भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 229

१८४ हर्षचरितम् एवं चावस्थितेषु दिक्पालेषु दिक्पालभुजपञ्जरप्रविष्टे विस्रब्धं कर्म साधयति भैरवं भैरवाचार्येऽतिचिरं च कृतकोलाहलेषु निष्फलप्रयत्नेषु प्रत्यूहकारिषु शान्तेषु कौणपेषु गलत्यर्धरात्रसमये मण्डलस्य नातिदवी- यस्युत्तरेणाकस्मादेव प्रलयमहावराहदंष्ट्राविवरमिव दर्शयन्ती क्षितिरदी- र्यत । सहसैव च तस्माद्विरदाशावारणोत्क्षिप्त इवालान लोहस्तम्भः, महावराहपीवरस्कन्धपीठो नरकासुर इव भुवो गर्भादुद्भूतो बलिदानव इव भित्त्वोत्थितः पातालम् , इन्द्रनीलप्रासाद इवोपरिज्ज्वलितरत्नप्रदीपः, स्निग्धनीलघननिबिडकुटिलकुन्तलकान्तमौलिरुन्मीलन्मालतीमुण्डमालः, गद्गदतया स्वरस्य स्वभावपाटलतया च चक्षुषः क्षीब इव यौवनमदेन वलगद्दलदामकः, करसंपुटमृदितया मृदा दिङ्नागकुम्भाभावंसकूटौ पुनः पुनः परिपङ्कयन् सान्द्रचन्दनकर्दमदत्तैरव्यवस्थास्थासकैरितिसितजलधरशकल- शारित इव शारदाकाशैकदेशः, केतकीगर्भपत्रपाण्डुरस्य चण्डातकस्योपरि विस्रब्धमिति । एतदर्थमेव राजादीनां परिग्रहः । प्रत्यूहो विघ्नः । कौणपेषु राक्ष- सेषु । सहसेत्यादौ । कुवलयश्यामBlank: पुरुष उज्जगामेति संबन्धः । लोहस्तम्भ इति । लोहशब्देन सारता कृष्णता चोक्ता । गर्भान्मध्यात् , उदराच्च । घना निविडाः । निबिडकुटिला अतिकुञ्चिताः कुन्तलाः केशाः । मौलिश्चूडा, किरीटं च । उक्तं च- 'चूडा किरीटं केशाश्च संहता मौलयस्त्रयः' । स्थासकैश्चन्द्रकैः फाली कख्याबन्धः । इस प्रकार दिक्पाल होकर तीनों अपने-अपने स्थान पर डट गए । तीनों की भुजाओं के पिंजड़े में घुस कर भैरवाचार्य ने अनाकुल मन से अनुष्ठान आरम्भ किया । विघ्न करने वाले राक्षसों ने बहुत देर तक शोरगुल मचाया । जब उनका कोई प्रयत्न सफल नहीं हुआ तब शान्त हो गए । आधी रात हुई तब भैरवाचार्य के घेरे से थोड़ी दूर उत्तर की ओर एकाएक धरती महावराह के दांतों द्वारा हुए विवर का स्मरण कराती हुई फटी । सहसा उस विवर से कुवलय के समान श्याम वर्ण वाला कोई पुरुष बाहर आया । मानों किसी दिग्गज ने अपने लोहे के विशाल खूँटे को उखाड़ फेंका हो, या महावराह का ही स्थूल कन्धा निकल आया हो, या नरकासुर पृथिवी के गर्भ से निकल पड़ा हो, अथवा दैत्यराज बलि पाताल फोड़कर पहुँचा हो । उसके मस्तक पर रत्न दीपक के रूप में टिमटिमा रहा था जैसे इन्द्रनील के बने हुए कोठे पर दीपक जलता है । सिर के बाल चिकने, नीले, घने और अधिक घुमावदार थे । उस पर मालती का सिरमाल शोभ रहा था । उसकी आँखें स्वाभाविक लाल थीं । यौवन के मद से वह मतवाला-सा प्रतीत हो रहा था । उसके गले की माला हिल रही थी । दिग्गज के कुम्भ के समान अपने कन्धों पर हाथ से मिट्टी मळ-