हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उच्छ्वासः १८७
अमीभिः किं वा परुषभाषितैः ? भुजे वीर्यं निवसति, न¹ वाचि। प्रति- पद्यस्व शस्त्रम्। अयं न भवसि। अगृहीतहेतिष्वशिक्षितो मे भुजः प्रह- र्तुम्' इति। नागस्त्वनादृततरम्—'एहि, किं शस्त्रेण ? भुजाभ्यामेव भनज्मि भवतो दर्पम्' इत्यभिधायास्फोटयामास। नरपतिरपि निरायुध- मायुधेन युधि लज्जमानो जेतुमुत्सृज्य सचर्मफलकमट्टहासमसिमधोरु- कस्योपरि बबन्ध बाहुयुद्धाय कक्ष्याम्। युयुधाते च निर्दयास्फोटनस्फुटि- तभुजरुधिरशीकरसिच्यमानौ शिलास्तम्भैरिव पतद्भिर्बाहुदण्डैः शब्दम- यमिव कुर्वाणौ भुवनं तौ। न चिराच्च पातयामास भूतले भुजङ्गमं भूपतिः। जग्राह च केशेषु। उज्जखान च शिरश्छेत्तुमट्टहासम्। अपश्यच्च वैकक्षक- मालान्तरेणास्य यज्ञोपवीतम्। उपसंहृतशस्त्रव्यापारश्चावादीत्—'दुर्विनीत! अस्ति ते दुर्नयनिर्वाहबीजमिदम्। यतो विश्रब्धमेवाचरसि चापलानि' इत्युक्त्वोत्ससर्ज च तम्। अनन्तरं च सहसैवातिबहलां ज्योत्स्नां ददर्श। शरदि विकसतां कमलवनानामिव च घ्राणावलेपिनमामोदमजिघ्रत्। झटिति च नूपुरशब्दमशृणोत्। व्यापारयामास च शब्दानुसारेण दृष्टिम्।
हेतिरायुधम्। आस्फोटयामास बाहौ करघातमकार्षीत्। असिमिति प्रशंसार्थः सामान्यपदप्रयोग इति रुद्रटः। वैकक्षमालान्तरितत्वेन, पूर्वमदर्शनं यज्ञोपवीतस्याह।
अगर नहीं उठाता तो मेरी भुजा ने शस्त्रहीनों पर वार करना नहीं सीखा है।' नाग ने अनादर के साथ कहा—'अरे, आ तो जा, शस्त्र से क्या ? हाथों से ही तेरा घमण्ड चूर करता हूँ।' यह कहकर उसने ताल ठोंका। निरायुध के साथ आयुध लेकर लज्जा का अनुभव करते हुए राजा ने ढाल के साथ तलवार फेंक दी और जाँघिया तक कछाड़ बाँध लिया। दोनों निर्दय होकर थाप से मारने लगे और एक दूसरे का खून बहाने लगे। इस प्रकार की आवाज से संसार भर रहा था। देर तक लड़कर भी वह उस नाग को नहीं गिरा सका। तब उसके बालों को पकड़ा। उसका सिर उड़ा देने के लिए तलवार खींच ली। तब उसकी वैकक्षक माला के भीतर जनेऊ पर राजा की दृष्टि पड़ी। शस्त्र के वार को रोककर उसने कहा—'दुर्विनीत, अनीति करके बच निकलने का बीज, यह तेरे पास है। तभी तू इतना निर्भीक होकर चपलता कर रहा है।' यह कहकर उसे छोड़ दिया। तत्पश्चात् उन्होंने अत्यधिक प्रकाश को देखा। शरत्काल में कमल-वनों की जैसी नाक में भर जाने वाली गन्ध को सूँघा और तभी नूपुर की आवाज सुन पड़ी। शब्द की ओर उसने आँखें फैलाई।
१. न वाचि सताम्.