भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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१३६ हर्षचरितम् भास्वरभास्वति, शुचिशशिनि, तरुणतारागणे, गलत्सुनासीरशरासने, सीदत्सौदामनीदाम्नि, दामोदरनिद्राद्रुहि, द्रुतवैदूर्यवर्णार्णसि, घूर्णमानमि- हिकालघुमेघमोघमघवति, निमीलन्नीपे, निष्कुसुमकुटजे, निर्मुकुलकन्दले, कोमलकमले, मधुस्यन्दीन्दीवरे, कह्लाराह्लादिनि, शेफालिकाशीतलीकृ- तनिशे, यूथिकामोदिनि, मोदमानकुमुदावदातदशदिशि, सप्तच्छदधूलि- धूसरितसमीरे, स्तबकितबन्धुरबन्धूकावध्यमानाकाण्डसंध्ये, नीराजित- वाजिनि, उद्दामदन्तिनि, दर्पक्षीणौक्षक्रे, क्षीयमाणपङ्कचक्रवाले, बाल- पुलिनपल्लवितसिन्धुरोधसि, परिणामाश्यानश्यामाके, जनितप्रियङ्गु- तेषां निर्मलजलदानादिना स्यात्सर्वातिथित्वम् । शुचिर्निर्मलः । सुनासीर इन्द्रः । सौदामनी विद्युत् । दामोदरो हरिः । अस्य निद्रां द्रोधि यस्तस्मिन् । तदा किल हरिर्विबुध्यत इति वार्ता । अर्णो जलम् । घूर्णमाना भ्रमन्ती या मिहिका नीहार- स्तद्वल्लघवस्तुच्छा ये मेघास्तैर्मोघो निष्फलो मघवानिन्द्रो यत्र तस्मिन् । वर्षाभावा- द्विन्द्रस्य मोघत्वम् । इन्द्रादेशेन हि मेघा वर्षन्ति । मेघवद्वर्जितमित्यन्ये । नीपाः कुटजाः । कन्दलाश्च वृक्षभेदाः । कह्लाराणि सौगन्धिकापरनामानि श्वेतोत्पलानि । जलकुसुमपत्रिकेत्यन्ये । शेफालिका पुष्पभेदः रात्रावेव विकसति । यूथिका हरिणिका । मोदमानानि विकसन्ति । सप्तच्छदाः सप्तपर्णाख्या वृक्षभेदाः । बन्धुरा हृद्याः । बन्धूका बन्धुजीवाख्या वृक्षभेदाः । नीराजिताः कृतशान्तिविधानाः । क्षीबा- ण्यौक्षकानि दान्तसमूहा यत्र तस्मिन् । चक्रवालं समूहः । बालं तत्क्षणमु- भी कम पड़ गया। राही के रूप में हंस पक्षी सबके अतिथि बन कर आने लगे। पानी चढ़ाए खड्ग की भाँति आकाश निर्मल हो गया। सूर्य में चमक बढ़ गई और चन्द्रमण्डल भी निर्मल हो गया। आकाश में तारे बढ़ने लगे। इन्द्रधनुष अब बिलकुल नहीं उगता। बिजलियाँ भी कम पड़ने लगीं। भगवान् विष्णु की नींद टूटी। जल पिघले हुए वैदूर्य के समान निर्मल हो गया। इन्द्र की आज्ञा से बरसने वाले मेघ बर्फ की भाँति इधर-उधर भटकने लगे। कदम्ब के पेड़ झड़ने लगे। कुटज पुष्पों में फूल नहीं रह गए। कन्दल के वृक्षों में कलियों का निकलना बंद हो गया। कमल खिलने लगे। नीले कमल मकरन्द की वर्षा करने लगे। उजले कमल आह्लादित होने लगे। शेफालिका के फूल खिल खिलकर रात को ठंडी करने लगे। जूही की गंध फैलने लगी। कुमुदों के खिलने से दिशाएँ उज्ज्वल हो गईं। सप्तपर्ण के वृक्ष की धूल से हवा कुछ मैली बहने लगी। लाल-लाल सुन्दर बन्धूक- पुष्प खिल कर असमय में सन्ध्या का दृश्य खड़ा करने लगे। युद्ध की यात्रा में घोड़ों के शान्तिकर्म होने लगे। हाथी मद से उन्मत्त होने लगे। साँड़ गर्वीले और पागल होकर डकारने लगे। जगह-जगह के कीचड़ सूखने लगे। कुछ-कुछ भींगी रेतों पर नदियों के