भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 225

१८० हर्षचरितम् तरि, यातुधानीष्विव वर्धमानासु तरुच्छायासु, पातालतलवासिषु विघ्नाथ दानवेष्विवोत्तिष्ठत्सु तमोमण्डलेषु, नभसि पुञ्जीभवति, रौद्रं कर्म दिदृ- क्षमाण इव नक्षत्रगणे, विगाढायां शर्वर्याम्, सुप्तजने निःशब्दस्तिमिते निशीथे, राजा सान्तःपुरं परिजनं वञ्चयित्वा वामकरस्फुरत्सरुर्दक्षिण- करेणोत्खातं खड्गमट्टहासमादाय विसर्पता च खड्गप्रभापटलेन नीलांशु- कपटेनेव दर्शनभयादवगुण्ठितनिखिलगात्रयष्टिरनादिष्ट्याप्यनुगम्यमानो राजलक्ष्म्या पृष्ठतः परिमललमधुकरवेणिव्याजेन केशेष्विव कर्मसिद्धि- माकर्षन्नेकाकी नगराग्निरगात् । अगाच्च तमुद्देशम् । अथ प्रत्युपजग्मुस्ते त्रयोऽपि द्रौणिकृपकृतवर्माण इव सौप्तिके संनद्धाः स्नाताः स्रग्विणो गृहीतविकटवेषाः, कुसुमशेखरसंचारिभिः क्रिय- माणमन्त्रशिखाबन्धा इव गुञ्जद्भिः षट्चरणैरुष्णीषपट्टकांङ्गललाटमध्यघ- राग्निरगादिति संबन्धः । यातुधानीषु राक्षसीषु । पुञ्जीभवतीति । कृष्णरात्र्यां नक्षत्र- गतपुञ्जीभावो लक्ष्यते । दिदृक्षवोऽपीतस्ततः पुञ्जीभवन्ति । विगाढायां घनायाम् । निशीथेऽर्धरात्रे । नीलेत्यादि सहोपमेयम् । सुप्तेषु भवं सौप्तिकम् । धृष्टद्युम्नाधिष्ठिताक्षौहिणीविनाशाय दुर्योधनप्रेरितादि- वार्जुननाधिष्ठितानां न किंचिद्देशां शक्यमिति रात्राववस्कन्दमयच्छन्निति वार्ता । स्वाभाविक प्रेम से मानों सूर्य स्वयं पश्चिम दिशा के दिक्पाल बन रहे थे । राक्षसी स्त्रियों की भाँति वृक्षों की छाया बढ़ने लगी । विघ्न करने के लिए पातालनिवासी दानवों की तरह अन्धकार चारों ओर उठने लगे । तारे मानों उस रौद्र कर्म को देखने की इच्छा से आकाश में एकत्रित होने लगे । रात गहरी हो गई । लोग सो गए, चारों ओर निसबद छा गया । तब राजा अन्तःपुर और परिजनों को चकमा देकर नगर से अकेला निकल पड़ा । उसके बायें हाथ में खड्ग की मूठ थी और दाहिने हाथ में नङ्गी तलवार थी जिसकी प्रभा इस प्रकार निकल रही थी मानों दिखाई पड़ने के भय से नीले अंशुक से अपनी सारी देह ढक कर राजलक्ष्मी बिना आदेश के उसके पीछे चल पड़ी हो । राजा के बालों की सुगन्ध के पीछे भौंरे लुझते जा रहे थे मानों कर्म की सिद्धि ही साथ साथ खिंचती जा रही हो । राजा उसी स्थान पर पहुँचा । उन तीनों ने राजा का स्वागत किया, जैसे महाभारत के सौप्तिक पर्व में अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा मिले थे । वे वहाँ स्नान करके माला पहने और विकट वेष धारण किए तैयार थे । उनकी शिखा के फूलों में भौंरे गुजार कर रहे थे मानों शिखाबन्ध के मन्त्र पढ़ रहे हों । उनके माथे पर उष्णीषपट्ट के बीचोबीच ऊँचा स्वस्तिकाग्रन्थि बँधी