हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४२ हर्षचरितम् शब्दा लोक इव व्याकरणेऽपि सकलपुराणराजर्षिचरिताभिज्ञाः, महाभारत- तभावितात्मानः, विदितसकलेतिहासाः, महाविद्वांसः, महाकवयः, महापुरुषवृत्तान्तकुतूहलिनः, सुभाषितश्रवणरसरसायनाः, वितृष्णाः, वयसि वचसि यशसि तपसि सदसि महसि वपुषि यजुषि च प्रथमाः, पूर्वमेव कृतसंगराः, विवक्षवः, स्मितसुधाधवलितकपोलोदराः, परस्परस्य मुखानि व्यलोकयन् । अथ तेषां कनीयान्कमलदलदीर्घलोचनः श्यामलो नाम बाणस्य व्याडिकृतो ग्रन्थश्च । गुरवो महान्तः, उपाध्यायाश्च । साधुशब्दः साधुवादः, साधवोऽमी इत्येवंरूपो वा । साधवः संस्कृताः, शब्दाश्च । पाण्डित्यप्रकटनेनानेन द्रष्टुमिष्टस्य वस्तुन उत्कृष्टतोच्यते । सकलेत्यादिविशेषणत्रयेण द्विजराजादिवृत्तान्तेऽ- भिज्ञतोच्यते । महापुरुषेत्यादि । हर्षचरिते शुश्रूषाया हेतुः । सुभाषितेत्यादि । स्वकाव्यप्रशंसासूचनपरम् । सदसि सभायाम् । संगरं संकेतं । कनीयानिति । अनेन प्रियवचनत्वमस्य दर्शितम् । ब्रूहीति दत्तसंज्ञः । तात और श्यामल एक दूसरे को देखने लगे । ब्रह्मा के चार मुख-कमलों की भांति वे वेदाभ्यास करने से पवित्र थे । साम-दान आदि चार उपायों के समान साम अर्थात् सान्त्वनापूर्ण वचन या सामवेद का प्रयोग करने से उनके मुख सुन्दर थे । लोक के समान व्याकरण में भी उनकी वृत्ति अर्थात् जीविका शुद्ध थी या वृत्ति अर्थात् सूत्र के विवरण में सुबोध थे, वाक्य अर्थात् वचन का आदर करते थे या वाक्य अर्थात् वार्तिकों के अर्थ का ज्ञान रखते थे, गुरु पद अर्थात् श्रेष्ठ स्थान पर प्रतिष्ठित थे या उन्होंने दुर्बोध पदों में न्यास अर्थात् वृत्ति का अभ्यास किया था, न्याय अर्थात् युक्ति की बात बोलते थे या उपपत्ति और अनुपपत्ति का विचार रखते थे, पुण्य के संगृहीत करने के अभ्यास में प्रवीण थे या व्याडि द्वारा सुविरचित संग्रह नामक ग्रन्थ का अध्यापन करते थे, उन्हें साधुवाद प्राप्त थे या संस्कृत शब्दों का उन्होंने अभ्यास कर लिया था । समस्त पुराणों में आए हुए राजर्षियों के चरित उन्हें ज्ञात थे । उन्होंने महाभारत का अनुशीलन किया था । वे इतिहास के पंडित थे । महाविद्वान् और महाकवि थे । महापुरुषों के वृत्तान्त को सुनने के लिए उनके मन में विशेष कुतूहल था । सुभाषित के रस के वे रसायन थे ( अर्थात् सुभाषितों को सुना कर आनन्दित करते थे) । उनमें तृष्णा बिलकुल न थी । वचन में, अवस्था में, यश में, तप में, सभा में, तेज में, शरीर में, यज्ञ में सर्वत्र उनकी सबसे पहले गणना होती थी । वे पहले से ही परामर्श करके वहाँ आए थे और कुछ बोलना चाहते थे । मुसकान की सुधा से उनके कपोलों के मध्यभाग धवलित हो गए थे । तत्पश्चात् उन चारों में सबसे छोटा, कमल के समान बड़ी-बड़ी आँखों वाला श्यामल,