भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 185

१४० हर्षचरितम् किरणैर्मृदुमृणालसूत्रैरिवावेष्टितं पुस्तकं पुरोनिहितशरशलाकायन्त्रके निधाय, पृष्ठतः सनीडसंनिविष्टाभ्यां मधुकरपारावताभ्यां वांशिकाभ्यां दत्ते स्थानके प्राभातिकप्रपाठकच्छेदचिह्नीकृतमन्तरं पत्रमुत्क्षिप्य, गृहीत्वा च कतिपयपत्रलघ्वीं कपाटिकाम्, क्षालयन्निव मषीमलिनान्य- क्षराणि दन्तकान्तिभिः, अर्चयन्निव सितकुसुममुक्तिभिर्ग्रन्थम्, मुख- संनिहितसरस्वतीनूपुररवैरिब गमकैर्मधुरैराक्षिपन्मनांसि श्रोतॄणां गीत्या पवमानप्रोक्तं पुराणं पपाठ । तस्मिंश्च तथा श्रुतिसुभगगीतिगर्भं पठति सुदृष्टौ नातिदूरवर्ती बन्दी सूचीबाणस्तारमधुरेण गीतिध्वनिमनुवर्तमानः स्वरेणेदमार्या- युगलमगायत्— 'तदपि मुनिगीतमतिपृथु तदपि जगद्व्यापि पावनं तदपि । सनीडे समीपे । प्रपाठको वाचकः, प्रपठन वा । तस्य तत्र वा छेदः । इयन्मात्रं वाचितं नान्यदिति तेन चिह्नीकृतं लक्ष्यीकृतम् । गमयन्ति रागस्वरूपमिति गमकाः । असाधारणानि स्वराणां निमीलनानि । यानि लक्ष्यज्ञैष्वान्तरमार्ग इति प्रसिद्धास्तैर्गमकैः स्वरयति विशेषैः । पवमानो वायुः । बन्दी स्तुतिपाठकः । पृथुरादिनृपोऽपि । पवमानं वायुप्रोक्तमपि । गीतपक्षे— वंशेन वेणुनानुगमो ययोस्तौ विवादिनौ स्वरौ विश्रुत्यन्तरौ गान्धारनिषादौ स्वरौ यत्र तत् । करणमपदः । सताल आविद्धः स्वरसंनिवेशः, उच्चारणस्थानं वा । भारतं प्रकार फैल गई मानों मृणालसूत्रों में बाँधी गई हो । पुस्तक को उसने सरकण्डों के बने पीढ़े पर रख दिया । पीछे समीप में बैठे हुए मधुकर और पारावत नामक बंशी बजाने वाले बाण के दो मित्रों ने जब अवकाश दिया, तब सुदृष्टि ने प्रभात में पढ़े हुए विराम के बीच चिह्न के रूप में लगाए हुए पन्ने को निकाल कर कुछ पन्नों के साथ हल्की दफ्ती को उठा लिया और मानों अपने दाँतों की किरणों से स्याही के अक्षरों को धोता हुआ, या अपनी मुस्कान के फूलों से ग्रन्थ की अर्चना करता हुआ, गमक नामक स्वरों से मुख में सन्निहित सरस्वती के नूपुरों की आवाज का अनुकरण करके गीत के द्वारा सुनने वालों के मन को रमाता हुआ वायुपुराण का पाठ करने लगा । उस प्रकार जब सुदृष्टि मधुर गीत के साथ साथ पाठ कर रहा था, तभी सूचीबाण नामक बन्दी ने ऊंचे स्वर में उसी गीत की लय का अनुकरण करते हुए दो आर्या-छन्दों का गान किया— वायु-पुराण मुनि व्यास द्वारा गीत है, अत्यन्त बड़ा भी, जगत् में विख्यात भी और