हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ हर्षचरितम् अथोत्तरे नातिदूरे राजधिष्ण्यस्य गजपरिचारको मधुरमपरवक्त्र- मुच्चैरगायत्— 'करिकलभ विमुञ्च लोलतां चर विनयव्रतमानताननः । मृगपतिनखकोटिभङ्गुरो गुरुरुपरि क्षमते न तेऽङ्कुशः' ॥ राजा तु तच्छ्रुत्वा दृष्ट्वा च तं गिरिगुहागतसिंहबृंहितगम्भीरेण स्वरेण पूरयन्निव नभोभागमपृच्छत्—'एष स बाणः ?' इति । 'यथा ज्ञापयति देवः । सोऽयम्' इति विज्ञापितो दौवारिकेण । 'न तावदेनमकृतप्रसादः पश्यामि' इति तिर्यङ्नीलधवलांशुकाशारां तिरस्करिणीमिव भ्रमयन्न- पाङ्गनीयमानतरलतारकस्यायामिनीं चक्षुषः प्रभां परिवृत्य प्रेष्ठस्य पृष्ठतो गजपरिचारक इति । अन्यगजपरिचारकस्य स्वजातिसमुचितं वस्तु राज्ञः प्रकृत- स्मारकं जातम् । तत्र करिणां स्वभावत एव रागित्वादस्यापि रागविश्वा- दुजंगता स्मृतिः संजातेति । भङ्गुरो वक्रः । मृगपतिनखकोटिभङ्गुर इति । स्पष्टा व्याख्या । गुरुर्भारः, शासिता च । उपरि पृष्ठदेशे, प्रभुभावे च अङ्कुश इवाङ्कुश इत्यपि । अत आह—तच्छ्रुत्वेति । बृंहितं गर्जितम् । अंशव एवांशूकाः । अंशुकं च द्विजगुरु गरुड से द्वेष रखते थे, न कि प्रजा के लोग ब्राह्मण और गुरु से द्वेष करते । मीमांसक लोग ही अधिकरणों अर्थात् भिन्न-भिन्न प्रकरणों में विचार-विमर्श करते थे, न कि धर्मनिर्णय के स्थान (फौजदारी और दीवानी की अदालतें) लगते थे ।' यह सोच बाण ने आगे बढ़ कर दाहिना हाथ उठाए हुए 'स्वस्ति' शब्द का उच्चारण किया । उसी समय दिशा की ओर कुछ ही दूर पर राजभवन के किसी महावत ने मधुर और ऊँचे स्वर में अपरवक्त्र का गान किया— 'अरे हाथी के बच्चे, तू अपनी चंचलता छोड़ दे, सिर नीचा करके नम्रतापूर्वक रह । यह अंकुश जो शेर के नखाग्र के समान टेढ़ा और कठोर है, तेरे दोषों को नहीं सह सकता ।' उसे सुनकर हर्ष ने बाण की ओर देखा और पर्वत की कन्दरा में बैठ कर दहाड़ते हुए सिंह की आवाज के समान गम्भीर स्वर से नभोभाग को भरते हुए पूछा—'वही यह बाण है ?' तब दौवारिक बोला उठा—'देव का कथन सत्य है, ये वही हैं ।' 'मैं तब तक इसे नहीं देखता जब तक यह मिलने-जुलने की अनुकूलता नहीं प्राप्त कर ले' यह कह कर सम्राट् ने मुह फेर लिया, अपाङ्ग की ओर दौड़ते हुए चंचल तारों वाली आँखों की फैलती हुई प्रभा इस प्रकार इधर से उधर हुई जैसे नील और उज्ज्वल वस्त्र की बनी हुई जवनिका एक ओर से दूसरी ओर घुमा दी जाती है । सम्राट् ने घूमकर