भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 227

अवनिपतिस्तु—'कोऽत्र कः?' इति त्रीनपृच्छत्। आचचक्षिरे च स्वं स्वं नाम त्रयोऽपि ते। तैरेव चानुगम्यमानो जगाम तां बलिदीपा- लोकजर्जरितगुग्गुलुधूपधूमगृह्यमाणदिग्विभागतया विक्षिप्यमाणरक्षासर्ष- पार्थदग्धान्धकारपलायमाननिशामिव समुपकल्पितसर्वोपकरणां निःशब्दां च गम्भीरां च भीषणां च साधनभूमिम्। तस्यां च कुमुदधूलिधवलेन भस्मना लिखितस्य महतो मण्डलस्य मध्ये स्थितं दीप्ततरतेजःप्रसरम्, पृथुपरिवेषपरिक्षिप्तमिव शरत्सविता- रम्, मथ्यमानक्षीरोदावर्त्तवर्तिनमिव मन्दरम्, रक्तचन्दनानुलेपिनो रक्तस्रगम्बराभरणस्योत्तानशयस्य शवस्योरस्युपविश्य जातजातवेदसि मुखकुहरे प्रारब्धाग्निकार्यम्, कृष्णोष्णीषम्, कृष्णाङ्गरागम्, कृष्ण- प्रतिसरम्, कृष्णवाससम्, कृष्णतिलाहुतिनिभेन विद्याधरत्वतृष्णया कोऽत्र क इति वाक्यैकदेशोऽयम्। अत्र कः कः स्थित इत्यर्थः। बलीत्यादिना- र्धदग्धत्वसम्भावनम्। अर्धदग्धस्य पलायनमुचितम्। न तु बहुदग्धस्य। पलायंश्च दिग्भागान्गृह्णाति। सर्षपो गौरसिद्धार्थः। तस्यां चेत्यादौ। भैरवाचार्यमपश्यदिति संबन्धः। पृथुपरिवेषेत्यादिना भीष- णीयत्वमुक्तम्। परिवेषः परिधिः। परिक्षिप्तं परिवेलितम्। शरदि सविता दीप्त- तरतेजःप्रसरो भवतीति शरद्ग्रहणम्। जात उत्पन्नः, न तूत्सिक्तः। प्रतिसरो हस्तसूत्रम्। दिक्षु काण्डसूत्रप्रतिबन्ध इति। अत्र तिलानां कृष्णत्वात्परमाणूना- राजा ने उन तीनों से पूछा—'आप में कौन कौन है?' तीनों ने अपना अपना परिचय दिया। उन्हें साथ लेकर राजा भैरवाचार्य की सुनसान, गम्भीर और भयङ्कर साधनाभूमि में पहुँचे। वहाँ बलिदीप का प्रकाश फैल रहा था, जलते हुए गुग्गुल के धूप की सुगन्ध दिशाओं में फैल रही थी, अग्नियों में छींटे जाते हुए रक्षासर्षप के धुँए के रूप में मानों रात भाग रही थी। इस प्रकार सब सामग्री वहाँ उपस्थित थी। उस साधनाभूमि में कुमुद के पराग के समान भस्म से पुरे गए महामण्डल के बीच में बैठे हुए भैरवाचार्य को देखा। उनका स्वाभाविक तेज उस समय बढ़ गया था। विशाल परिधि से घिरे हुए शरत्कालीन सूर्य के समान लग रहे थे। मथे जाते हुए क्षीरसमुद्र की भँवरियों के बीच मन्दर के समान सुशोभित थे। रक्त चन्दन से चर्चित, लाल माला और लाल वस्त्र से अलंकृत, उत्तान पड़े हुये शव की छाती पर बैठकर उसके मुँह में अग्नि जलाकर हवन कर रहे थे। काली पगड़ी, काला अंगराग, काली राखी, काला वस्त्र पहिने हुए थे। विद्याधर बनने की इच्छा से काले तिल की आहुति दे रहे थे, मानों मनुष्य के