भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 228

तृतीय उच्छ्वासः १८३ मानुषनिर्माणकारणकालुष्यपरमाणूनिव क्षयमुपनयन्तम्, आहुतिदानप- र्यस्ताभिः प्रेतमुखस्पर्शदूषितम्, प्रक्षालयन्तमिवाशुशुक्षणिं करनखदी- धितिभिः, धूमालोहितेन चक्षुषा क्षतजाहुतिमिव हुतभुजि पातयन्तम्, ईषद्विवृताधरपुटप्रकटितसितदशनशिखरेण दृश्यमानमूर्तमन्त्राक्षरपङ्क्तिनेव मुखेन किमपि जपन्तम्, होमश्रमस्वेदसलिलप्रतिबिम्बिताभिरासन्नदी- पिकाभिर्दहन्तमिव कर्मसिद्धये सर्वावयवान्, अंसावलम्बिना बहुगुणेन विद्याराजेनेव ब्रह्मसूत्रेण परिगृहीतं भैरवाचार्यमपश्यत् । उपसृत्य चाक- रोन्नमस्कारम् । अभिनन्दितश्च तेन स्वव्यापारमन्वतिष्ठत् । अत्रान्तरे पातालस्वामी शातक्रतवीमाशामङ्गीचकार, कर्णतालः कौबेरीं परिव्राट् प्राचेतसीम् । राजा तु त्रैशङ्कवेन ज्योतिषाङ्कितां ककुभ- मलंकृतवान् । मपि कालुष्यकथनम् । क्षतजमिति । प्रस्तावनानुगुण्येन रक्ताहुतिः संभाव्यते । जपव- शादीषदित्याद्युक्तम् । ईषद्विवृतत्वादेव शिखरग्रहणम् । प्रतिबिम्बादानोपपादनार्थ- मासन्नपदम् । गुणास्तन्तवः, गुणनं गुणाः । पौनःपुन्येनावर्तनं च । उत्कर्षो वा गुणः। विद्याराजो मन्त्रविशेषः । शातक्रतवीं पूर्वीम् । अङ्गीचकारेत्यनेन सर्वेषां स्वरुचिपरिगृहीतत्वमुक्तम् । कौबेरीमुत्तराम् । प्राचेतसीं पश्चिमाम् । त्रिशङ्कुरिक्ष्वाकुवंशयः शापाच्चण्डालतां प्राप्तो यज्ञेन स्वर्गमारुरुक्षुरर्धपथे देवैर्निवारितो दक्षिणस्यां दिश्युदेति । तेन त्रैश- ङ्कवेन ज्योतिषाङ्कितां ककुभं दिशं दक्षिणाम् । दक्षिणस्यामित्युक्तेऽनिष्टप्रतीतिरिति त्रैशङ्कवेनेत्युक्तम् । जन्म लेने के हेतु कालुष्य के समस्त परमाणुओं का विनाश कर रहे हों । आहुति डालते समय उनके हाथ के नखों की किरणें फैल जाती थीं मानों प्रेत के मुँह के स्पर्श से दूषित अग्नि को धोकर पवित्र कर रहे थे । धुँए के लगने से उनकी आँखें लाल हो रही थीं मानों अग्नि में रक्त की आहुति डाल रहे थे । वे जप कर रहे थे, उनका अधर कुछ खुला हुआ था, उनके दाँत मूर्तिमान् मन्त्र के अक्षरों की भाँति दिखाई पड़ रहे थे । उनके पास में रखे हुए दीये शरीर के छूटते हुए पसीनों में झलक रहे थे, मानों वे कर्मसिद्धि के लिए अपने अङ्ग जला रहे थे । उनके कन्धे से विद्याराज नामक मन्त्र के समान बहुत गुणों वाला ब्रह्मसूत्र लटक रहा था । राजा ने भैरवाचार्य के पास जाकर नमस्कार किया । फिर राजा अपने काम में लग गए । इसी बीच पातालस्वामी पूर्व दिशा में बैठा, कर्णताल उत्तर में और टीटिभ पश्चिम में डट गया । राजा ने दक्षिण दिशा को अलंकृत किया जो त्रिशंकु के तेज से चिह्नित है ।