हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उच्छ्वासः १३६
चिताः क्रियाकलापाः' इत्येवमादिभिरालापैः स्कन्धावारवार्ताभिश्च शैशवातिक्रान्तक्रीडानुस्मरणैः पूर्वजकथाभिश्च विनोदितमनास्तैः सह सुचिरमतिष्ठत् । उत्थाय च मध्यन्दिने यथाक्रियमाणाः स्थितिरकरोत् । भुक्तवन्तं च तं सर्वे ज्ञातयः पर्यवारयन् । अत्रान्तरे दुकूलपट्टप्रभवे शिखण्ड्यपाङ्गपाण्डुनी पौण्ड्रे वाससी वसानः स्नानावसानसमये वन्दितया तीर्थमृदा गोरोचनया च रचि- ततिलकः, तैलामलकमसृणितमौलिः, अनुच्चचूडाचुम्बिना निबिडेन कुसु- मापीडकेन समुद्भासमानः, असकृदुपयुक्तताम्बूलविरलाधररागकान्तिः, एकशलाकाञ्जनजनितलोचनरुचिः, अचिरभुक्तः, विनीतमार्यं च वेषं दधानः, पुस्तकवाचकः सुदृष्टिराजगाम । नातिदूरवर्तिन्यां चासन्यां निषसाद । स्थित्वा च मुहूर्तभिव तत्कालापनीतसूत्रवेष्टनमपि नख-
अत्रेत्यादौ । सुदृष्टिः पुस्तकवाचक आजगामेति संबन्धः । दुगूलेति । एकस्माद्दु- गूलपट्टाद्दीर्घाच्छित्त्वा गृहीते, शिखण्ड्यपाङ्गपाण्डुरत्वेन कार्कश्यमपि दर्शितम् । पौण्ड्रे पुण्ड्रदेशजे । गोरोचना रक्षाद्रव्यभेदः । मौलयः केशाः । अनुच्चेति । अदीर्घ- तया कुसुमापीडकस्य श्रोत्रियत्वं विनीतत्वं चास्य दर्शितम् । निबिडेन संहत- पुष्पेण । रुचिरं नैर्मल्यम् । भोजनं भुक्तमचिरं भुक्तं यस्य सः । अनेन तस्यानवखि- न्नसत्त्वमुक्तम् । आसन्द्यां वेत्रपीठिकायाम् । स्थित्वेत्यादौ । पुराणं पपाठेति संबन्धः ।
आई, पुराने लोगों की बातें चल पड़ीं । इस तरह बाण उन लोगों के साथ देर तक मन- बहलाव की बातचीत में बैठा रहा । मध्याह्न के समय उठकर उसने सबकी भाँति स्नान- ध्यान किए । तत्पश्चात् भोजन के बाद ही सबके सब भाई-बन्धु फिर उसे घेर कर बैठ गए । इसी बीच बाण का पुस्तक-वाचक सुदृष्टि वहाँ आ पहुँचा । वह पुंड्र देश के बने दुकूल-पट्ट के थान में से तैयार किए, मोर की आँखों के कोने की भाँति दो श्वेत वस्त्र पहने था । स्नान करने के बाद उसने माथे पर मंत्र से पवित्र तीर्थ की मिट्टी और गोरोचना से तिलक लगाया था । उसके सिर के बालों में आँवले के तेल की मालिश से चिकनाहट थी । लटकती हुई शिखा से लगी हुई फूलमाला से वह शोभित हो रहा था । हमेशा पान चबाते रहने से उसके अधर की कांति खिल उठी थी । उसकी आँखों में अंजन की बारीक रेखा खिंची हुई थी । वह अभी-अभी भोजन करके उठा था । उसका वेष विनय से भरा हुआ और सौम्य था । वह कुछ दूर रखे हुए बेंत के आसन पर बैठ गया । क्षण भर ठहर कर तत्काल उसने सूत की बेठन खोल दी, फिर भी उसके नखों की किरणें पुस्तक में सह