हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
द्वितीय उच्छ्वासः १२५ उपायमिव पुरंदरदर्शनस्य, आवर्तनमिव धर्मस्य, कन्यान्तःपुरमिव कलानाम्, परमप्रमाणमिव सौभाग्यस्य, राजसर्गसमाप्त्यवभृथस्नान- दिवसमिव सर्वप्रजापतीनाम्, गम्भीरं च, प्रसन्नं च, त्रासजननं च, रमणीयं च, कौतुकजननं च, पुण्यं च, चक्रवर्तिनं हर्षमद्राक्षीत् । दृष्ट्वा चानुगृहीत इव निगृहीत इव साभिलाष इव तृप्त इव रोमाञ्च- मुचा मुखेन मुञ्चन्नानन्दबाष्पवारिबिन्दून्दूरादेव विस्मयस्मेरः सम- चिन्तयत्—'सोऽयं सुजन्मा, सुगृहीतनामा, तेजसां राशिः, चतुरुदधि- केदारकुटुम्बी, भोक्ता ब्रह्मस्तम्भफलस्य, सकलादिराजचरितजयज्येष्ठ- जिह्मप्रकृतित्वं प्रसज्येत । एवं त्रासेत्यादौ बोद्धव्यम् । तथा च कालिदासः 'भीम- कान्तैर्नृपगुणैः स बभूवोपजीविनाम् । अधृष्यश्चाभिगम्यश्च यादोरत्नैरिवार्णवः ॥' इति दिलीपं प्रति वर्णितवान् । कौतुकजननपुण्यत्वादपि संभाव्यते । अत आह— पुण्यमिति । गम्भीरं च प्रसन्नं चेत्यादौ सर्वत्र विरोध उद्भाव्यः । गम्भीरं सतमिस्रं प्रसन्नं निर्मलं न भवतीति । अनुगृहात इवेत्यादि । एवंविधमहीपतिप्रसादवशात् । निगृहीत श्वेति । संकोच- वशात् । साभिलाष इवेति । तस्य दर्शनीयत्वात् । तृप्त इवे.ते । तथैव तस्य कृतार्थ- त्वात् । विरोधो ह्यत्र सुबोधः । केदारं क्षेत्रम् । ब्रह्मस्तम्भं जगत् । फलं रत्नादि । यच्च स्तम्भस्य फलं धान्यादि, तद्भोक्ता कर्षको भवति, राजन्वती प्रशस्तराजयुता । खान वाले पर्वत, सरस्वती का समस्त विद्या वाला संगीतकभवन, लक्ष्मी के उदय का दूसरा अमृतमथनदिवस, विदग्धता के बल का दर्शन, मर्यादाओं के एक ही स्थान, कान्ति के सर्वस्वकथन, रूपपरमाणुओं की सृष्टि के मोक्ष, राज्य के समस्त दुश्चरितों के प्रायश्चित्त, काम के सारे बलों के सहित आक्रमण, इन्द्र के दर्शनार्थ उपाय, धर्म के आवर्तन, कलाओं के कुमारीअन्तःपुर और सौभाग्य के परम प्रमाण थे। समस्त प्रजापतियों ने मानों उन्हीं का निर्माण करके राजाओं की सृष्टि का यज्ञ समाप्त कर अन्त में अवभृथस्नान कर लिया। इस प्रकार सम्राट हर्ष गम्भीर, हँसमुख, भय उत्पन्न करने वाले और रमणीय, आह्लाद उत्पन्न करने वाले और पवित्र थे। बाण ने सम्राट हर्ष को देखकर अपने आपको अनुगृहीत, निगृहीत, साभिलाष और तृप्त-जैसा अनुभव किया। उसके मुख के रोंगटे खड़े हो गए, आँखों में आनन्द के आँसू छल-छला उठे। उसने दूर ही से चकित और प्रसन्न होते हुए मन में सोचा— 'ये ही शोभन जन्मवाले, सुगृहीतनामा, तेजोराशि, चारों समुद्रों तक फैले हुए कुटुम्ब वाले, जगत् के रत्नादि फलों का उपभोग करने वाले एवं समस्त प्राचीन राजाओं के
१२६ हर्षचरितम् मल्लो देवः परमेश्वरो हर्षः । एतेन च खलु राजन्वती पृथिवी । नास्य हरेरिव वृषविरोधीनि बालचरितानि, न पशुपतेरिव दक्षजनोद्वेगकारीण्यै- श्वर्यविलसितानि, न शतक्रतोरिव गोत्रविनाशपिशुनाः प्रवादाः, न यमस्येवातिवल्लभानि दण्डग्रहणानि, न वरुणस्येव निस्त्रिंशग्राहसहस्र- रक्षिता रत्नालयाः, न धनदस्येव निष्फलाः सन्निधिलाभाः, न जिनस्ये- वार्थवादशून्यानि दर्शनानि, न चन्द्रमस इव बहुलदोषोपहताः श्रियः । वृषो धर्मः, अरिष्टासुरो दान्तरूपश्च । बालेति । बाला हि विवेकहीनत्वादधर्मविरुद्धमा- चरन्ति । अस्य तु तस्यामपि दशायां धर्मविरोधाभावः । दक्षः कुशलः, प्राजापति- भेदश्च । महेश्वरपक्ष ऐश्वर्यशब्दो मुख्यवृत्तिः, इतरत्र गौणः । गोत्रं कुलम्, कुल- पर्वताश्च गोत्राः । अतिवल्लभानीति । अतिशब्देन युक्तदण्डत्वमाह । दण्डः करः, यमायुधं च । निस्त्रिंशग्राहाः खङ्गहस्ताः; अन्यत्र,-जलचरभेदाश्च । रत्नालया भाण्डा- गाराणि, समुद्राश्च । निष्फला ऐश्वर्यादिफलप्राप्तिशून्याः, दानादिविनाकृताश्च । सन्निधिः सन्निधानम् । एतस्य दर्शनं सर्वस्य फलदायि भवतीत्यर्थः । अन्यत्र,-संनि- धयः शोभनानि निधनान्यस्य । दर्शनानि जिनस्येव नार्थवादशून्यानि । अर्थो धनं तस्य वादः, अनेनेदं लब्धमिति, तेन शून्यानि । सर्वे तद्दर्शिनोऽर्थेन युज्यन्ते । जिनस्य पुनरर्थवादशून्यानि महायानयोगाचारमाध्यमिकदर्शनानि । बहुलाः प्रभूता दोषा रागाद्याः, बहुलदोषाश्च कृष्णपक्षरात्रयः । श्रियः समृद्धयः, शोभाश्च । .चरितों को जीतने वाले, ज्येष्ठ मल्लदेव परमेश्वर हर्ष हैं। इनसे धरती राजन्वती है (अर्थात् प्रशस्त राजा से शासित है)। विष्णु के समान इनके ऐसे बालचरित नहीं जिनमें वृष (अर्थात् धर्म, विष्णुपक्ष में अरिष्टासुर) का विरोध हो। इनमें पशुपति शिव के समान ऐसे ऐश्वर्य के विलास नहीं, जिनसे दक्षजनों (चतुर जन, शिवपक्ष में दक्षप्रजापति) के मन में जरा भी उद्वेग हो। इन्द्र के समान इनके विषय में ऐसा कोई प्रवाद नहीं कि ये गोत्रों (कुलों, इन्द्रपक्षमें कुलपर्वतों) का विनाश कर डालते हैं। यम के समान दण्ड-ग्रहण (कर लेना, यमपक्षमें दण्ड नामक आयुध का ग्रहण) इन्हें अतिप्रिय नहीं। ये वरुण के समान अपने रत्नालयों (रत्न के खजाने, वरुणपक्ष में समुद्र) की रक्षा हजारों की संख्या में तैनात निस्त्रिंशग्राह (खङ्गधारी सैनिक, वरुणपक्ष में जलचारी खूंखार जीव) द्वारा नहीं करते। जैसे कुबेर का सन्निधान प्राप्त करना निष्फल अर्थात् ऐश्वर्य आदि फलों से रहित एवं प्राप्ति से शून्य है उसी प्रकार इनका सन्निधान फलशून्य नहीं। जैसे बुद्ध के दर्शन (महायान के योगाचार और माध्यमिक दर्शन) सर्वथा अर्थवाद (प्राशस्त्यमूलक वाक्य) से शून्य हैं, वैसे ही इनके दर्शन धन आदि की प्राप्ति से शून्य नहीं होते। चन्द्र जैसे बहुलदोष (कृष्ण
