हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ हर्षचरितम् मयि का शक्तिर्ग्रहगणस्यापि गन्तुं गगने। भूनाथोऽप्ययमनाथस्तपस्वी यस्त्वादृशैः शैवापसदैरुपकरणीक्रियते। सहस्वेदानीं सहामुना दुर्नरेन्द्रेण दुर्नयस्य फलम्' इत्यभिधाय च निष्ठुरैः प्रकोष्ठप्रहारैस्त्रीनपि टीटिभप्रभृ- तीनभिमुखं प्रधावितान्सशरीरावरणकृपाणानपातयत्। अथ। पूर्वाधिक्षेपश्रवणादशस्त्रव्रणैरप्यमर्षस्वेदच्छलेनानेकसमरपीतम- सिधाराजलमिव वमद्भिरवयवैरपि रोमाञ्चनिभेन मुक्तशरशतशल्यनिकर- भरलघुमिवात्मानं रणाय कुर्वद्भिरट्टहासेनापि प्रतिबिम्बिततारागणेन स्पष्टदृष्टधवलदन्तमालमवज्ञया हसतेव कथ्यमानसत्त्वावष्टम्भः परिकर- बन्धविभ्रमभ्रमितकरनखकिरणचक्रवालेने व्यपगमनाशङ्कया नागदमन- मन्त्रमण्डलबन्धेनेव रुन्धन्दशदिशो नरनाथः सावज्ञमवादीत्—'अरे काकोदर काक ! मयि स्थिते राजहंसे न जिह्रेषि बलिं याचितुम् ? दोऽधमः। दुर्नरेन्द्रेण कुराज्ञा। दुर्नरेन्द्रो मन्त्रतन्त्रानभिज्ञः। सशरीरेत्यादि। न तु नरेन्द्रवद्दशखान्। अथेत्यादौ। नरनाथः सावज्ञमवादीदिति संबन्धः। कथ्यमानेत्यादि। अशस्त्रव्र- णैश्चावयवैश्चाट्टहासेन च। मण्डलं गरुडशास्त्रप्रसिद्धमैन्द्रादिकम्। काकोदरः सर्पः। काकेति निन्दायाम्। काकस्थ च बलियाचनमुक्तम्। राजहंसो नृपवरः, हंसभेदश्च। मेरी इच्छा के प्रतिकूल आकाश में तारों की भी जाने की हिम्मत नहीं होती। यह पुष्प- भूति राजा होकर भी अनाथ की तरह बेचारा तेरे जैसे निम्न कोटि के शैवों के फन्दे में पड़ गया है। अब तू इस दुष्ट राजा के साथ-साथ अपनी दुर्नीति का फल चख।' यह कह कर प्रचंड मुक्कों की मार से सामने वार करते हुए टीटिभ आदि को शरीर के कंचुक और तलवार आदि के साथ गिरा दिया। राजा ने कभी ऐसी डाँट नहीं सुनी थी। मानों उसके अङ्गों में शस्त्र के प्रहार के बिना ही जैसे घाव हो गए, और अनेक युद्धों में पिए हुए तलवार के धाराजल को छोड़ने लगा। वह रोमांच के रूप में अनेक बाण छोड़-छोड़ कर मानों हल्का होकर रण के लिए तैयार हो गया। तारों के प्रतिबिम्ब के समान दाँतों को स्पष्ट दिखाते हुए जोर से हँस पड़ा, इससे अधिक उत्साह का वेग प्रतीत हो रहा था। कछाड़ बाँधते हुए उसके नखों की किरणें चारों ओर घूम गईं, मानों शत्रु के भाग जाने की शङ्का से सर्पों का दमन करने वाले गरुड़ मन्त्र से दिशाओं को बाँध रहा था। उसने उसे ललकारा—'अरे दुष्ट कौवा ! तू मेरे राजहंस के रहते बलि की याचना करने में लज्जित नहीं होता? इस तरह की कठोर बातों में कुछ नहीं। पराक्रम तो भुजाओं में रहता है न कि वचन में। शस्त्र उठा ।