भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 172

द्वितीय उच्छ्वासः १२७ चित्रमिदमत्यमरं राजत्वम् । अपि चास्य त्यागस्यार्थिनः, प्रज्ञायाः शास्त्राणि, कवित्वस्य वाचः, सत्त्वस्य साहसस्थानानि, उत्साहस्य व्यापाराः, कीर्तेर्दिङ्गाखानि, अनुरागस्य लोकहृदयानि, गुणगणस्य संख्या, कौशलस्य कला, न पर्याप्तो विषयः । अस्मिंश्च राजनि यतीनां योग- पट्टकाः, पुस्तकर्मणां पार्थिवविग्रहाः, षट्पदानां दानग्रहणकलहाः, वृत्तानां पादच्छेदाः, अष्टपदानां चतुरङ्गकल्पना, पन्नगानां द्विजगुरुद्वेषाः, वाक्य- विदामधिकरणविचाराः इति समुपसृत्य चोपवीती स्वस्तिशब्दमकरोत् । पर्याप्तः परिपूर्णः । योगपट्टका यतीनामुपकरणं पर्यङ्कबन्धनाथंम् । ते यतीनां चतु- र्थाश्रमिणामेव, न पुनर्यागेन युक्ताः पट्टकाः कूटप्रधानानि लेख्यपत्राणि केषाञ्चित् । एवमन्यत्रापि । पुस्तकर्म लेप्यम् । पार्थिवविग्रहा मृन्मयशरीराणि, राजभिः सह वैराणि च । दानग्रहणं मदजलं दानम्, ऋणव्यवहारश्च । वृत्तानां गुरुलघुनियमात्म- कानां । समाश्च समविषमानां पादच्छेदा भागविरामाः, चरणकर्तनानि च । अष्टा- पदानां चतुरङ्गफलकानाम् । 'चत्वार्यङ्गानि सेनाया हस्त्यश्वरथपत्तयः' । तेषां कल्पना रचना, चतुर्णामङ्गानां पाणिपादस्य च छेदः । द्विजगुरूंगरुडोऽपि । वाक्यविदां मीमांसकाना मधिकरणविश्रान्तिस्थानानि । राज्ञां च धर्मनिर्णयस्थानानि । अधिक- बलो वा रणः सङ्ग्राम इति केचित् । उपवीती दक्षिणावीती करः । उक्तं च---'उद्धृते दक्षिणे पाणावुपवीत्युच्यते द्विजः' इति । पक्ष की रातों) में श्रीहत हो जाता है उस प्रकार ये राग आदि बहुल दोषों के कारण श्रीहत या समृद्धिहीन नहीं हुए। इस प्रकार देवताओं से भी बढ़ा-चढ़ा इनका प्रभुत्व है यह देख कर आश्चर्य होता है। और भी- इनका त्याग इतना है कि पर्याप्त याचक नहीं मिलते, इनकी प्रज्ञा इतनी है कि शास्त्र के विषय पर्याप्त नहीं। इस प्रकार कवित्व के सामने वाणी, बल के सामने साहस के स्थान, उत्साह के सामने व्यापार, गुणों के सामने संख्या और कौशल के सामने कला आदि पर्याप्त नहीं ठहरते । इनके शासन में यती लोग ही पर्यङ्कबन्ध आदि आसन में योगपट्ट नामक वस्त्रविशेष धारण करते थे, न कि इनके राज्य में जाली बनाए हुए ताम्रपत्र थे । इनके शासन में मूर्तियाँ ही मिट्टी की बनाई जाती थीं, न कि परस्पर पार्थिवविग्रह अर्थात् राजाओं के साथ लड़ाई-झगड़े होते थे । भौंरे ही हाथियों के दानजल के ग्रहण में झगड़ते, याचक लोग दान लेने के अवसर पर नहीं झगड़ते थे । वृत्त अर्थात् छन्दों के ही चरण में सम-विषम या भाग और विराम आदि छेद होते, न कि किसी पाप-विशेष के होने से पैर काट दिए जाते थे । शतरंज के खेल में ही सेना के चार अंग हस्ती-अश्व-रथ-पैदल की कल्पना थी, न कि अपराधी के दोनों हाथ और दोनों पैर काट लिए जाते थे । सर्प ही