द्वितीय उच्छ्वासः १२७ चित्रमिदमत्यमरं राजत्वम् । अपि चास्य त्यागस्यार्थिनः, प्रज्ञायाः शास्त्राणि, कवित्वस्य वाचः, सत्त्वस्य साहसस्थानानि, उत्साहस्य व्यापाराः, कीर्तेर्दिङ्गाखानि, अनुरागस्य लोकहृदयानि, गुणगणस्य संख्या, कौशलस्य कला, न पर्याप्तो विषयः । अस्मिंश्च राजनि यतीनां योग- पट्टकाः, पुस्तकर्मणां पार्थिवविग्रहाः, षट्पदानां दानग्रहणकलहाः, वृत्तानां पादच्छेदाः, अष्टपदानां चतुरङ्गकल्पना, पन्नगानां द्विजगुरुद्वेषाः, वाक्य- विदामधिकरणविचाराः इति समुपसृत्य चोपवीती स्वस्तिशब्दमकरोत् । पर्याप्तः परिपूर्णः । योगपट्टका यतीनामुपकरणं पर्यङ्कबन्धनाथंम् । ते यतीनां चतु- र्थाश्रमिणामेव, न पुनर्यागेन युक्ताः पट्टकाः कूटप्रधानानि लेख्यपत्राणि केषाञ्चित् । एवमन्यत्रापि । पुस्तकर्म लेप्यम् । पार्थिवविग्रहा मृन्मयशरीराणि, राजभिः सह वैराणि च । दानग्रहणं मदजलं दानम्, ऋणव्यवहारश्च । वृत्तानां गुरुलघुनियमात्म- कानां । समाश्च समविषमानां पादच्छेदा भागविरामाः, चरणकर्तनानि च । अष्टा- पदानां चतुरङ्गफलकानाम् । 'चत्वार्यङ्गानि सेनाया हस्त्यश्वरथपत्तयः' । तेषां कल्पना रचना, चतुर्णामङ्गानां पाणिपादस्य च छेदः । द्विजगुरूंगरुडोऽपि । वाक्यविदां मीमांसकाना मधिकरणविश्रान्तिस्थानानि । राज्ञां च धर्मनिर्णयस्थानानि । अधिक- बलो वा रणः सङ्ग्राम इति केचित् । उपवीती दक्षिणावीती करः । उक्तं च---'उद्धृते दक्षिणे पाणावुपवीत्युच्यते द्विजः' इति । पक्ष की रातों) में श्रीहत हो जाता है उस प्रकार ये राग आदि बहुल दोषों के कारण श्रीहत या समृद्धिहीन नहीं हुए। इस प्रकार देवताओं से भी बढ़ा-चढ़ा इनका प्रभुत्व है यह देख कर आश्चर्य होता है। और भी- इनका त्याग इतना है कि पर्याप्त याचक नहीं मिलते, इनकी प्रज्ञा इतनी है कि शास्त्र के विषय पर्याप्त नहीं। इस प्रकार कवित्व के सामने वाणी, बल के सामने साहस के स्थान, उत्साह के सामने व्यापार, गुणों के सामने संख्या और कौशल के सामने कला आदि पर्याप्त नहीं ठहरते । इनके शासन में यती लोग ही पर्यङ्कबन्ध आदि आसन में योगपट्ट नामक वस्त्रविशेष धारण करते थे, न कि इनके राज्य में जाली बनाए हुए ताम्रपत्र थे । इनके शासन में मूर्तियाँ ही मिट्टी की बनाई जाती थीं, न कि परस्पर पार्थिवविग्रह अर्थात् राजाओं के साथ लड़ाई-झगड़े होते थे । भौंरे ही हाथियों के दानजल के ग्रहण में झगड़ते, याचक लोग दान लेने के अवसर पर नहीं झगड़ते थे । वृत्त अर्थात् छन्दों के ही चरण में सम-विषम या भाग और विराम आदि छेद होते, न कि किसी पाप-विशेष के होने से पैर काट दिए जाते थे । शतरंज के खेल में ही सेना के चार अंग हस्ती-अश्व-रथ-पैदल की कल्पना थी, न कि अपराधी के दोनों हाथ और दोनों पैर काट लिए जाते थे । सर्प ही
१२८ हर्षचरितम् अथोत्तरे नातिदूरे राजधिष्ण्यस्य गजपरिचारको मधुरमपरवक्त्र- मुच्चैरगायत्— 'करिकलभ विमुञ्च लोलतां चर विनयव्रतमानताननः । मृगपतिनखकोटिभङ्गुरो गुरुरुपरि क्षमते न तेऽङ्कुशः' ॥ राजा तु तच्छ्रुत्वा दृष्ट्वा च तं गिरिगुहागतसिंहबृंहितगम्भीरेण स्वरेण पूरयन्निव नभोभागमपृच्छत्—'एष स बाणः ?' इति । 'यथा ज्ञापयति देवः । सोऽयम्' इति विज्ञापितो दौवारिकेण । 'न तावदेनमकृतप्रसादः पश्यामि' इति तिर्यङ्नीलधवलांशुकाशारां तिरस्करिणीमिव भ्रमयन्न- पाङ्गनीयमानतरलतारकस्यायामिनीं चक्षुषः प्रभां परिवृत्य प्रेष्ठस्य पृष्ठतो गजपरिचारक इति । अन्यगजपरिचारकस्य स्वजातिसमुचितं वस्तु राज्ञः प्रकृत- स्मारकं जातम् । तत्र करिणां स्वभावत एव रागित्वादस्यापि रागविश्वा- दुजंगता स्मृतिः संजातेति । भङ्गुरो वक्रः । मृगपतिनखकोटिभङ्गुर इति । स्पष्टा व्याख्या । गुरुर्भारः, शासिता च । उपरि पृष्ठदेशे, प्रभुभावे च अङ्कुश इवाङ्कुश इत्यपि । अत आह—तच्छ्रुत्वेति । बृंहितं गर्जितम् । अंशव एवांशूकाः । अंशुकं च द्विजगुरु गरुड से द्वेष रखते थे, न कि प्रजा के लोग ब्राह्मण और गुरु से द्वेष करते । मीमांसक लोग ही अधिकरणों अर्थात् भिन्न-भिन्न प्रकरणों में विचार-विमर्श करते थे, न कि धर्मनिर्णय के स्थान (फौजदारी और दीवानी की अदालतें) लगते थे ।' यह सोच बाण ने आगे बढ़ कर दाहिना हाथ उठाए हुए 'स्वस्ति' शब्द का उच्चारण किया । उसी समय दिशा की ओर कुछ ही दूर पर राजभवन के किसी महावत ने मधुर और ऊँचे स्वर में अपरवक्त्र का गान किया— 'अरे हाथी के बच्चे, तू अपनी चंचलता छोड़ दे, सिर नीचा करके नम्रतापूर्वक रह । यह अंकुश जो शेर के नखाग्र के समान टेढ़ा और कठोर है, तेरे दोषों को नहीं सह सकता ।' उसे सुनकर हर्ष ने बाण की ओर देखा और पर्वत की कन्दरा में बैठ कर दहाड़ते हुए सिंह की आवाज के समान गम्भीर स्वर से नभोभाग को भरते हुए पूछा—'वही यह बाण है ?' तब दौवारिक बोला उठा—'देव का कथन सत्य है, ये वही हैं ।' 'मैं तब तक इसे नहीं देखता जब तक यह मिलने-जुलने की अनुकूलता नहीं प्राप्त कर ले' यह कह कर सम्राट् ने मुह फेर लिया, अपाङ्ग की ओर दौड़ते हुए चंचल तारों वाली आँखों की फैलती हुई प्रभा इस प्रकार इधर से उधर हुई जैसे नील और उज्ज्वल वस्त्र की बनी हुई जवनिका एक ओर से दूसरी ओर घुमा दी जाती है । सम्राट् ने घूमकर
द्वितीय उच्छ्वासः १०६ निषण्णस्य मालवराजसूनोरकथयत्—‘महानयं भुजङ्गः’ इति। तूष्णीं- भावेन त्वगमितनरेन्द्रवचसि तस्मिन्मूके च राजलोके मुहूर्तमिब तृष्णीं स्थित्वा बाणो व्यज्ञापयत्—‘देव ! अविज्ञाततत्त्व इव, अश्रद्दधान इव, नेय इव, अविदितलोकवृत्तान्त इव च कस्मादेवमाज्ञापयसि ? स्वैरिणो विचित्राश्च लोकस्य स्वभावाः प्रवादाश्च । महद्भिस्तु यथार्थ- दर्शिभिर्भवितव्यम् । नार्हसि मामन्यथा संभावयितुमविशिष्टमिव । ब्राह्मणोऽस्मि जातः सोमपायिनां वंशे वात्स्यायनानाम् । यथाकाल- मुपनयनादयः कृताः संस्काराः सम्यक्पठितः साङ्गो वेदः । श्रुतानि च यथाशक्ति शास्त्राणि । दारपरिग्रहादभ्यागारिकोऽस्मि । कामे भुजङ्गता । वक्षम् । तिरस्करिणी जवनिका । प्रेष्ठस्यातिप्रियस्य । नेयः परवशः । स्वैरिणः स्वतन्त्राः । सोमपायिनां सोमपानाम् । 'शिक्षा कल्पो व्याकरणं ज्योतिषं निरुक्तं छन्दोविचितिः' इति षडङ्गानि वेदस्य । अभ्यागारिको गृहस्थः, सम्यग्वृत्तिस्थितो वा । कामे भुजंगता । कामभुजंगता शृङ्गारित्वम् । कामे मदने भुजंगता ज्ञेया, न मादृशेषु । नहि मे काचिद्भजं बाहुं गता प्राप्तेत्यर्थः । लोकद्वयेत्यादिना त्रिवर्ग- स्यानुपघातं दर्शयति । शास्त्रविरोधप्रसङ्गात । 'शतायुर्वे पुरुषः'; कालमन्योन्यानु- पीठ की ओर बैठे हुए मालवराज के पुत्र से कहा—'यह भारी भुजंग (गुंडा या लम्पट) है।' मालवराज के पुत्र तो चुप रहे जैसे उन्हें हर्ष की बात समझ में न आई और राजसमूह भी सुनकर गुम हो गया । तब क्षणभर चुप रह कर बाण बोला—'हे देव, आप इस प्रकार की बात ऐसे कहते हैं जैसे आप को मेरे विषय में सच्ची बात का पता न हो, या मेरा विश्वास न हो, या आप की बुद्धि दूसरों पर निर्भर रहती है, अथवा आप स्वयं लोक के वृत्तान्त से अनभिज्ञ हों। लोगों के स्वभाव और फैली हुई बातें मनमानी और तरह-तरह की होती हैं । किन्तु श्रेष्ठ जनों को ठीक-ठीक देखना चाहिए । मुझे साधारण समझ कर अनाप-सनाप कल्पना न कीजिए । सोमपान करने वाले वात्स्यायन ब्राह्मणों के वंश में मैं जन्मा हूँ। समय से मेरे यज्ञोपवीत आदि संस्कार हुए हैं । मैने अङ्गों के साथ वेदों का सम्यक् प्रकार से स्वाध्याय किया है । अपनी शक्ति के अनुसार शास्त्रों का भी श्रवण किया है । विवाह के क्षण से लेकर मैं नियमित गृहस्थ हूँ । तो मुझ में क्या भुजंगपना है १? मेरी नई अवस्था की कुछ १. का मे भुजङ्गता-मेरे जीवन में कौन-सी ऐसी बात है जिसे भुजंगता कहा जाय ? भुजंगता उस व्यक्ति में रहती है जो कामी है, मुझमें नहीं, मैंने किसी स्त्री को भुजंगता नहीं की अर्थात् अपनी भुजाओं में आलिंगन नहीं किया । ४ ह० च०
