भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 226

तृतीय उच्छ्वासः १८१ टिटविकटस्वस्तिकाप्रन्थीन्महामुद्राबन्धानिव धारयन्तो मूर्धभिः एक श्रव- णविवरविततविमलदन्तपत्रप्रभालोकलेपधवलितकपोलैर्मुखैरपिबन्त इव निशाचरापचयचिकीर्षया शार्वरमन्धकारम्, इतरकर्णावलम्बिनां रत्नकुण्डलानामच्छाच्छया रुचा गोरोचनयेव मन्त्रपरिजप्तया समाल- ब्धाङ्गाः, स्वप्रतिबिम्बगर्भान्कर्मसिद्धये दत्तपुरुषोपहारानिवोल्लासयन्तो निशितान्निस्त्रिंशान्, निस्त्रिंशांशुसंतानसीमन्तिततिमिरामात्मीयात्मीय- दिग्भागसंरक्षणाय त्रिधेव त्रियामां पाटयन्तः, सार्धचन्द्रैः कलधौतबु- द्बुदावलितरलतारागणैर्निशाया इव परुषासिधारानिकृत्तैः खड्गैर्गृहीतै- श्चर्मफलकैरकाण्डशर्वरीमपरां घटयन्तः, काञ्चनशृङ्खलाकलापनियमित- निबिडनिष्प्रवाणयः, बद्धासिधेनवः, टीटिभकर्णतालपातालस्वामिनो निवेदितवन्तश्चात्मानम् ।

सन्नद्धः सकवचः । उक्तं च—'संनद्धो वर्मितः सज्जो दंशितो व्यूढकङ्कटः' । अप- चयो हानिः । गोरोचनयेवेति सहोपमेयम् । उल्लासयन्तश्चालयन्तः । सार्धचन्द्रैरिति । निशायां खड्गेषु चन्द्रखण्डस्य संभाव्यमानत्वादेवमुक्तम् । न तु वस्तुवृत्तेन । कृष्ण- चतुर्दशीक्षपायां चन्द्रः संभवतीति । कलधौतं हेम रौप्यं वा । बुद्बुदावलिर्बिन्दु- पङ्क्तिः । चर्मफलकैः स्फटकैः । एकस्या वर्तमानत्वाह—अपरामिति । निष्प्रवाणि नवं वस्त्रम् । उक्तं च—'अनाहतं निष्प्रवाणि तन्त्रकं च नवाम्बरे' । असिधेनुः कृपाणम् ।

थी, मानों महामुद्राबंधों को धारण कर रहा हो । एक ही कान पर लटकते हुए निर्मल दन्तपत्र की प्रभा से उनके मुखकमल भर रहे थे मानों राक्षसों के विनाश की इच्छा से रात्रि के अन्धकार पीते जा रहे थे । उनके दूसरे कान में रत्नकुण्डल लटक रहे थे जिनकी किरणें अभिमन्त्रित गोरोचना की भाँति उनके अङ्गों में लग रही थीं । तेज धार वाली तलवारों में उनकी छाया पड़ रही थी मानों कर्मसिद्धि के लिए उनसे पुरुषों की बलि दी गई हो । वे तलवार की किरणों से अन्धकार को छाँट रहे थे मानों अलग-अलग अपनी अपनी दिशा की रक्षा के लिए रात को तीन भागों में बाँट रहे हों । उनके हाथ में ढाल भी थे जिन पर अर्धचन्द्र और सोने की बुंदकियाँ बनी हुई थीं मानों तलवार की तेज धार से रात के टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे और मानों दूसरी रात का निर्माण कर रहे हों । कमर में सोने की सीकरी से नया वस्त्र बँधा हुआ था और उसमें छुरी खोसी हुई थी । टीटिम, कर्णताल और पातालस्वामी तीनों सामने आ गए ।