भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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तृतीय उच्छ्वासः निजवर्षादितस्नेहा बहुभक्तजनान्विताः । सुकाला इव जायन्ते प्रजापुण्येन भूभुजः ॥ १ ॥ साधूनामुपकर्तुं लक्ष्मीं द्रष्टुं विहायसा गन्तुम् । न कुतूहलि कस्य मनश्चरितं च महात्मनां श्रोतुम् ॥ २ ॥ अथ कदाचिद्विरलितबलाहके, चातकातङ्ककारिणि, कणत्कादम्बे, दर्दुरद्विपि, मयूरमदमुषि, हंसपथिकसार्थसर्वातिथौ, धौतासिनिभनभसि, निजेति । निज आत्मीयः वर्षों लोकः, वृष्टिश्च । वर्षं वर्षमपि निजं समु- चितकालप्राप्तम् । स्नेहः प्रीतिः, आर्द्रता च । भक्ताः अनुरक्ताः ओदनश्च । भक्तं भक्तरूपाणां भूभृतां सुकालानां च प्रजापुण्यं हेतुः। अनेन महानुभाव- पुष्पभूतिवर्णना सूचिता ॥ १ ॥ साधूनामिश्यादिनापि भैरवाचार्योपकारकरणम् , स्वयं लक्ष्मीदर्शनम् , विहा- यसा गमनं भैरवाचार्यस्य, महात्मचरितश्रवणकुतूहलं च निजभ्रात्रादीनां सूचितम् ॥ २ ॥ अथेत्यादौ । एवंविधे शरत्समयारम्भे बन्धून्द्रष्टुं बाणो ब्राह्मणाधिवासमगादिति संबन्धः । विरलिताः न पुनरेकान्ततोपगताः । बलाहका मेघाः । चातकाः स्तोका- ख्याः पक्षिणः । कादम्बाः कृष्णहंसाः । दर्दुरा मण्डूकाः । हंसा एव पथिकसार्थाः, जब प्रजा के पुण्य। का उदय हाता हं तथा सुकाल का भांति राजा भा उत्पन्न हो जाते हैं और अपने राज्य में सर्वत्र प्रेमभाव फैलाते हैं । अनेक अनुचर उनके इस पुण्यकार्य में सहायक हो जाते हैं । इस प्रकार सुकाल में जल की वर्षा से धरती गीली हो जाती है और बहुत अन्न पैदा होता है । तात्पर्य यह कि सौराज्य और सुसमय दोनों प्रजा के पुण्यों के फल-स्वरूप हैं ॥ १ ॥ सज्जनों के उपकार करने के लिए, लक्ष्मी को साक्षात् देखने के लिए, आकाश मार्ग से उड़कर चलने के लिए एवं महात्माओं के चरित सुनने के लिए किसके मन में कुतूहल पैदा नहीं होते ? ॥ २ ॥ एक समय शरद ऋतु का आरम्भ हुआ । आकाश में मेघ कहीं-कहीं छिट-पुट नजर आने लगे । चातक पक्षियों का सन्ताप बढ़ गया । कलहंस चारों ओर आवाज करने लगे । जल के सूख जाने से बेचारे मेढ़कों पर आफत पड़ गई । मौरों का नृत्य-जनित गर्व