१३० हर्षचरितम् लोकद्वयाविरोधिभिस्तु चापलैः शैशवमशून्यमासीत् । अत्रानपला- पोऽस्मि । अनेनैव च गृहीतविप्रतीसारमिव मे हृदयम् । इदानीं तु सुगत इव शान्तमनसि मनाविव कर्तरि वर्णाश्रमव्यवस्थानां समवर्तिनीव च साक्षाद्दण्डधृति देवे शासति सप्ताम्बुराशिरशनामशेषद्वीपमालिनीं महीं क इवाविशङ्कः सर्वव्यसनबन्धोरविनयस्य मनसाप्यभिनयं कल्पयिष्यति । आसतां च तावन्मानुष्यकोपेताः । त्वत्प्रभावादलयोऽपि भीता इव मधु पिबन्ति । रथाङ्गनामानोऽपि लज्जन्त इवाभ्यनुवृत्तिव्यसनैः प्रियाणाम् । कपयोऽपि चकिता इव चपलायन्ते । शरारवोऽपि सानुक्रोशा इव श्वाप- दगणाः पिशितानि भुञ्जते । सर्वथा कालेन मां ज्ञास्यति स्वामी स्वयमेव । अनपाचीनचित्तवृत्तिग्राहिण्यो हि भवन्ति प्रज्ञावतां प्रकृतयः' इत्यभिधाय तूष्णीमभूत् । भूपतिरपि 'एवमस्माभिः श्रुतम्' इत्यभिधाय तूष्णीमेवा- भवत् । संभाषणासनदानादिना तु प्रसादेन नैनमन्वग्रहीत् । केवलममृत- बद्धं परस्परस्यानुपघातेन त्रिवर्गं सेवत इत्यत एवाह—शैशवमिति । अशून्यमिति । अनेन तदेकासक्तत्वं परिहरति । अनपलापो निरपह्नवः विप्रतीसारः पश्चात्तापः । सुगतो बुद्धः । समवर्ती यमः । मनुष्यस्य भावो मानुष्यकम् । रथाङ्गनामानश्चक्रवाकाः चपलायन्ते चपलत्वमाचरन्ति । शरारवो हिंस्त्राः । श्वापदगणाः प्राणिसमूहाः । पिशितं मांसम् । अनपाचीनाऽमृष्टा । अविपरीतेत्यर्थः निर्दोषा वा । चपलताएँ अवश्य हैं पर ऐसा नहीं जिससे इस लोक या परलोक का कोई विरोध हो, मैं इस बात को इनकार नहीं करता । मेरे हृदय में इसी का बहुत बड़ा पश्चात्ताप है । हे देव, आप भगवान् बुद्ध के समान शान्तचित्त, मनु के समान वर्णाश्रम मर्यादा के रक्षक और यम के समान दण्डधर हैं । सातों समुद्रों की करधनी और समस्त द्वीपों की माला से विराजित पृथिवी पर आपका एकछत्र शासन है । तो कौन ऐसा निडर है जो सब प्रकार से दुखद अभिनय करने की मन से भी कल्पना करता है ? मनुष्यों की तो बात जाने दीजिए, आपके, प्रभाव से भौंरे भी डरते-डरते मधुपान करते हैं, चक्रवाक पक्षी भी अपनी पत्नी के प्रति अतिशय आसक्ति रूप व्यसन से लज्जित होते हैं, वानर भी शंकित होकर चपलता करते हैं, बाघ आदि हिंसक जानवर भी दयावान् होकर पश्चात्ताप करते हुए मांस का भक्षण करते हैं । समय से स्वयं आप मेरे विषय में सब कुछ जान लेंगे क्योंकि बुद्धिमानों का यह स्वभाव होता है कि वे किसी बात में भी विपरीत हठ नहीं रखते ।' इतना कह कर बाण चुप हो गए । सम्राट ने भी 'मैंने ऐसा ही सुना था' बस इतना ही कहा । लेकिन परस्पर बातचीत, आसनदान आदि
द्वितीय उच्छ्वासः १३१ वृष्टिभिः स्नपयन्निव स्नेहगर्भेण दृष्टिपातमात्रेणान्तर्गतां प्रीतिमकथयत् । अस्ताभिलाषिणि च लम्बमाने सवितरि विसर्जितराजलोकोऽभ्यन्तरं प्राविशत् । बाणोऽपि निर्गत्य धौतारकूटकोमलातपत्विषि निर्वाति वासरे, अस्ताचलकूटकिरीटे निचुलमञ्जरीभांसि तेजांसि मुञ्चति वियन्मुचि मरीचिमालिनि, अतिरोमन्थमन्थरकुरङ्गकुटुम्बकाध्यास्यमानम्रदिष्ठगोष्ठी- नपृष्ठास्वरण्यस्थलीषु, शोकाकुलकोककामिनीकूजितकरुणासु तरङ्गिणीतटीषु, वासविटपोपविष्टवाचाटचटकचक्रबालेष्वालवालावर्जितसेकजलकुटेषु नि- ष्कुटेषु, दिवसविहृतिप्रत्यागतं प्रस्रुतस्तनं स्तनंधये धयति धेनुवर्गमुद्गतक्षीरं क्षुधिततर्णकव्राते, क्रमेण चास्तधराधरधातुधुनीपूरप्लावित इव लोहिताय- मानमहसि मज्जति सन्ध्यासिन्धुपानपात्रे पातङ्गे मण्डले, कमण्डलुजल- बाणोऽपीत्यादौ । बाणोऽप्यस्मिन्सति निवासस्थानमगादिति संबन्धः । 'रीतिः स्त्रियामारकूटम्' इत्यमरः । निर्वाति शाम्यति । निचुलॊ वेतसवृक्षः । भुक्तोद्गी- र्णाहारचर्वणं रोमन्थः । म्रदिष्ठं मृदुतमम् । गोष्ठीपूर्वं गोष्ठीनम् । 'गोष्ठात्खञ्भूत- पूर्वे' । उक्तं च—'गोष्ठं गोस्थानकं तत्तु गोष्ठीनं भूतपूर्वकम्' इति । कोकाश्चक्रवाकाः । तरङ्गिणी नदी । आलवालमावापः । कुटा घटाः । निष्कुटाः स्वगृहारामाः । स्तनं- के प्रसाद से उसे अनुगृहीत नहीं किया। केवल स्नेह से भरे अमृत की वर्षा करने वाले दृष्टिपातमात्र से उसको नहलाते हुए उन्होंने अपने अन्तरतम की प्रीति प्रकट की। जब सूर्य अस्ताचल की ओर लटकने लगे तो सम्राट राजसमूह से विदा लेकर महल के अन्दर चले गए। बाण भी वहाँ से निकल कर अपने निवासस्थान स्कन्धावार में लौट आया। ढलते हुए दिन के आतप का तेज साफ-सुथरे पीतल के समान मंद पड़ गया। अस्ताचल के मुकुट के सदृश सूर्य वेतस की मंजरी जैसे अपने तेजसमूह को छोड़ कर आकाश से हट रहे थे। वनभूमियों के मुलायम बथानों में झुण्ड के झुण्ड मृग बैठ कर धीरे धीरे पगुरी करने लगे। नदी के तटों पर प्रियविरह से शोकाकुल होकर चक्रवाक की पत्नियां करुण आवाज में टर्राने लगीं। गृह के पास वाले उपवनों में चटक नामक छोटे छोटे पक्षी पेड़ों पर बैठ कर चहचहाने लगे और वृक्ष के थल्हों में सींचने के काम में आने वाले घड़े औंध कर रख दिए गए। दिन भर चरने के बाद शाम को टहर कर आई हुई दुधार गायों के स्तन को उनके बछड़े चुभलाने लगे। क्रम से अस्ताचल की गेरू आदि धातुओं के झरनों में डुबकी लगाने से लाल होकर सूर्य संध्या के समुद्र रूपी
