हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० हर्षचरितम् लोकद्वयाविरोधिभिस्तु चापलैः शैशवमशून्यमासीत् । अत्रानपला- पोऽस्मि । अनेनैव च गृहीतविप्रतीसारमिव मे हृदयम् । इदानीं तु सुगत इव शान्तमनसि मनाविव कर्तरि वर्णाश्रमव्यवस्थानां समवर्तिनीव च साक्षाद्दण्डधृति देवे शासति सप्ताम्बुराशिरशनामशेषद्वीपमालिनीं महीं क इवाविशङ्कः सर्वव्यसनबन्धोरविनयस्य मनसाप्यभिनयं कल्पयिष्यति । आसतां च तावन्मानुष्यकोपेताः । त्वत्प्रभावादलयोऽपि भीता इव मधु पिबन्ति । रथाङ्गनामानोऽपि लज्जन्त इवाभ्यनुवृत्तिव्यसनैः प्रियाणाम् । कपयोऽपि चकिता इव चपलायन्ते । शरारवोऽपि सानुक्रोशा इव श्वाप- दगणाः पिशितानि भुञ्जते । सर्वथा कालेन मां ज्ञास्यति स्वामी स्वयमेव । अनपाचीनचित्तवृत्तिग्राहिण्यो हि भवन्ति प्रज्ञावतां प्रकृतयः' इत्यभिधाय तूष्णीमभूत् । भूपतिरपि 'एवमस्माभिः श्रुतम्' इत्यभिधाय तूष्णीमेवा- भवत् । संभाषणासनदानादिना तु प्रसादेन नैनमन्वग्रहीत् । केवलममृत- बद्धं परस्परस्यानुपघातेन त्रिवर्गं सेवत इत्यत एवाह—शैशवमिति । अशून्यमिति । अनेन तदेकासक्तत्वं परिहरति । अनपलापो निरपह्नवः विप्रतीसारः पश्चात्तापः । सुगतो बुद्धः । समवर्ती यमः । मनुष्यस्य भावो मानुष्यकम् । रथाङ्गनामानश्चक्रवाकाः चपलायन्ते चपलत्वमाचरन्ति । शरारवो हिंस्त्राः । श्वापदगणाः प्राणिसमूहाः । पिशितं मांसम् । अनपाचीनाऽमृष्टा । अविपरीतेत्यर्थः निर्दोषा वा । चपलताएँ अवश्य हैं पर ऐसा नहीं जिससे इस लोक या परलोक का कोई विरोध हो, मैं इस बात को इनकार नहीं करता । मेरे हृदय में इसी का बहुत बड़ा पश्चात्ताप है । हे देव, आप भगवान् बुद्ध के समान शान्तचित्त, मनु के समान वर्णाश्रम मर्यादा के रक्षक और यम के समान दण्डधर हैं । सातों समुद्रों की करधनी और समस्त द्वीपों की माला से विराजित पृथिवी पर आपका एकछत्र शासन है । तो कौन ऐसा निडर है जो सब प्रकार से दुखद अभिनय करने की मन से भी कल्पना करता है ? मनुष्यों की तो बात जाने दीजिए, आपके, प्रभाव से भौंरे भी डरते-डरते मधुपान करते हैं, चक्रवाक पक्षी भी अपनी पत्नी के प्रति अतिशय आसक्ति रूप व्यसन से लज्जित होते हैं, वानर भी शंकित होकर चपलता करते हैं, बाघ आदि हिंसक जानवर भी दयावान् होकर पश्चात्ताप करते हुए मांस का भक्षण करते हैं । समय से स्वयं आप मेरे विषय में सब कुछ जान लेंगे क्योंकि बुद्धिमानों का यह स्वभाव होता है कि वे किसी बात में भी विपरीत हठ नहीं रखते ।' इतना कह कर बाण चुप हो गए । सम्राट ने भी 'मैंने ऐसा ही सुना था' बस इतना ही कहा । लेकिन परस्पर बातचीत, आसनदान आदि