हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
१८० हर्षचरितम् तरि, यातुधानीष्विव वर्धमानासु तरुच्छायासु, पातालतलवासिषु विघ्नाथ दानवेष्विवोत्तिष्ठत्सु तमोमण्डलेषु, नभसि पुञ्जीभवति, रौद्रं कर्म दिदृ- क्षमाण इव नक्षत्रगणे, विगाढायां शर्वर्याम्, सुप्तजने निःशब्दस्तिमिते निशीथे, राजा सान्तःपुरं परिजनं वञ्चयित्वा वामकरस्फुरत्सरुर्दक्षिण- करेणोत्खातं खड्गमट्टहासमादाय विसर्पता च खड्गप्रभापटलेन नीलांशु- कपटेनेव दर्शनभयादवगुण्ठितनिखिलगात्रयष्टिरनादिष्ट्याप्यनुगम्यमानो राजलक्ष्म्या पृष्ठतः परिमललमधुकरवेणिव्याजेन केशेष्विव कर्मसिद्धि- माकर्षन्नेकाकी नगराग्निरगात् । अगाच्च तमुद्देशम् । अथ प्रत्युपजग्मुस्ते त्रयोऽपि द्रौणिकृपकृतवर्माण इव सौप्तिके संनद्धाः स्नाताः स्रग्विणो गृहीतविकटवेषाः, कुसुमशेखरसंचारिभिः क्रिय- माणमन्त्रशिखाबन्धा इव गुञ्जद्भिः षट्चरणैरुष्णीषपट्टकांङ्गललाटमध्यघ- राग्निरगादिति संबन्धः । यातुधानीषु राक्षसीषु । पुञ्जीभवतीति । कृष्णरात्र्यां नक्षत्र- गतपुञ्जीभावो लक्ष्यते । दिदृक्षवोऽपीतस्ततः पुञ्जीभवन्ति । विगाढायां घनायाम् । निशीथेऽर्धरात्रे । नीलेत्यादि सहोपमेयम् । सुप्तेषु भवं सौप्तिकम् । धृष्टद्युम्नाधिष्ठिताक्षौहिणीविनाशाय दुर्योधनप्रेरितादि- वार्जुननाधिष्ठितानां न किंचिद्देशां शक्यमिति रात्राववस्कन्दमयच्छन्निति वार्ता । स्वाभाविक प्रेम से मानों सूर्य स्वयं पश्चिम दिशा के दिक्पाल बन रहे थे । राक्षसी स्त्रियों की भाँति वृक्षों की छाया बढ़ने लगी । विघ्न करने के लिए पातालनिवासी दानवों की तरह अन्धकार चारों ओर उठने लगे । तारे मानों उस रौद्र कर्म को देखने की इच्छा से आकाश में एकत्रित होने लगे । रात गहरी हो गई । लोग सो गए, चारों ओर निसबद छा गया । तब राजा अन्तःपुर और परिजनों को चकमा देकर नगर से अकेला निकल पड़ा । उसके बायें हाथ में खड्ग की मूठ थी और दाहिने हाथ में नङ्गी तलवार थी जिसकी प्रभा इस प्रकार निकल रही थी मानों दिखाई पड़ने के भय से नीले अंशुक से अपनी सारी देह ढक कर राजलक्ष्मी बिना आदेश के उसके पीछे चल पड़ी हो । राजा के बालों की सुगन्ध के पीछे भौंरे लुझते जा रहे थे मानों कर्म की सिद्धि ही साथ साथ खिंचती जा रही हो । राजा उसी स्थान पर पहुँचा । उन तीनों ने राजा का स्वागत किया, जैसे महाभारत के सौप्तिक पर्व में अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा मिले थे । वे वहाँ स्नान करके माला पहने और विकट वेष धारण किए तैयार थे । उनकी शिखा के फूलों में भौंरे गुजार कर रहे थे मानों शिखाबन्ध के मन्त्र पढ़ रहे हों । उनके माथे पर उष्णीषपट्ट के बीचोबीच ऊँचा स्वस्तिकाग्रन्थि बँधी
तृतीय उच्छ्वासः १८१ टिटविकटस्वस्तिकाप्रन्थीन्महामुद्राबन्धानिव धारयन्तो मूर्धभिः एक श्रव- णविवरविततविमलदन्तपत्रप्रभालोकलेपधवलितकपोलैर्मुखैरपिबन्त इव निशाचरापचयचिकीर्षया शार्वरमन्धकारम्, इतरकर्णावलम्बिनां रत्नकुण्डलानामच्छाच्छया रुचा गोरोचनयेव मन्त्रपरिजप्तया समाल- ब्धाङ्गाः, स्वप्रतिबिम्बगर्भान्कर्मसिद्धये दत्तपुरुषोपहारानिवोल्लासयन्तो निशितान्निस्त्रिंशान्, निस्त्रिंशांशुसंतानसीमन्तिततिमिरामात्मीयात्मीय- दिग्भागसंरक्षणाय त्रिधेव त्रियामां पाटयन्तः, सार्धचन्द्रैः कलधौतबु- द्बुदावलितरलतारागणैर्निशाया इव परुषासिधारानिकृत्तैः खड्गैर्गृहीतै- श्चर्मफलकैरकाण्डशर्वरीमपरां घटयन्तः, काञ्चनशृङ्खलाकलापनियमित- निबिडनिष्प्रवाणयः, बद्धासिधेनवः, टीटिभकर्णतालपातालस्वामिनो निवेदितवन्तश्चात्मानम् ।