१३२ हर्षचरितम् शुचिशायचरणेषु चैत्यप्रणतिपरेषु पाराशरिषु, यज्ञपात्रपवित्रपाणौ प्रकीर्ण- बर्हिष्युत्तेजसि जातवेदसि, हवींषि वषट्कुर्वति यायजूकजने, निद्राविद्राण- द्रोणकुलकलिलकुलायेषु कापेयविकलकपिकुलेष्वारामतरुषु, निर्जिगमि- षति जरत्तरुकोटरकुटीकुटुम्बिनि कौशिककुले, मुनिकरसहस्रप्रकीर्णसंध्या- वन्दनोदबिन्दुनिकर इव दन्तुरयति तारापथस्थलीं स्थवीयसि तारकानि- कुरम्बे, अम्बराश्रयिणि शर्वरीशबरीशिखण्डे, खण्डपरशुकण्ठकाले कवलयति बाले ज्योतिःशेषं सान्ध्यमन्धकारावतारे, तिमिरतर्जननिर्गतासु दहनप्रविष्टदिनकरकरशाखास्विव स्फुरन्तीषु दीपलेखासु, अररसंपुटसं- क्रीडनकथितावृत्तिष्विव गोपुरेषु, शयनोपजोषजुषि जरतीकथितकथे शिश- यिषमाणे शिशुजने, जरन्महिषमषीमलीमसतमसि जनितपुण्यजनप्रजा- ध्यस्तर्णंकश्च वत्सः । धुनी नदी । सिन्धुः समुद्रः । शयः करः । चैत्यमायतनम् । पाराशरिषु भिक्षुषु । हवींषि कुशाः । वषडिति दानक्रियासु मोचनमन्त्रः वषट्- कुर्वति । जुह्वतोत्यर्थः । यायजूकोऽत्यर्थं यजनशीलः । निद्राणोऽलसः । द्रोणः काकः । कलिला आकुलाः । 'कुलायो नीडमस्त्रियाम्' । कापेयं चापलम् । कौशिका उलुकाः । स्थवीयसि स्थूलतरे । शिखण्डो जूटकः । खण्डपरशुः शिवः । करा एव शाखास्तदाकारत्वाङ्गुलयश्च करशाखाः । अररः कपाटः । संक्रीडनं शब्दः । आवृत्तिः स्थगनम् । 'गोपुरं स्यात्पुरद्वारं द्वारमात्रेऽपि गोपुरम्' । उपजोषः सुखम् , तूष्णींभावो वा । जरती वृद्धा । शिशयिषमाणे सुक्षुप्सति । 'यक्षाः स्युः पुण्य- मद्यपात्र में डूबने लगा। भिक्षु लोग कमण्डलु के जल से अपने हाथ-पैर धोकर चैत्यों की वंदना करने लगे। सुक् स्त्रुवा आदि यज्ञपात्रों को हाथ में लेकर यज्ञ करने वाले लोग कुश को बिछा कर प्रज्वलित अग्नि में वषट्कार के द्वारा हविष छोड़ने लगे। उपवन के वृक्षो पर काँव-काँव करते हुए कौवे झपकी लेने की तैयारी करने लगे और बंदर अपनी चपलता छोड़ बैठे। पुराने खंखाड़ वृक्षों के खंधरों में बैठे हुए उल्लू अब निकलना ही चाहते थे। झुग्गे के झुग्गे तारे आकाश की स्थली में छिटकने लगे मानों सन्ध्यावंदन के अवसर पर मुनियों द्वारा छींटे गए जल के बिन्दु हों। अब अन्धकार आकाश में उतरने लगा, मानों रात्रि रूपी भीलनी के केशपाश का जूड़ा हो। वह भगवान् शंकर के कंठ के समान श्याम था और संध्या के बचे हुए तेज को निगलता जा रहा था। अन्धकार के तर्जनार्थ निकली हुई मानों सूर्य के किरण रूपी हाथ की अंगुलियाँ हों ऐसी दीप लेखाएँ चमकने लगीं। गोपुर के दरवाजों के बंद होने की गड़गड़ाहट अब शान्त हो गई। छोटे छोटे बच्चे चुप्पी साध कर बूढ़ी दादी की कहानी
द्वितीय उच्छ्वासः १३३ गरे विजृम्भमाणे भीषणतमे तमीमुखे, मुखरितविततज्यधनुषि वर्षति शरनिकरमनवरतमशेषसंसारशेमुषीमुषि मकरध्वजे, रताकल्पारम्भशो- भिनि शम्भलीसुभाषितभाजि भजति भूषां भुजिष्याजने, सैरन्ध्रीबध्य- मानरशनाजालजल्पाकजघनासु जनीषु, वशिकविशिखाविहारिणीष्वन- न्यजानुप्लवासु प्रचलितास्वभिसारिकासु, विरलीभवति वरटानां वेशन्त- शायिनीनां मञ्जुनि मञ्जीरशिञ्जितजडे जल्पिते, निद्राविद्राणद्रा- घीयसि द्रावयतीव च विरहिहृदयानि सारसरसिते, भाविवासरबीजाङ्कुर- निकर इव च विकीर्यमाणे जगति प्रदीपप्रकरे निवासस्थानमगात् । अकरोच्च चेतसि—'अतिदक्षिणः खलु देवो हर्षः, यदेवमनेकबालचरित- जनाः'। तमी रात्रिः । शेमुषी बुद्धिः । आकल्पो वेशः । शम्भली कुट्टनी । भुजिष्या दासी । सैरन्ध्री प्रसाधनोपचारज्ञा । जनी वशिका शून्या । विशिखा रथ्या । अनन्यजः कामः । अनुप्लवः सहायः । 'कान्तार्थिनी तु या याति संकेतं साभि- सारिका' । 'हंसस्य योषिद्वरटा' । वेशन्तः पल्वलम् । कासारमल्पसरः । मञ्जीरं सुनते-सुनते ऊँघने लगे। बूढ़ी भैंस के शरीर की कान्ति वाला अन्धकार भीषण रूप धारण करने लगा और निशाचर जग पड़े। संसारी लोगों की बुद्धि का अपहरण करने वाला कामदेव अपना धनुष चढ़ा कर टंकार भरने लगा और बाणों की वर्षा करने लगा। वेश्याएँ कुट्टनियों के उपदेश पाकर रतकाल की वेशभूषा के गहने पहन कर शोभने लगीं। प्रसाधिकाओ द्वारा सुन्दरियों की कमर में बाँधी जाने वाली करधनी आवाज करने लगी। अभिसारिकाएँ काम की सहायता से सुनसान गलियों में पंतरा मारने लगीं। ताल तलैयाँ में शयन करने वाली हंसियों की नूपुर के समान आवाज कम पड़ने लगी। निद्रा से अलसाए हुए सारस पक्षियों की जोरदार आवाज विरहियों के हृदय को पिघलाने लगा। चारों ओर दीपक इस प्रकार जलने लगे मानो होने वाले दिन के बीजांकुर निकल आए हों। बाण मन में सोचने लगा—सचमुच देव हर्ष बड़े ही उदार हैं, क्योंकि मेरे बाल्यकाल की अनेक चपलताओं से फैले हुए जनापवाद को सुनकर कुपित होने पर भी मन में मेरे प्रति स्नेह अवश्य रखते हैं। यदि मैं उनकी भौंहों पर चढ़ा हुआ अर्थात् कोपभाजन होता तो कैसे दर्शन देने की कृपा करते ? वह मुझे गुणी देखना चाहते हैं। बड़ों की यही रीति है कि छोटे को बिना मुख से कहे ही केवल व्यवहार से विनय सिखा देते हैं। मुझे धिक्कार है यदि मैं अपने ही दोषों से अंधा होकर केवल
१३४ हर्षचरितम् चौपलोचितकौलीनकोपितोऽपि मनसा स्निह्यत्येव मयि । यद्यहमक्षिगतः स्याम्, न मे दर्शनेन प्रसादं कुर्यात् । इच्छति तु मां गुणवन्तम् । उपदिशन्ति हि विनयमनुरूपप्रतिपत्त्युपपादनेन वाचा विनापि भर्तव्यानां स्वामिनः । अपि च धिङ्मां स्वदोषान्धमानसमनादरपीडितमेवमति- गुणवति राजन्यन्यथा चान्यथा च चिन्तयन्तम् । सर्वथा तथा करोमि, यथा यथावस्थितं जानाति मामयं कालेन' इत्येवमवधार्य चापरेद्यु- र्निष्क्रम्य कटकात्सुहृदां बान्धवानां च भवनेषु तावदतिष्ठत्, यावदस्य स्वयमेव गृहीतस्वभावः पृथिवीपतिः प्रसादवानभूत् । अविशच्च पुनरपि नरपतिभवनम् । स्वल्पैरेव चाहोभिः परमप्रीतेन प्रसादजन्मनो मानस्य प्रेम्णो विश्रम्भस्य द्रविणस्य नर्मणः प्रभावस्य च परां कोटिमानीयत नरेन्द्रणेति । इति श्रीमहाकविबाणभट्टकृते हर्षचरिते राजदर्शनं नाम द्वितीय उच्छ्वासः नूपुरम् । दक्षिणोऽनुकूलः । कौलीनं जनापवादः । अक्षिगतो द्वेष्यः । विश्रम्भ- स्याश्वासस्य । द्रविणस्य धनस्य । नर्मणः परिहासस्य ॥ इति श्रीशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेते द्वितीय उच्छ्वासः समाप्तः । अनादर से दुखी होकर ऐसे गुणवान् राजा के विषय में कुछ अनाप-शनाप सोचने लगूँ । अब मैं सर्वथा वही करूंगा जिससे समय से वे मुझे ठीक पहचान लें ।' बाण ने ऐसा निश्चय किया और दूसरे दिन प्रातःकाल स्कन्धावार से निकल कर मित्रों और रिश्तेदारों के घर में ठहरा । तब तक सम्राट् स्वयं उसके स्वभाव से परिचित होकर उस पर प्रसन्न हो गए और फिर वह राजभवन में आकर जम गया । थोड़े ही दिनों में सम्राट् उस पर अत्यन्त प्रसन्न हुए और अपने प्रसादजनित सम्मान, प्रेम, विश्वास, धन-सम्पत्ति, परिहास और प्रभाव की पराकाष्ठा पर उसे पहुँचा दिया । द्वितीय उच्छ्वास समाप्त १. चापलोपचित ।
