलदायि भवतीत्यर्थः । अन्यत्र,-संनि- धयः शोभनानि निधनान्यस्य । दर्शनानि जिनस्येव नार्थवादशून्यानि । अर्थो धनं तस्य वादः, अनेनेदं लब्धमिति, तेन शून्यानि । सर्वे तद्दर्शिनोऽर्थेन युज्यन्ते । जिनस्य पुनरर्थवादशून्यानि महायानयोगाचारमाध्यमिकदर्शनानि । बहुलाः प्रभूता दोषा रागाद्याः, बहुलदोषाश्च कृष्णपक्षरात्रयः । श्रियः समृद्धयः, शोभाश्च । .चरितों को जीतने वाले, ज्येष्ठ मल्लदेव परमेश्वर हर्ष हैं। इनसे धरती राजन्वती है (अर्थात् प्रशस्त राजा से शासित है)। विष्णु के समान इनके ऐसे बालचरित नहीं जिनमें वृष (अर्थात् धर्म, विष्णुपक्ष में अरिष्टासुर) का विरोध हो। इनमें पशुपति शिव के समान ऐसे ऐश्वर्य के विलास नहीं, जिनसे दक्षजनों (चतुर जन, शिवपक्ष में दक्षप्रजापति) के मन में जरा भी उद्वेग हो। इन्द्र के समान इनके विषय में ऐसा कोई प्रवाद नहीं कि ये गोत्रों (कुलों, इन्द्रपक्षमें कुलपर्वतों) का विनाश कर डालते हैं। यम के समान दण्ड-ग्रहण (कर लेना, यमपक्षमें दण्ड नामक आयुध का ग्रहण) इन्हें अतिप्रिय नहीं। ये वरुण के समान अपने रत्नालयों (रत्न के खजाने, वरुणपक्ष में समुद्र) की रक्षा हजारों की संख्या में तैनात निस्त्रिंशग्राह (खङ्गधारी सैनिक, वरुणपक्ष में जलचारी खूंखार जीव) द्वारा नहीं करते। जैसे कुबेर का सन्निधान प्राप्त करना निष्फल अर्थात् ऐश्वर्य आदि फलों से रहित एवं प्राप्ति से शून्य है उसी प्रकार इनका सन्निधान फलशून्य नहीं। जैसे बुद्ध के दर्शन (महायान के योगाचार और माध्यमिक दर्शन) सर्वथा अर्थवाद (प्राशस्त्यमूलक वाक्य) से शून्य हैं, वैसे ही इनके दर्शन धन आदि की प्राप्ति से शून्य नहीं होते। चन्द्र जैसे बहुलदोष (कृष्ण