भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 177

१३२ हर्षचरितम् शुचिशायचरणेषु चैत्यप्रणतिपरेषु पाराशरिषु, यज्ञपात्रपवित्रपाणौ प्रकीर्ण- बर्हिष्युत्तेजसि जातवेदसि, हवींषि वषट्कुर्वति यायजूकजने, निद्राविद्राण- द्रोणकुलकलिलकुलायेषु कापेयविकलकपिकुलेष्वारामतरुषु, निर्जिगमि- षति जरत्तरुकोटरकुटीकुटुम्बिनि कौशिककुले, मुनिकरसहस्रप्रकीर्णसंध्या- वन्दनोदबिन्दुनिकर इव दन्तुरयति तारापथस्थलीं स्थवीयसि तारकानि- कुरम्बे, अम्बराश्रयिणि शर्वरीशबरीशिखण्डे, खण्डपरशुकण्ठकाले कवलयति बाले ज्योतिःशेषं सान्ध्यमन्धकारावतारे, तिमिरतर्जननिर्गतासु दहनप्रविष्टदिनकरकरशाखास्विव स्फुरन्तीषु दीपलेखासु, अररसंपुटसं- क्रीडनकथितावृत्तिष्विव गोपुरेषु, शयनोपजोषजुषि जरतीकथितकथे शिश- यिषमाणे शिशुजने, जरन्महिषमषीमलीमसतमसि जनितपुण्यजनप्रजा- ध्यस्तर्णंकश्च वत्सः । धुनी नदी । सिन्धुः समुद्रः । शयः करः । चैत्यमायतनम् । पाराशरिषु भिक्षुषु । हवींषि कुशाः । वषडिति दानक्रियासु मोचनमन्त्रः वषट्- कुर्वति । जुह्वतोत्यर्थः । यायजूकोऽत्यर्थं यजनशीलः । निद्राणोऽलसः । द्रोणः काकः । कलिला आकुलाः । 'कुलायो नीडमस्त्रियाम्' । कापेयं चापलम् । कौशिका उलुकाः । स्थवीयसि स्थूलतरे । शिखण्डो जूटकः । खण्डपरशुः शिवः । करा एव शाखास्तदाकारत्वाङ्गुलयश्च करशाखाः । अररः कपाटः । संक्रीडनं शब्दः । आवृत्तिः स्थगनम् । 'गोपुरं स्यात्पुरद्वारं द्वारमात्रेऽपि गोपुरम्' । उपजोषः सुखम् , तूष्णींभावो वा । जरती वृद्धा । शिशयिषमाणे सुक्षुप्सति । 'यक्षाः स्युः पुण्य- मद्यपात्र में डूबने लगा। भिक्षु लोग कमण्डलु के जल से अपने हाथ-पैर धोकर चैत्यों की वंदना करने लगे। सुक् स्त्रुवा आदि यज्ञपात्रों को हाथ में लेकर यज्ञ करने वाले लोग कुश को बिछा कर प्रज्वलित अग्नि में वषट्कार के द्वारा हविष छोड़ने लगे। उपवन के वृक्षो पर काँव-काँव करते हुए कौवे झपकी लेने की तैयारी करने लगे और बंदर अपनी चपलता छोड़ बैठे। पुराने खंखाड़ वृक्षों के खंधरों में बैठे हुए उल्लू अब निकलना ही चाहते थे। झुग्गे के झुग्गे तारे आकाश की स्थली में छिटकने लगे मानों सन्ध्यावंदन के अवसर पर मुनियों द्वारा छींटे गए जल के बिन्दु हों। अब अन्धकार आकाश में उतरने लगा, मानों रात्रि रूपी भीलनी के केशपाश का जूड़ा हो। वह भगवान् शंकर के कंठ के समान श्याम था और संध्या के बचे हुए तेज को निगलता जा रहा था। अन्धकार के तर्जनार्थ निकली हुई मानों सूर्य के किरण रूपी हाथ की अंगुलियाँ हों ऐसी दीप लेखाएँ चमकने लगीं। गोपुर के दरवाजों के बंद होने की गड़गड़ाहट अब शान्त हो गई। छोटे छोटे बच्चे चुप्पी साध कर बूढ़ी दादी की कहानी