तृतीय उच्छ्वासः निजवर्षादितस्नेहा बहुभक्तजनान्विताः । सुकाला इव जायन्ते प्रजापुण्येन भूभुजः ॥ १ ॥ साधूनामुपकर्तुं लक्ष्मीं द्रष्टुं विहायसा गन्तुम् । न कुतूहलि कस्य मनश्चरितं च महात्मनां श्रोतुम् ॥ २ ॥ अथ कदाचिद्विरलितबलाहके, चातकातङ्ककारिणि, कणत्कादम्बे, दर्दुरद्विपि, मयूरमदमुषि, हंसपथिकसार्थसर्वातिथौ, धौतासिनिभनभसि, निजेति । निज आत्मीयः वर्षों लोकः, वृष्टिश्च । वर्षं वर्षमपि निजं समु- चितकालप्राप्तम् । स्नेहः प्रीतिः, आर्द्रता च । भक्ताः अनुरक्ताः ओदनश्च । भक्तं भक्तरूपाणां भूभृतां सुकालानां च प्रजापुण्यं हेतुः। अनेन महानुभाव- पुष्पभूतिवर्णना सूचिता ॥ १ ॥ साधूनामिश्यादिनापि भैरवाचार्योपकारकरणम् , स्वयं लक्ष्मीदर्शनम् , विहा- यसा गमनं भैरवाचार्यस्य, महात्मचरितश्रवणकुतूहलं च निजभ्रात्रादीनां सूचितम् ॥ २ ॥ अथेत्यादौ । एवंविधे शरत्समयारम्भे बन्धून्द्रष्टुं बाणो ब्राह्मणाधिवासमगादिति संबन्धः । विरलिताः न पुनरेकान्ततोपगताः । बलाहका मेघाः । चातकाः स्तोका- ख्याः पक्षिणः । कादम्बाः कृष्णहंसाः । दर्दुरा मण्डूकाः । हंसा एव पथिकसार्थाः, जब प्रजा के पुण्य। का उदय हाता हं तथा सुकाल का भांति राजा भा उत्पन्न हो जाते हैं और अपने राज्य में सर्वत्र प्रेमभाव फैलाते हैं । अनेक अनुचर उनके इस पुण्यकार्य में सहायक हो जाते हैं । इस प्रकार सुकाल में जल की वर्षा से धरती गीली हो जाती है और बहुत अन्न पैदा होता है । तात्पर्य यह कि सौराज्य और सुसमय दोनों प्रजा के पुण्यों के फल-स्वरूप हैं ॥ १ ॥ सज्जनों के उपकार करने के लिए, लक्ष्मी को साक्षात् देखने के लिए, आकाश मार्ग से उड़कर चलने के लिए एवं महात्माओं के चरित सुनने के लिए किसके मन में कुतूहल पैदा नहीं होते ? ॥ २ ॥ एक समय शरद ऋतु का आरम्भ हुआ । आकाश में मेघ कहीं-कहीं छिट-पुट नजर आने लगे । चातक पक्षियों का सन्ताप बढ़ गया । कलहंस चारों ओर आवाज करने लगे । जल के सूख जाने से बेचारे मेढ़कों पर आफत पड़ गई । मौरों का नृत्य-जनित गर्व
१३६ हर्षचरितम् भास्वरभास्वति, शुचिशशिनि, तरुणतारागणे, गलत्सुनासीरशरासने, सीदत्सौदामनीदाम्नि, दामोदरनिद्राद्रुहि, द्रुतवैदूर्यवर्णार्णसि, घूर्णमानमि- हिकालघुमेघमोघमघवति, निमीलन्नीपे, निष्कुसुमकुटजे, निर्मुकुलकन्दले, कोमलकमले, मधुस्यन्दीन्दीवरे, कह्लाराह्लादिनि, शेफालिकाशीतलीकृ- तनिशे, यूथिकामोदिनि, मोदमानकुमुदावदातदशदिशि, सप्तच्छदधूलि- धूसरितसमीरे, स्तबकितबन्धुरबन्धूकावध्यमानाकाण्डसंध्ये, नीराजित- वाजिनि, उद्दामदन्तिनि, दर्पक्षीणौक्षक्रे, क्षीयमाणपङ्कचक्रवाले, बाल- पुलिनपल्लवितसिन्धुरोधसि, परिणामाश्यानश्यामाके, जनितप्रियङ्गु- तेषां निर्मलजलदानादिना स्यात्सर्वातिथित्वम् । शुचिर्निर्मलः । सुनासीर इन्द्रः । सौदामनी विद्युत् । दामोदरो हरिः । अस्य निद्रां द्रोधि यस्तस्मिन् । तदा किल हरिर्विबुध्यत इति वार्ता । अर्णो जलम् । घूर्णमाना भ्रमन्ती या मिहिका नीहार- स्तद्वल्लघवस्तुच्छा ये मेघास्तैर्मोघो निष्फलो मघवानिन्द्रो यत्र तस्मिन् । वर्षाभावा- द्विन्द्रस्य मोघत्वम् । इन्द्रादेशेन हि मेघा वर्षन्ति । मेघवद्वर्जितमित्यन्ये । नीपाः कुटजाः । कन्दलाश्च वृक्षभेदाः । कह्लाराणि सौगन्धिकापरनामानि श्वेतोत्पलानि । जलकुसुमपत्रिकेत्यन्ये । शेफालिका पुष्पभेदः रात्रावेव विकसति । यूथिका हरिणिका । मोदमानानि विकसन्ति । सप्तच्छदाः सप्तपर्णाख्या वृक्षभेदाः । बन्धुरा हृद्याः । बन्धूका बन्धुजीवाख्या वृक्षभेदाः । नीराजिताः कृतशान्तिविधानाः । क्षीबा- ण्यौक्षकानि दान्तसमूहा यत्र तस्मिन् । चक्रवालं समूहः । बालं तत्क्षणमु- भी कम पड़ गया। राही के रूप में हंस पक्षी सबके अतिथि बन कर आने लगे। पानी चढ़ाए खड्ग की भाँति आकाश निर्मल हो गया। सूर्य में चमक बढ़ गई और चन्द्रमण्डल भी निर्मल हो गया। आकाश में तारे बढ़ने लगे। इन्द्रधनुष अब बिलकुल नहीं उगता। बिजलियाँ भी कम पड़ने लगीं। भगवान् विष्णु की नींद टूटी। जल पिघले हुए वैदूर्य के समान निर्मल हो गया। इन्द्र की आज्ञा से बरसने वाले मेघ बर्फ की भाँति इधर-उधर भटकने लगे। कदम्ब के पेड़ झड़ने लगे। कुटज पुष्पों में फूल नहीं रह गए। कन्दल के वृक्षों में कलियों का निकलना बंद हो गया। कमल खिलने लगे। नीले कमल मकरन्द की वर्षा करने लगे। उजले कमल आह्लादित होने लगे। शेफालिका के फूल खिल खिलकर रात को ठंडी करने लगे। जूही की गंध फैलने लगी। कुमुदों के खिलने से दिशाएँ उज्ज्वल हो गईं। सप्तपर्ण के वृक्ष की धूल से हवा कुछ मैली बहने लगी। लाल-लाल सुन्दर बन्धूक- पुष्प खिल कर असमय में सन्ध्या का दृश्य खड़ा करने लगे। युद्ध की यात्रा में घोड़ों के शान्तिकर्म होने लगे। हाथी मद से उन्मत्त होने लगे। साँड़ गर्वीले और पागल होकर डकारने लगे। जगह-जगह के कीचड़ सूखने लगे। कुछ-कुछ भींगी रेतों पर नदियों के
तृतीय उच्छ्वासः १३७ मञ्जरीरजसि, कठोरितत्रपुसत्वचि, कुसुमस्मेरशरे, शरत्समयारम्भे राज्ञः समीपाद्वाणो बन्धून्द्रष्टुं पुनरपि तं ब्राह्मणाधिवासमगात् । समुपलब्धभूपालसंमानातिशयपरितुष्टास्त्वस्य ज्ञातयः श्लाघमाना निर्ययुः । क्रमेण च कांश्चिदभिवाद्यमानः कैश्चिदभिवाद्यमानः, कैश्चिच्छिरसि चुम्ब्यमानः, कांश्चिन्मूर्ध्नि समाजिघ्रन्, कैश्चिदालिङ्ग्य- मानः, कांश्चिदालिङ्गन्, अन्यैराशिषानुगृह्यमाणः, पराननुगृह्णन्, बहु- बन्धुमध्यवर्ती परं मुमुदे । संभ्रान्तपरिजानोपनीतं चासनमासीनेषु गुरुषु भेजे । भजमानश्चादरादिसत्कारं नितरां ननन्द । प्रीयमाणेन च मनसा सर्वांस्तानपर्यपृच्छत्—'कच्चिदेतावतो दिवसान्सुखिनो यूयम् ? अप्रत्यूहा वा सम्यक्करणपरितोषितद्विजचक्रा क्रातवी क्रिया क्रियते ? यथावद्विक- लमन्त्रभाञ्जि भुञ्जते वा हवींषि हुतभुजः ? यथाकालमधीयते वा वटवः ? प्रतिदिनमविच्छिन्नो वा वेदाभ्यासः ? कच्चित्स एव चिरंतनो यज्ञविद्या- तजलम् । सिन्धवो नद्यः । श्यामाको नीवारः । प्रियङ्गुर्चाङ्गिभेदः । त्रपुसं लाडुकम् । सभ्रान्तः सत्वरः । सत्कारं पूजाम् । कच्चिदितीष्टप्रश्ने । प्रत्यूहो विघ्नः । सम्य- क्करणं यथाशास्त्रं संपादनम् । क्रतूनां यज्ञानामियं क्रातवी । अधीयत इति । नट बनने लगे । सावाँ के धान पककर कुछ-कुछ सूखने लग गए । कंगनी की मंजरियों में पराग भर आया । त्रपुष नामक फल के छिलके कड़े हो गए । शर नामक तृणों में फूल खिल उठे । तब बाण अपने बन्धु-बान्धवों को देखने के लिए फिर राजा के पास से ब्राह्मणों के उसी (प्रीतिकूट नामक) निवासस्थान में चला आया । सम्राट् के द्वारा अतिशय सम्मान पाकर पधारे हुए बाण को जब गाँव के भाई-बन्धुओं ने सुना तो अत्यन्त हर्ष के साथ उसके स्वागत के लिए प्रशंसा करते हुए निकल पड़े । बाण ने क्रम से कुछ का अभिवादन किया और कुछ से अभिवादित हुआ; कुछ ने उसका सिर चूमा और उसने कुछ के सिर सूँघे; कुछ ने उसका आलिङ्गन किया और कुछ से वह स्वयं गले मिला; दूसरों ने अपने आशीर्वादों से उस पर अनुग्रह किया और उसने भी कुछ लोगों को असीस कर अनुगृहीत किया । इस प्रकार बाण अपने बहुत से भाई-बन्धुओं के बीच आकर अत्यन्त हर्षित हुआ । परिजन दौड़े और शीघ्र आसन लाकर बिछा दिया । जब गुरुजन बैठ गए तब बाण भी एक आसन पर बैठा और परिजनों द्वारा पूजा- सत्कार पाकर बड़ा ही प्रसन्न हुआ । गद्गद मन से उसने सब लोगों से पूछा—'आप लोग इतने दिनों तक सुख से तो रहे ? ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करने वाले यज्ञ के कार्य शास्त्र
