भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 230

[PageHeader] तृतीय उच्छ्वासः १८५ [/PageHeader]

क्षामतरीकृतकुक्षिः, कच्छाबन्धं विधाय विलासविक्षिप्तेन धवलव्यायाम- फालीपटान्तेन धरणितलगतेन धार्यमाण इव पृष्ठतः शेषेण स्थिरस्थूलो- रुरुद्दण्डः, भूमिभङ्गभयेनेव मन्थराणि स्थापयन्पदानि निर्भरगर्वगुरु कथ- मपि शैलमिव गात्रमुद्वहन्दर्पेण मुहुर्मुहुरुरसि द्विगुणिते दोष्णि वामे तिर्यगुत्क्षिप्ते च दक्षिणे जङ्घाकाण्डे कुण्डलिते चण्डास्फोटनटांकारैः कर्म- विघ्ननिर्घातानिव पातयन्नेकेन्द्रियविकलमिव जीवलोकं कुर्वन्कुवलयशा- मलः पुरुष उज्जगाम । जगाद च विहस्य नरसिंहनादनिर्घोषघोरया भारत्या—'भो विद्याधरीश्रद्धाकामुक ! किमयं विद्यावलेपः सहायमदो वा यदस्मै जनायाविधाय बलिं बालिश इव सिद्धिमभिलषसि ? का ते दुर्बु- द्धिरियम् ? एतावता कालेन क्षेत्राधिपतिरस्य मन्नाम्नैव लब्धव्यपदेशस्य देशस्य नागतस्ते श्रोत्रोपकण्ठं श्रीकण्ठनामा नागोऽहम् ? अनिच्छति

शेषेनेति । शेषो धवलः, धरणितलगतश्च । पटान्तेनापि विशेषेणावतिष्ठते । आस्फोटनं बाह्वादिशब्दः । एकेन्द्रियम् । अर्थात्श्रोत्रम् । निर्घोषो दिक्षु व्याप्तिः । अत्र विद्या- धरीत्यादि हेपनार्थमामन्त्रणम् । श्रद्धाग्रहणं फलाभावप्रतिपादनाय । अस्मायित्यादि सर्वगर्मेयमुक्तिः । बालिशो मूर्खः । अभिलषसीति फलाभावसूचनपदम् । अपस-

मल कर आर्द्र कर रहा था । शरीर में जहाँ तहाँ गाढ़ चन्दन के थापे इस प्रकार लग रहे थे जैसे शरद्काल में उजले-उजले मेघखण्डों से रंगीन आकाश का एक भाग हो जाता है । केतकी के पत्ते-जैसे उजले चंडातक के ओढ़ने से उसका उदर कुछ क्षीण सा प्रतीत हो रहा था । कच्छ बाँध कर धरती तक नीची सफेद लम्बी पटली लटक रही थी, मानों पृथिवी पर आकर शेषनाग ने अपनी पीठ पर उसे धारण कर लिया हो । उसकी दोनों जाँघें गँसी हुई और मोटी थीं । जमीन के धँस जाने की वजह से वह अपना पैर धीरे-धीरे रख रहा था । अधिक मात्रा में गर्व के बोझ से पर्वत के समान बोझिल शरीर किसी प्रकार धारण कर रहा था । दर्प से बाँया हाथ मोड़ कर छाती पर रखे हुए, दाहिना हाथ तिरछा फेंकते हुए दाहिनी जाँघ मोड़कर उस पर थपेड़ी मारते हुए वह मानों भैरवाचार्य के कर्म में विघ्न उत्पन्न करने के लिए आँधी की आवाज उत्पन्न कर रहा था । मानों वह उस आवाज से सारे संसार को कर्णेन्द्रिय से रहित बना रहा था । नरसिंह के समान गर- गराहट भरी आवाज में वह बोल उठा—'अरे विद्याधरी के पीछे भागने वाले, क्या यह तुझे विद्या का गर्व है या अपने सहायकों के मद में फूल गया है जो मुझे बलि बिना दिए ही मूर्ख की भाँति सिद्धि प्राप्त कर लेना चाहता है ? यह तेरी कौन-सी दुर्बुद्धि है ? मैं श्रीकंठ नाग हूँ । मेरे ही नाम से यह देश भी प्रसिद्ध है । अभी तूने क्या नहीं सुना था ?