भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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तृतीय उच्छ्वासः १३७ मञ्जरीरजसि, कठोरितत्रपुसत्वचि, कुसुमस्मेरशरे, शरत्समयारम्भे राज्ञः समीपाद्वाणो बन्धून्द्रष्टुं पुनरपि तं ब्राह्मणाधिवासमगात् । समुपलब्धभूपालसंमानातिशयपरितुष्टास्त्वस्य ज्ञातयः श्लाघमाना निर्ययुः । क्रमेण च कांश्चिदभिवाद्यमानः कैश्चिदभिवाद्यमानः, कैश्चिच्छिरसि चुम्ब्यमानः, कांश्चिन्मूर्ध्नि समाजिघ्रन्, कैश्चिदालिङ्ग्य- मानः, कांश्चिदालिङ्गन्, अन्यैराशिषानुगृह्यमाणः, पराननुगृह्णन्, बहु- बन्धुमध्यवर्ती परं मुमुदे । संभ्रान्तपरिजानोपनीतं चासनमासीनेषु गुरुषु भेजे । भजमानश्चादरादिसत्कारं नितरां ननन्द । प्रीयमाणेन च मनसा सर्वांस्तानपर्यपृच्छत्—'कच्चिदेतावतो दिवसान्सुखिनो यूयम् ? अप्रत्यूहा वा सम्यक्करणपरितोषितद्विजचक्रा क्रातवी क्रिया क्रियते ? यथावद्विक- लमन्त्रभाञ्जि भुञ्जते वा हवींषि हुतभुजः ? यथाकालमधीयते वा वटवः ? प्रतिदिनमविच्छिन्नो वा वेदाभ्यासः ? कच्चित्स एव चिरंतनो यज्ञविद्या- तजलम् । सिन्धवो नद्यः । श्यामाको नीवारः । प्रियङ्गुर्चाङ्गिभेदः । त्रपुसं लाडुकम् । सभ्रान्तः सत्वरः । सत्कारं पूजाम् । कच्चिदितीष्टप्रश्ने । प्रत्यूहो विघ्नः । सम्य- क्करणं यथाशास्त्रं संपादनम् । क्रतूनां यज्ञानामियं क्रातवी । अधीयत इति । नट बनने लगे । सावाँ के धान पककर कुछ-कुछ सूखने लग गए । कंगनी की मंजरियों में पराग भर आया । त्रपुष नामक फल के छिलके कड़े हो गए । शर नामक तृणों में फूल खिल उठे । तब बाण अपने बन्धु-बान्धवों को देखने के लिए फिर राजा के पास से ब्राह्मणों के उसी (प्रीतिकूट नामक) निवासस्थान में चला आया । सम्राट् के द्वारा अतिशय सम्मान पाकर पधारे हुए बाण को जब गाँव के भाई-बन्धुओं ने सुना तो अत्यन्त हर्ष के साथ उसके स्वागत के लिए प्रशंसा करते हुए निकल पड़े । बाण ने क्रम से कुछ का अभिवादन किया और कुछ से अभिवादित हुआ; कुछ ने उसका सिर चूमा और उसने कुछ के सिर सूँघे; कुछ ने उसका आलिङ्गन किया और कुछ से वह स्वयं गले मिला; दूसरों ने अपने आशीर्वादों से उस पर अनुग्रह किया और उसने भी कुछ लोगों को असीस कर अनुगृहीत किया । इस प्रकार बाण अपने बहुत से भाई-बन्धुओं के बीच आकर अत्यन्त हर्षित हुआ । परिजन दौड़े और शीघ्र आसन लाकर बिछा दिया । जब गुरुजन बैठ गए तब बाण भी एक आसन पर बैठा और परिजनों द्वारा पूजा- सत्कार पाकर बड़ा ही प्रसन्न हुआ । गद्गद मन से उसने सब लोगों से पूछा—'आप लोग इतने दिनों तक सुख से तो रहे ? ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करने वाले यज्ञ के कार्य शास्त्र