१३८ हर्षचरितम् कर्मण्यभियोगः ? तान्येव व्याकरणे परस्परस्पर्धानुबन्धाबन्ध्यदिवस- दर्शितादराणि व्याख्यानमण्डलानि, सैव वा पुरातनी परित्यक्तान्यकर्तव्या प्रमाणगोष्ठी, स एव वा मन्दीकृतेतरशास्त्ररसो मीमांसायामतिरसः ? कच्चित एवाभिनवसुभाषितसुधावर्षिणः काव्यालापाः ?' इति । अथ ते तमूचुः—'तात ! संतोषजुषां सततसंनिहितविद्याविनोदानां वैतानवह्निमात्रसहायानां कियन्मात्रं नः कृत्यं सुखितया सकलभुवनभुजि भुजङ्गराजदेहदीर्घे रक्षति क्षितिं क्षितिभुजे । सर्वथा सुखिन एव वयम् , विशेषेण तु त्वयि विमुक्तकौसीद्ये परमेश्वरपार्श्ववर्तिनि वेत्रासनमधिति- ष्ठति । सर्वे च यथाशक्ति यथाविभवं यथाकालं च संपाद्यन्ते विप्रजनो- वेदपाठो बालानामेवोचितः । प्रमाणं तर्कविद्या । मीमांसा ब्रह्मनिदर्शनम् । अत एवाह—अतिरस इति । तात इति पूजावचनम् । वैतानाः क्रातवाः । कौसीद्यमालस्यम् । निष्प्रयत्न- तेत्यर्थः । के अनुसार बिना किसी विघ्न-बाधा के तो होते रहे ? यज्ञ की अग्नियों में नियमानुसार मंत्र के साथ-साथ हविष भोजनार्थ तो मिल रहा है ? बटु लोगों का समय से अध्ययन तो चल रहा है ? वेदों का प्रतिदिन होने वाला अभ्यास विच्छिन्न तो नहीं होता ? यज्ञ- सम्बन्धी विद्या और कर्मों के प्रति वही पुराना भाव तो है न ? परस्पर एक दूसरे को जीतने की इच्छा से निरन्तर दिन को सफल करने वाले व्याकरण-शास्त्र के वे ही व्याख्यान मण्डल तो अब भी जम रहे हैं न ? दूसरे कार्यों को छोड़-छाड़ कर न्याय शास्त्र पर विचार करने वाली गोष्ठी तो वही पुरानी आज भी चल रही है न ? दूसरे शास्त्रों के रस को फीका कर देने वाले मीमांसाशास्त्र में रस तो वही मिलता है न ? नये-नये सुभाषितों की सुधा बरसाने वाले काव्यालाप तो वही हो रहे हैं न ?' तब वे बोले—'हे तात, जब समस्त भुवन पर शासन करने वाला और शेषनाग के समान दीर्घ शरीर वाला राजा सुखपूर्वक पृथिवी की रक्षा करने में संलग्न है तो थोड़े ही में सन्तोष कर लेने वाले, हमेशा विद्या के विनोद में लगे रहने वाले तथा केवल यज्ञ की अग्नि को अपना सहायक मानने वाले हम ब्राह्मणों का कार्य ही कितना है ? हम सब प्रकार से सुखी हैं, विशेष तो सुखी इसलिए हैं कि तुम आलस्य छोड़कर महाराजाधिराज हर्ष के नजदीक वेत्रासन पर विराजमान हो । अपनी शक्ति के अनुसार और अपने विभव के अनुसार हमलोग समय से ब्राह्मण के लिए उचित सब काम करते रहे हैं।' इस प्रकार बातें हुईं, स्कन्धावार के सम्बन्ध की चर्चा भी छिड़ी, लड़कपन में खेले हुए खेलों की याद
तृतीय उच्छ्वासः १३६
चिताः क्रियाकलापाः' इत्येवमादिभिरालापैः स्कन्धावारवार्ताभिश्च शैशवातिक्रान्तक्रीडानुस्मरणैः पूर्वजकथाभिश्च विनोदितमनास्तैः सह सुचिरमतिष्ठत् । उत्थाय च मध्यन्दिने यथाक्रियमाणाः स्थितिरकरोत् । भुक्तवन्तं च तं सर्वे ज्ञातयः पर्यवारयन् । अत्रान्तरे दुकूलपट्टप्रभवे शिखण्ड्यपाङ्गपाण्डुनी पौण्ड्रे वाससी वसानः स्नानावसानसमये वन्दितया तीर्थमृदा गोरोचनया च रचि- ततिलकः, तैलामलकमसृणितमौलिः, अनुच्चचूडाचुम्बिना निबिडेन कुसु- मापीडकेन समुद्भासमानः, असकृदुपयुक्तताम्बूलविरलाधररागकान्तिः, एकशलाकाञ्जनजनितलोचनरुचिः, अचिरभुक्तः, विनीतमार्यं च वेषं दधानः, पुस्तकवाचकः सुदृष्टिराजगाम । नातिदूरवर्तिन्यां चासन्यां निषसाद । स्थित्वा च मुहूर्तभिव तत्कालापनीतसूत्रवेष्टनमपि नख-
अत्रेत्यादौ । सुदृष्टिः पुस्तकवाचक आजगामेति संबन्धः । दुगूलेति । एकस्माद्दु- गूलपट्टाद्दीर्घाच्छित्त्वा गृहीते, शिखण्ड्यपाङ्गपाण्डुरत्वेन कार्कश्यमपि दर्शितम् । पौण्ड्रे पुण्ड्रदेशजे । गोरोचना रक्षाद्रव्यभेदः । मौलयः केशाः । अनुच्चेति । अदीर्घ- तया कुसुमापीडकस्य श्रोत्रियत्वं विनीतत्वं चास्य दर्शितम् । निबिडेन संहत- पुष्पेण । रुचिरं नैर्मल्यम् । भोजनं भुक्तमचिरं भुक्तं यस्य सः । अनेन तस्यानवखि- न्नसत्त्वमुक्तम् । आसन्द्यां वेत्रपीठिकायाम् । स्थित्वेत्यादौ । पुराणं पपाठेति संबन्धः ।
आई, पुराने लोगों की बातें चल पड़ीं । इस तरह बाण उन लोगों के साथ देर तक मन- बहलाव की बातचीत में बैठा रहा । मध्याह्न के समय उठकर उसने सबकी भाँति स्नान- ध्यान किए । तत्पश्चात् भोजन के बाद ही सबके सब भाई-बन्धु फिर उसे घेर कर बैठ गए । इसी बीच बाण का पुस्तक-वाचक सुदृष्टि वहाँ आ पहुँचा । वह पुंड्र देश के बने दुकूल-पट्ट के थान में से तैयार किए, मोर की आँखों के कोने की भाँति दो श्वेत वस्त्र पहने था । स्नान करने के बाद उसने माथे पर मंत्र से पवित्र तीर्थ की मिट्टी और गोरोचना से तिलक लगाया था । उसके सिर के बालों में आँवले के तेल की मालिश से चिकनाहट थी । लटकती हुई शिखा से लगी हुई फूलमाला से वह शोभित हो रहा था । हमेशा पान चबाते रहने से उसके अधर की कांति खिल उठी थी । उसकी आँखों में अंजन की बारीक रेखा खिंची हुई थी । वह अभी-अभी भोजन करके उठा था । उसका वेष विनय से भरा हुआ और सौम्य था । वह कुछ दूर रखे हुए बेंत के आसन पर बैठ गया । क्षण भर ठहर कर तत्काल उसने सूत की बेठन खोल दी, फिर भी उसके नखों की किरणें पुस्तक में सह
