हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ हर्षचरितम् अथ करतलस्थितस्याट्टहासस्य मध्ये तडितमिव नीलजलधरोदरे स्फुरन्तीं प्रभया पिबन्तीमिव त्रियामाम्, तामरसहस्ताम्, कोमलाङ्गु- लिरागराजिजालकानि च चरणलभानि वेलाबालविद्रुमलतावनानीवा- कर्षन्तीम्, करपङ्कजसंकोचाशङ्कया शशाङ्कमण्डलमिव खण्डशः कृतं निर्मलचरणनखनिवहनिभेन बिभ्रतीम्, गुल्फावलम्बिनूपुरपुटतया स्थि- तनिबिडकटकावलिबन्धनादिव परिभ्रश्यागताम् बहुविधकुसुमशकुनिश- तशोभितात्पवनचलिततनूतरङ्गादतिस्वच्छादंशुकादुदधिसलिलादिवोत्तर- न्तीम्, उदधिजन्मप्रेम्णा त्रिवलिच्छलेन त्रिपथगयेव परिष्वक्तमध्याम्, अत्युन्नतस्तनमण्डलाम्, दृश्यमानदिङ्नागकुम्भामिव ककुभम्, मदल- ग्नैररावतकरशीकरनिकरमिव शरत्तारागणतारं हारमुरसा दधानाम्, धव- लचामरैरिव च मन्दमन्दनिःश्वासदोलायितैर्हारकिरणैरुपवीज्यमानाम्, स्वभावलोहितेन मदान्धगन्धेभकुम्भास्फालनसंक्रान्तसिन्दूरेणेव करद्वयेन द्योतमानाम्, हरशिखण्डेन्दुद्वितीयखण्डेनेव कुण्डलीकृतेन ज्योत्स्नामुचा अथेत्यादौ । अट्टहासस्य मध्ये स्फुरन्तीं स्त्रियमपश्यदिति सम्बन्धः । तामरसं पद्मम् । बहुविधेति । प्रकृते कुसुमानि शकुनयश्च सूत्रमयानि । तरङ्गा मुष्टिदानक्षता भङ्गयः, वीचयश्च । अतिस्वच्छत्वमंशुकस्योदधिसलिलेन । उत्तरन्तीमिति । अंशुका- एक स्त्री को देखा जो हाथ में रखे हुए अट्टहास नामक तलवार के बीच में इस प्रकार चमक रही थी जैसे नीले मेघ के बीच में बिजली चमकती है । शरीर की कांति से रात को पीती जा रही थी । उसके हाथ कमल के समान थे । उसके चरणों की अँगुग्रियों में राग की जाली इस प्रकार लग रही थी मानो समुद्रतट के छोटे विद्रुम लताओं के वनों को खींचती चली आ रही हो । हाथरूपी कमल के मुकुलित हो जाने की शङ्का से मानों उसने चन्द्रमा के टुकड़े टुकड़े करके अपने चरणके निर्मल नखों के रूप में धारण कर लिया हो । ठिगनी तक लटके हुए नूपुर से ऐसा लगता था कि वह सैनिकों के बीच जेल के घेरे से भाग निकल आई हो । उसके वस्त्र पर अनेक प्रकार के फूल और पक्षी कढ़े हुए थे, वह हवा से फहर रहा था, और अति स्वच्छ था, मानों वह समुद्र से निकली हो । समुद्र से जन्म लेने के प्रेम के कारण मानों त्रिवलि के बहाने त्रिपथगा गङ्गा ने उसे अँकवार लिया था । उसके स्तन ऊँचे-ऊँचे थे, वह दिशा के समान प्रतीत हो रही थी, जिसके बीच दिग्गज के कुम्भस्थल दिखाई पड़ते थे । शरत्काल के तारों के समान झलकते हुए हार को वह अपने वक्ष पर धारण कर रही थी मानों मतवाले ऐरावत की सूँड़ के फुहारे उड़कर लग गए हों । सफेद चँवर के समान उसकी मन्द-मन्द साँस से हिलती हुई हार