भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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द्वितीय उच्छ्वासः १०६ निषण्णस्य मालवराजसूनोरकथयत्—‘महानयं भुजङ्गः’ इति। तूष्णीं- भावेन त्वगमितनरेन्द्रवचसि तस्मिन्मूके च राजलोके मुहूर्तमिब तृष्णीं स्थित्वा बाणो व्यज्ञापयत्—‘देव ! अविज्ञाततत्त्व इव, अश्रद्दधान इव, नेय इव, अविदितलोकवृत्तान्त इव च कस्मादेवमाज्ञापयसि ? स्वैरिणो विचित्राश्च लोकस्य स्वभावाः प्रवादाश्च । महद्भिस्तु यथार्थ- दर्शिभिर्भवितव्यम् । नार्हसि मामन्यथा संभावयितुमविशिष्टमिव । ब्राह्मणोऽस्मि जातः सोमपायिनां वंशे वात्स्यायनानाम् । यथाकाल- मुपनयनादयः कृताः संस्काराः सम्यक्पठितः साङ्गो वेदः । श्रुतानि च यथाशक्ति शास्त्राणि । दारपरिग्रहादभ्यागारिकोऽस्मि । कामे भुजङ्गता । वक्षम् । तिरस्करिणी जवनिका । प्रेष्ठस्यातिप्रियस्य । नेयः परवशः । स्वैरिणः स्वतन्त्राः । सोमपायिनां सोमपानाम् । 'शिक्षा कल्पो व्याकरणं ज्योतिषं निरुक्तं छन्दोविचितिः' इति षडङ्गानि वेदस्य । अभ्यागारिको गृहस्थः, सम्यग्वृत्तिस्थितो वा । कामे भुजंगता । कामभुजंगता शृङ्गारित्वम् । कामे मदने भुजंगता ज्ञेया, न मादृशेषु । नहि मे काचिद्भजं बाहुं गता प्राप्तेत्यर्थः । लोकद्वयेत्यादिना त्रिवर्ग- स्यानुपघातं दर्शयति । शास्त्रविरोधप्रसङ्गात । 'शतायुर्वे पुरुषः'; कालमन्योन्यानु- पीठ की ओर बैठे हुए मालवराज के पुत्र से कहा—'यह भारी भुजंग (गुंडा या लम्पट) है।' मालवराज के पुत्र तो चुप रहे जैसे उन्हें हर्ष की बात समझ में न आई और राजसमूह भी सुनकर गुम हो गया । तब क्षणभर चुप रह कर बाण बोला—'हे देव, आप इस प्रकार की बात ऐसे कहते हैं जैसे आप को मेरे विषय में सच्ची बात का पता न हो, या मेरा विश्वास न हो, या आप की बुद्धि दूसरों पर निर्भर रहती है, अथवा आप स्वयं लोक के वृत्तान्त से अनभिज्ञ हों। लोगों के स्वभाव और फैली हुई बातें मनमानी और तरह-तरह की होती हैं । किन्तु श्रेष्ठ जनों को ठीक-ठीक देखना चाहिए । मुझे साधारण समझ कर अनाप-सनाप कल्पना न कीजिए । सोमपान करने वाले वात्स्यायन ब्राह्मणों के वंश में मैं जन्मा हूँ। समय से मेरे यज्ञोपवीत आदि संस्कार हुए हैं । मैने अङ्गों के साथ वेदों का सम्यक् प्रकार से स्वाध्याय किया है । अपनी शक्ति के अनुसार शास्त्रों का भी श्रवण किया है । विवाह के क्षण से लेकर मैं नियमित गृहस्थ हूँ । तो मुझ में क्या भुजंगपना है १? मेरी नई अवस्था की कुछ १. का मे भुजङ्गता-मेरे जीवन में कौन-सी ऐसी बात है जिसे भुजंगता कहा जाय ? भुजंगता उस व्यक्ति में रहती है जो कामी है, मुझमें नहीं, मैंने किसी स्त्री को भुजंगता नहीं की अर्थात् अपनी भुजाओं में आलिंगन नहीं किया । ४ ह० च०