१४० हर्षचरितम् किरणैर्मृदुमृणालसूत्रैरिवावेष्टितं पुस्तकं पुरोनिहितशरशलाकायन्त्रके निधाय, पृष्ठतः सनीडसंनिविष्टाभ्यां मधुकरपारावताभ्यां वांशिकाभ्यां दत्ते स्थानके प्राभातिकप्रपाठकच्छेदचिह्नीकृतमन्तरं पत्रमुत्क्षिप्य, गृहीत्वा च कतिपयपत्रलघ्वीं कपाटिकाम्, क्षालयन्निव मषीमलिनान्य- क्षराणि दन्तकान्तिभिः, अर्चयन्निव सितकुसुममुक्तिभिर्ग्रन्थम्, मुख- संनिहितसरस्वतीनूपुररवैरिब गमकैर्मधुरैराक्षिपन्मनांसि श्रोतॄणां गीत्या पवमानप्रोक्तं पुराणं पपाठ । तस्मिंश्च तथा श्रुतिसुभगगीतिगर्भं पठति सुदृष्टौ नातिदूरवर्ती बन्दी सूचीबाणस्तारमधुरेण गीतिध्वनिमनुवर्तमानः स्वरेणेदमार्या- युगलमगायत्— 'तदपि मुनिगीतमतिपृथु तदपि जगद्व्यापि पावनं तदपि । सनीडे समीपे । प्रपाठको वाचकः, प्रपठन वा । तस्य तत्र वा छेदः । इयन्मात्रं वाचितं नान्यदिति तेन चिह्नीकृतं लक्ष्यीकृतम् । गमयन्ति रागस्वरूपमिति गमकाः । असाधारणानि स्वराणां निमीलनानि । यानि लक्ष्यज्ञैष्वान्तरमार्ग इति प्रसिद्धास्तैर्गमकैः स्वरयति विशेषैः । पवमानो वायुः । बन्दी स्तुतिपाठकः । पृथुरादिनृपोऽपि । पवमानं वायुप्रोक्तमपि । गीतपक्षे— वंशेन वेणुनानुगमो ययोस्तौ विवादिनौ स्वरौ विश्रुत्यन्तरौ गान्धारनिषादौ स्वरौ यत्र तत् । करणमपदः । सताल आविद्धः स्वरसंनिवेशः, उच्चारणस्थानं वा । भारतं प्रकार फैल गई मानों मृणालसूत्रों में बाँधी गई हो । पुस्तक को उसने सरकण्डों के बने पीढ़े पर रख दिया । पीछे समीप में बैठे हुए मधुकर और पारावत नामक बंशी बजाने वाले बाण के दो मित्रों ने जब अवकाश दिया, तब सुदृष्टि ने प्रभात में पढ़े हुए विराम के बीच चिह्न के रूप में लगाए हुए पन्ने को निकाल कर कुछ पन्नों के साथ हल्की दफ्ती को उठा लिया और मानों अपने दाँतों की किरणों से स्याही के अक्षरों को धोता हुआ, या अपनी मुस्कान के फूलों से ग्रन्थ की अर्चना करता हुआ, गमक नामक स्वरों से मुख में सन्निहित सरस्वती के नूपुरों की आवाज का अनुकरण करके गीत के द्वारा सुनने वालों के मन को रमाता हुआ वायुपुराण का पाठ करने लगा । उस प्रकार जब सुदृष्टि मधुर गीत के साथ साथ पाठ कर रहा था, तभी सूचीबाण नामक बन्दी ने ऊंचे स्वर में उसी गीत की लय का अनुकरण करते हुए दो आर्या-छन्दों का गान किया— वायु-पुराण मुनि व्यास द्वारा गीत है, अत्यन्त बड़ा भी, जगत् में विख्यात भी और
तृतीय उच्छ्वासः १४१ हर्षचरितादभिन्नं प्रतिभाति हि मे पुराणमिदम् ॥ ३ ॥ वंशानुगमविवादि स्फुटकराणं भरतमार्गभजनगुरु । श्रीकण्ठविनिर्यातं गीतमिव हर्षराज्यमिव ॥ ४ ॥ तच्छ्रुत्वा बाणस्य चत्वारः पितामहमुखपद्मा इव वेदाभ्यासपवित्रित- मूर्तयः, उपाया इव सामप्रयोगललितमुखाः, गणपतिः, अधिपतिः, तारा- पतिः, श्यामल इति पितृव्यपुत्रा भ्रातरः, प्रसन्नवृत्तयः, गृहीतवाक्याः, कृतगुरूपदन्यासाः, न्यायवादिनः, सुकृतसंग्रहाभ्यासगुरवो लब्धसाधु- भरतमुनिकृतो ग्रन्थः । श्रीकण्ठः श्रीयुक्तः कण्ठः वैस्वर्यादिदोषाभावात् । यद्वा,- श्रीकण्ठो हर एव सर्वविद्यानां तत एवोत्पत्तेः । हर्षराज्यमपीदृशमेव । तथा च वंशं कुलमनुगच्छत्यनुसरति यत्तद्वंशानुगम् । तथाविद्यमाना विवादिनो यत्र तद्विवादि सौराज्यम् । न केचित्तत्र विवदन्ते । करणमधिकरणं यत्र विद्यापरीक्षा धर्मनिर्णयो वा क्रियते, व्यापारो वा । भरतो नाम पूर्वं राजाभूत् । श्रीकण्ठो देश- भेदः। गीतमपि हर्षस्य प्रमोदस्त्य राज्यमिव । तस्य विजृम्भमाणत्वात् । तच्छ्रुत्वेत्यादौ। बाणस्य चत्वारो भ्रातरः परस्परस्य मुखानि व्यलोकयन्निति संबन्धः । तच्छ्रु- त्वेत्यादिनास्य प्रकरणस्य प्रकृतानुगुणत्वं दर्शितम् । तेषां च प्रस्ताववेदित्वम् । मुखपद्मा अपि चत्वारः सामवेदभेदाः । सान्त्वं च मुखमारम्भोऽपि । प्रसन्ना शुद्धा, सुबोद्धा च । वृत्तिर्वर्तनम् , सूत्रविवरणं च । गृहीतमादृतम् , ज्ञातार्थं च । वाक्यं विवरणम् , वार्तिकं च । यत्करणात्कात्यायनो वार्तिककार उच्यते । कृतो गुरूणां संबन्धिनि पदे स्थाने न्यासः स्थितियेषां ते । सर्वेणोपदेष्टृपदे स्थापितास्त इत्यर्थः । यद्वा;—कृतो गुरुणि पदे न्यासो यैः । महति पदे स्थिता इत्यर्थः । अन्यत्र,-कृतोऽ भ्यस्तो गुरुपदे दुर्बोधशब्दे न्यासो वृत्तिविवरणं यैः । न्यायो युक्तम् , उपपत्य- नुपपत्तिविचारश्च । सुकृतं पुण्यम् , सुष्ठु विहितं च । संग्रहः संचयः, व्याकरणे पवित्र भी हैं, फिर भी यह पुराण मेरी समझ में हर्षचरित से अभिन्न ही प्रतीत हो रहा है॥३॥ यह गीत हर्ष के राज्य के समान है । गीत वंशी वाद्य से अनुगत तथा राज्य वंश- परम्परागत है । गीत में दो परस्पर विरोधी गान्धार और निषाद स्वर नहीं हैं तथा राज्य में कोई विवाद करने वाला विद्रोही नहीं है । गीत के ताल और लय बिलकुल स्पष्ट हैं तथा राज्य के करण अर्थात् विद्यापरीक्षा या धर्मनिर्णय के स्थान प्रसिद्ध हैं । गीत संगीतशास्त्र के रचयिता भरत मुनि द्वारा प्रदर्शित मार्ग के अनुसार होने से महनीय है तथा राज्य भरत नामक प्राचीन राजा की नीति का अनुसरण करने से महनीय है । गीत मधुर कंठ से निकला हुआ है तथा राज्य श्रीकंठ नामक स्थान से निकला हुआ है ॥४॥ दोनों आर्याओं को सुन कर बाण के चचेरे भाई—गणपति, अधिपति, तारापति
१४२ हर्षचरितम् शब्दा लोक इव व्याकरणेऽपि सकलपुराणराजर्षिचरिताभिज्ञाः, महाभारत- तभावितात्मानः, विदितसकलेतिहासाः, महाविद्वांसः, महाकवयः, महापुरुषवृत्तान्तकुतूहलिनः, सुभाषितश्रवणरसरसायनाः, वितृष्णाः, वयसि वचसि यशसि तपसि सदसि महसि वपुषि यजुषि च प्रथमाः, पूर्वमेव कृतसंगराः, विवक्षवः, स्मितसुधाधवलितकपोलोदराः, परस्परस्य मुखानि व्यलोकयन् । अथ तेषां कनीयान्कमलदलदीर्घलोचनः श्यामलो नाम बाणस्य व्याडिकृतो ग्रन्थश्च । गुरवो महान्तः, उपाध्यायाश्च । साधुशब्दः साधुवादः, साधवोऽमी इत्येवंरूपो वा । साधवः संस्कृताः, शब्दाश्च । पाण्डित्यप्रकटनेनानेन द्रष्टुमिष्टस्य वस्तुन उत्कृष्टतोच्यते । सकलेत्यादिविशेषणत्रयेण द्विजराजादिवृत्तान्तेऽ- भिज्ञतोच्यते । महापुरुषेत्यादि । हर्षचरिते शुश्रूषाया हेतुः । सुभाषितेत्यादि । स्वकाव्यप्रशंसासूचनपरम् । सदसि सभायाम् । संगरं संकेतं । कनीयानिति । अनेन प्रियवचनत्वमस्य दर्शितम् । ब्रूहीति दत्तसंज्ञः । तात और श्यामल एक दूसरे को देखने लगे । ब्रह्मा के चार मुख-कमलों की भांति वे वेदाभ्यास करने से पवित्र थे । साम-दान आदि चार उपायों के समान साम अर्थात् सान्त्वनापूर्ण वचन या सामवेद का प्रयोग करने से उनके मुख सुन्दर थे । लोक के समान व्याकरण में भी उनकी वृत्ति अर्थात् जीविका शुद्ध थी या वृत्ति अर्थात् सूत्र के विवरण में सुबोध थे, वाक्य अर्थात् वचन का आदर करते थे या वाक्य अर्थात् वार्तिकों के अर्थ का ज्ञान रखते थे, गुरु पद अर्थात् श्रेष्ठ स्थान पर प्रतिष्ठित थे या उन्होंने दुर्बोध पदों में न्यास अर्थात् वृत्ति का अभ्यास किया था, न्याय अर्थात् युक्ति की बात बोलते थे या उपपत्ति और अनुपपत्ति का विचार रखते थे, पुण्य के संगृहीत करने के अभ्यास में प्रवीण थे या व्याडि द्वारा सुविरचित संग्रह नामक ग्रन्थ का अध्यापन करते थे, उन्हें साधुवाद प्राप्त थे या संस्कृत शब्दों का उन्होंने अभ्यास कर लिया था । समस्त पुराणों में आए हुए राजर्षियों के चरित उन्हें ज्ञात थे । उन्होंने महाभारत का अनुशीलन किया था । वे इतिहास के पंडित थे । महाविद्वान् और महाकवि थे । महापुरुषों के वृत्तान्त को सुनने के लिए उनके मन में विशेष कुतूहल था । सुभाषित के रस के वे रसायन थे ( अर्थात् सुभाषितों को सुना कर आनन्दित करते थे) । उनमें तृष्णा बिलकुल न थी । वचन में, अवस्था में, यश में, तप में, सभा में, तेज में, शरीर में, यज्ञ में सर्वत्र उनकी सबसे पहले गणना होती थी । वे पहले से ही परामर्श करके वहाँ आए थे और कुछ बोलना चाहते थे । मुसकान की सुधा से उनके कपोलों के मध्यभाग धवलित हो गए थे । तत्पश्चात् उन चारों में सबसे छोटा, कमल के समान बड़ी-बड़ी आँखों वाला श्यामल,
