हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ हर्षचरितम् कर्मण्यभियोगः ? तान्येव व्याकरणे परस्परस्पर्धानुबन्धाबन्ध्यदिवस- दर्शितादराणि व्याख्यानमण्डलानि, सैव वा पुरातनी परित्यक्तान्यकर्तव्या प्रमाणगोष्ठी, स एव वा मन्दीकृतेतरशास्त्ररसो मीमांसायामतिरसः ? कच्चित एवाभिनवसुभाषितसुधावर्षिणः काव्यालापाः ?' इति । अथ ते तमूचुः—'तात ! संतोषजुषां सततसंनिहितविद्याविनोदानां वैतानवह्निमात्रसहायानां कियन्मात्रं नः कृत्यं सुखितया सकलभुवनभुजि भुजङ्गराजदेहदीर्घे रक्षति क्षितिं क्षितिभुजे । सर्वथा सुखिन एव वयम् , विशेषेण तु त्वयि विमुक्तकौसीद्ये परमेश्वरपार्श्ववर्तिनि वेत्रासनमधिति- ष्ठति । सर्वे च यथाशक्ति यथाविभवं यथाकालं च संपाद्यन्ते विप्रजनो- वेदपाठो बालानामेवोचितः । प्रमाणं तर्कविद्या । मीमांसा ब्रह्मनिदर्शनम् । अत एवाह—अतिरस इति । तात इति पूजावचनम् । वैतानाः क्रातवाः । कौसीद्यमालस्यम् । निष्प्रयत्न- तेत्यर्थः । के अनुसार बिना किसी विघ्न-बाधा के तो होते रहे ? यज्ञ की अग्नियों में नियमानुसार मंत्र के साथ-साथ हविष भोजनार्थ तो मिल रहा है ? बटु लोगों का समय से अध्ययन तो चल रहा है ? वेदों का प्रतिदिन होने वाला अभ्यास विच्छिन्न तो नहीं होता ? यज्ञ- सम्बन्धी विद्या और कर्मों के प्रति वही पुराना भाव तो है न ? परस्पर एक दूसरे को जीतने की इच्छा से निरन्तर दिन को सफल करने वाले व्याकरण-शास्त्र के वे ही व्याख्यान मण्डल तो अब भी जम रहे हैं न ? दूसरे कार्यों को छोड़-छाड़ कर न्याय शास्त्र पर विचार करने वाली गोष्ठी तो वही पुरानी आज भी चल रही है न ? दूसरे शास्त्रों के रस को फीका कर देने वाले मीमांसाशास्त्र में रस तो वही मिलता है न ? नये-नये सुभाषितों की सुधा बरसाने वाले काव्यालाप तो वही हो रहे हैं न ?' तब वे बोले—'हे तात, जब समस्त भुवन पर शासन करने वाला और शेषनाग के समान दीर्घ शरीर वाला राजा सुखपूर्वक पृथिवी की रक्षा करने में संलग्न है तो थोड़े ही में सन्तोष कर लेने वाले, हमेशा विद्या के विनोद में लगे रहने वाले तथा केवल यज्ञ की अग्नि को अपना सहायक मानने वाले हम ब्राह्मणों का कार्य ही कितना है ? हम सब प्रकार से सुखी हैं, विशेष तो सुखी इसलिए हैं कि तुम आलस्य छोड़कर महाराजाधिराज हर्ष के नजदीक वेत्रासन पर विराजमान हो । अपनी शक्ति के अनुसार और अपने विभव के अनुसार हमलोग समय से ब्राह्मण के लिए उचित सब काम करते रहे हैं।' इस प्रकार बातें हुईं, स्कन्धावार के सम्बन्ध की चर्चा भी छिड़ी, लड़कपन में खेले हुए खेलों की याद