भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

द्वितीय उच्छ्वासः १३३ गरे विजृम्भमाणे भीषणतमे तमीमुखे, मुखरितविततज्यधनुषि वर्षति शरनिकरमनवरतमशेषसंसारशेमुषीमुषि मकरध्वजे, रताकल्पारम्भशो- भिनि शम्भलीसुभाषितभाजि भजति भूषां भुजिष्याजने, सैरन्ध्रीबध्य- मानरशनाजालजल्पाकजघनासु जनीषु, वशिकविशिखाविहारिणीष्वन- न्यजानुप्लवासु प्रचलितास्वभिसारिकासु, विरलीभवति वरटानां वेशन्त- शायिनीनां मञ्जुनि मञ्जीरशिञ्जितजडे जल्पिते, निद्राविद्राणद्रा- घीयसि द्रावयतीव च विरहिहृदयानि सारसरसिते, भाविवासरबीजाङ्कुर- निकर इव च विकीर्यमाणे जगति प्रदीपप्रकरे निवासस्थानमगात् । अकरोच्च चेतसि—'अतिदक्षिणः खलु देवो हर्षः, यदेवमनेकबालचरित- जनाः'। तमी रात्रिः । शेमुषी बुद्धिः । आकल्पो वेशः । शम्भली कुट्टनी । भुजिष्या दासी । सैरन्ध्री प्रसाधनोपचारज्ञा । जनी वशिका शून्या । विशिखा रथ्या । अनन्यजः कामः । अनुप्लवः सहायः । 'कान्तार्थिनी तु या याति संकेतं साभि- सारिका' । 'हंसस्य योषिद्वरटा' । वेशन्तः पल्वलम् । कासारमल्पसरः । मञ्जीरं सुनते-सुनते ऊँघने लगे। बूढ़ी भैंस के शरीर की कान्ति वाला अन्धकार भीषण रूप धारण करने लगा और निशाचर जग पड़े। संसारी लोगों की बुद्धि का अपहरण करने वाला कामदेव अपना धनुष चढ़ा कर टंकार भरने लगा और बाणों की वर्षा करने लगा। वेश्याएँ कुट्टनियों के उपदेश पाकर रतकाल की वेशभूषा के गहने पहन कर शोभने लगीं। प्रसाधिकाओ द्वारा सुन्दरियों की कमर में बाँधी जाने वाली करधनी आवाज करने लगी। अभिसारिकाएँ काम की सहायता से सुनसान गलियों में पंतरा मारने लगीं। ताल तलैयाँ में शयन करने वाली हंसियों की नूपुर के समान आवाज कम पड़ने लगी। निद्रा से अलसाए हुए सारस पक्षियों की जोरदार आवाज विरहियों के हृदय को पिघलाने लगा। चारों ओर दीपक इस प्रकार जलने लगे मानो होने वाले दिन के बीजांकुर निकल आए हों। बाण मन में सोचने लगा—सचमुच देव हर्ष बड़े ही उदार हैं, क्योंकि मेरे बाल्यकाल की अनेक चपलताओं से फैले हुए जनापवाद को सुनकर कुपित होने पर भी मन में मेरे प्रति स्नेह अवश्य रखते हैं। यदि मैं उनकी भौंहों पर चढ़ा हुआ अर्थात् कोपभाजन होता तो कैसे दर्शन देने की कृपा करते ? वह मुझे गुणी देखना चाहते हैं। बड़ों की यही रीति है कि छोटे को बिना मुख से कहे ही केवल व्यवहार से विनय सिखा देते हैं। मुझे धिक्कार है यदि मैं अपने ही दोषों से अंधा होकर केवल