तृतीय उच्छ्वासः १४३ प्रेयान्प्राणानामपि वशयिता दत्तसंज्ञस्तैः सप्रणयं दशनज्योत्स्नास्नापित- ककुभा मुखेन्दुना बभाषे—'तात बाण ! द्विजानां राजा गुरुदारग्रहण- मकार्षीत् । पुरूरवा ब्राह्मणधनतृष्णया दयितेनायुषा व्ययुज्यत । नहुषः परकलत्राभिलाषी महाभुजङ्ग आसीत् । ययातिराहितब्राह्मणी पाणि- बाणेत्यादिना पूर्वराजदोषोद्भावनद्वारेण हर्षस्य गरीयस्तां ख्यापयति । अत्र क्वचि- च्छब्दद्वारेण क्वचिच्चार्थद्वारेण यथायोग्यं दोष उद्भाव्यः । चन्द्रादिशब्दाभिधानेन राजत्वप्रतीतिर्न स्यादिति द्विजानां राजेत्युक्तम् । गुरुर्बृहस्पतिः, पित्राद्याश्च गुरवः । अत्र कथा—पुरा पूर्णचन्द्रमुदितं वीक्ष्य कामयमानां गुरुपत्नीं ताराख्यामभिगच्छत् । तदसहमानेन च बृहस्पतिना यदेन्द्राद्याः प्रोत्साहितास्तदानयनाय, तदा चन्द्रेण शुक्रः शरणमाश्रितः । ततः शुक्रप्रेरितैर्दैत्यैः सह तेषामन्योन्यं दिव्यं वर्षसहस्रं युद्धमासीत् । तारापि नारदबोधिता सगर्भा सती पुनर्गुरुमेवाभिगतेति । दयितेना- युषा प्रियेण जीवितेन पुत्रेणायुर्नाम्ना । कथा चात्र—पुरूरवाः पूर्वां दिशं जेतुं गच्छ- न्केनाप्याहृतप्रभूतधनेन विप्रेण यज्ञे निमन्त्रितो लोभाच्चिस्तस्तद्धनं जिहीर्षुस्तच्छा- पान्नष्टः । तस्मिन्मृते स विप्रो नृपं विना प्रजा निवर्तेत इति ज्ञात्वा तदायुषा राजर्षिमायुर्नामानमजीजनदिति । भुजङ्गो विटोऽपि । पुरा वृत्रं हत्वा ब्रह्महत्यया शक्रः पलाय्य मृणालच्छिद्रान्तरे यदातिष्ठत्तदा नहुषो यज्वा शूरैश्च देवैरिन्द्रत्वं नीतो दर्पाच्छचीं प्रार्थयमानो बृहस्पत्युपदेशात्तयोक्तो यथा—‘यानेनापूर्वेणागच्छ' इति । ततो ब्रह्मर्षीन्वाहनीकृत्य व्रजन्कामवशाच्चरयमाणः पादेनाताड्य, ‘सर्प सर्प' इति चोदयन्नगस्त्येन ‘सर्पो भव' इति शप्तः सर्पोऽभवत् । पपातेति नरकगामी बभूव, स्वाचारभ्रष्टत्वात्पतितश्चाभूत् । वृषपर्वणोऽसुरराजस्य दुहित्रा शर्मिष्ठया कल- हायमाना ‘अस्मद्भृत्यसुता वराकी भूत्वा स्पर्धते' इत्युक्त्वा कूपान्तःपातितां शुक्र- सुतां देवयानीं ज्ञात्वा ययातिर्वनविहारी पाणिं गृहीत्वोजहार । गते ययातौ परि- भवोद्विग्ना वन एवावसत् । अथ नारदाद्यथावृत्तं ज्ञात्वा वृषपर्वा शुक्रस्य प्रार्थनामक- जो बाण के प्राणों को भी वश में रखने वाला प्रिय था, बड़ों का इशारा पाकर अपने मुखचन्द्र से प्रवाहित होने वाली दाँतों की चाँदनी से दिशाओं को नहलाता हुआ बोला—'तात बाण, द्विजों के राजा चन्द्र ने गुरुपत्नी तारा का गमन किया । पुरूरवा ब्राह्मण के धन को लोलुपता के कारण अपनी प्रिय आयु से वियुक्त हो गया । नहुष पराई स्त्री की इच्छा करने के कारण महालम्पट बना । ययाति ब्राह्मणकन्या के साथ विवाह करके पतित हुआ । राजा सुद्युम्न तो स्त्रीरूप ही बन गया था । जन्तु ( जन्तु नामक पुत्र या प्राणियों ) के वध करने से राजा सोमक की निर्दयता तो प्रसिद्ध ही है । राजा मान्धाता मार्गण अर्थात् याचना या युद्ध के व्यसन के कारण पुत्र-पौत्रों के साथ रसातल
१४४ हर्षचरितम् ग्रहणः पपात । सुद्युम्नः स्त्रीमय एवाभवत् । सोमकस्य प्रख्याता जगति जन्तुवधनिर्घृणता । मांधाता मार्गणव्यसनेन सपुत्रपौत्रो रसातलमात् । पुरुकुत्सः कुत्सितं कर्म तपस्यन्नपि मेकलकन्यायामकरोत् । कुवलयाश्वो रोत् । संदिष्टा च—'कुमारी शतपरिवारवतीयं शर्मिष्ठा यदा मे दास्यं करोति तदा- गच्छामि' इति । शुक्रशापभीतेन वृषपर्वणा संपादितमनोरथा देवयानी पुनरपि दासीभूतया शर्मिष्ठया सह वने क्रीडन्ती ययातिमायान्तं दृष्ट्वा बभाषे—'क्वाद्य मां त्यक्त्वा पाणिग्राहो महानुभावो गतोऽभूत्' इति । ततो ययातिर्ब्राह्मणीत्वादनाङ्गी- कुर्वंस्तत्पित्रा शोकविधुरेण शुक्रेण 'पापं मास्तु, क्रियतामयं विधिः' इति बुद्ध्या तां स्वीचक्रे । कालेन चासौ पपातेति । सुद्युम्नो राजा, शोभनं द्युम्नं बलमस्येति च स्त्री- मयो महिलाकृतिः, कान्तानुरक्तश्च । योऽत्र तोयमुपयोक्ष्यति स स्त्रीत्वमापत्स्यत इति भगवता भवान्याभ्यर्थितेन भवेन शप्तः सन्ससरः पीत्वा तोयं सुद्युम्नो मृगया- विहारी स्त्रीमयोऽभूदिति । जन्तुर्नाम सोमकस्य राज्ञः पुत्रः, जन्तवः प्राणिनश्च । सोमकस्य राज्ञो जन्तुर्नामैकः पुत्रोऽभूत् । स चैकपुत्रत्वादपुत्रत्वं वरमिति जानद्म- द्विप्रैः पुरोधसाम्यधायि—'बहुपुत्रांश्चेदच्छसि तदास्य सुतस्य वपया होमः क्रिय- ताम् । ततो यावत्यो धूममाजिघ्रन्ति ताः पुत्रैर्युज्यन्ते' इति । स चापि घृणामपहाय तथा कारितवानिति । मार्गणं याच्ञा, शराश्च मार्गणाः । मार्गणेषु व्यसनं युद्धं व्यसनम् । रसातलंगमदधस्ताज्जगाम । विनष्ट इत्यर्थः । रसातलं पातालं च । मांधाता च भुवं जित्वा स्वर्गं जेतुं गतः । शकेणोक्तम्—'पातालं जित्वागतस्य तव दास्यं यास्यामि' । स च तद्वचनादविचार्यैव रसातलं गतस्तत्र हरप्रसादासादित- त्रिशूलेन लवणानाम्ना दानवेन ससुतसैन्योऽन्तमनीयत' इति । मेकलकन्या नर्मदा । पुरुकुत्सः पुरा तपश्चरन्नर्मदायां स्नानं कुर्वन्कामप्यञ्जनामालोक्य कामाविष्टो नीतिमत्ससर्जेति । भुजङ्गाः सर्पाः, विटा अपि । अश्वतरकन्यां वडवामपि । कुवल- याश्वो राजा मृगयाक्रीडाप्रसङ्गेन घर्मातुरो मज्जनरभसेन सरसीमवतीर्णो रसातलं प्राप्तोऽश्वतराभिधां नागकन्यामूढवानिति । प्रथम आद्यः, प्रधानश्च । कुत्सितः पुरुषः में चला गया (अर्थात् पतित हुए या पाताल में पहुँचे और मारे गए)। राजा पुरुकुत्स ने तपस्या के अवसर में किसी सुन्दरी को देखकर नर्मदा में स्नान करते हुए कुत्सित कर्म किया । राजा कुवलयाश्व ने भुजंगलोक में जाकर ( लम्पट लोगों की प्रेरणा से या नागलोक में जाकर ) अश्वतरा नामक नागकन्या (या घोड़ी) को भी नहीं छोड़ा। आदिराज पृथु पहला कुत्सित पुरुष है जिसने पृथिवी को अभिभूत किया। राजा नृग गिरगिट बनने पर भी वर्णसंकर (अर्थात कई रंग की मिलावट या कई ब्राह्मण क्षत्रिय आदि वर्णों के वीर्य से उत्पन्न) ही बना रहा। सौदास नामक राजा ने व्याकुल पृथिवी