सन्नद्धः सकवचः । उक्तं च—'संनद्धो वर्मितः सज्जो दंशितो व्यूढकङ्कटः' । अप- चयो हानिः । गोरोचनयेवेति सहोपमेयम् । उल्लासयन्तश्चालयन्तः । सार्धचन्द्रैरिति । निशायां खड्गेषु चन्द्रखण्डस्य संभाव्यमानत्वादेवमुक्तम् । न तु वस्तुवृत्तेन । कृष्ण- चतुर्दशीक्षपायां चन्द्रः संभवतीति । कलधौतं हेम रौप्यं वा । बुद्बुदावलिर्बिन्दु- पङ्क्तिः । चर्मफलकैः स्फटकैः । एकस्या वर्तमानत्वाह—अपरामिति । निष्प्रवाणि नवं वस्त्रम् । उक्तं च—'अनाहतं निष्प्रवाणि तन्त्रकं च नवाम्बरे' । असिधेनुः कृपाणम् ।
थी, मानों महामुद्राबंधों को धारण कर रहा हो । एक ही कान पर लटकते हुए निर्मल दन्तपत्र की प्रभा से उनके मुखकमल भर रहे थे मानों राक्षसों के विनाश की इच्छा से रात्रि के अन्धकार पीते जा रहे थे । उनके दूसरे कान में रत्नकुण्डल लटक रहे थे जिनकी किरणें अभिमन्त्रित गोरोचना की भाँति उनके अङ्गों में लग रही थीं । तेज धार वाली तलवारों में उनकी छाया पड़ रही थी मानों कर्मसिद्धि के लिए उनसे पुरुषों की बलि दी गई हो । वे तलवार की किरणों से अन्धकार को छाँट रहे थे मानों अलग-अलग अपनी अपनी दिशा की रक्षा के लिए रात को तीन भागों में बाँट रहे हों । उनके हाथ में ढाल भी थे जिन पर अर्धचन्द्र और सोने की बुंदकियाँ बनी हुई थीं मानों तलवार की तेज धार से रात के टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे और मानों दूसरी रात का निर्माण कर रहे हों । कमर में सोने की सीकरी से नया वस्त्र बँधा हुआ था और उसमें छुरी खोसी हुई थी । टीटिम, कर्णताल और पातालस्वामी तीनों सामने आ गए ।
अवनिपतिस्तु—'कोऽत्र कः?' इति त्रीनपृच्छत्। आचचक्षिरे च स्वं स्वं नाम त्रयोऽपि ते। तैरेव चानुगम्यमानो जगाम तां बलिदीपा- लोकजर्जरितगुग्गुलुधूपधूमगृह्यमाणदिग्विभागतया विक्षिप्यमाणरक्षासर्ष- पार्थदग्धान्धकारपलायमाननिशामिव समुपकल्पितसर्वोपकरणां निःशब्दां च गम्भीरां च भीषणां च साधनभूमिम्। तस्यां च कुमुदधूलिधवलेन भस्मना लिखितस्य महतो मण्डलस्य मध्ये स्थितं दीप्ततरतेजःप्रसरम्, पृथुपरिवेषपरिक्षिप्तमिव शरत्सविता- रम्, मथ्यमानक्षीरोदावर्त्तवर्तिनमिव मन्दरम्, रक्तचन्दनानुलेपिनो रक्तस्रगम्बराभरणस्योत्तानशयस्य शवस्योरस्युपविश्य जातजातवेदसि मुखकुहरे प्रारब्धाग्निकार्यम्, कृष्णोष्णीषम्, कृष्णाङ्गरागम्, कृष्ण- प्रतिसरम्, कृष्णवाससम्, कृष्णतिलाहुतिनिभेन विद्याधरत्वतृष्णया कोऽत्र क इति वाक्यैकदेशोऽयम्। अत्र कः कः स्थित इत्यर्थः। बलीत्यादिना- र्धदग्धत्वसम्भावनम्। अर्धदग्धस्य पलायनमुचितम्। न तु बहुदग्धस्य। पलायंश्च दिग्भागान्गृह्णाति। सर्षपो गौरसिद्धार्थः। तस्यां चेत्यादौ। भैरवाचार्यमपश्यदिति संबन्धः। पृथुपरिवेषेत्यादिना भीष- णीयत्वमुक्तम्। परिवेषः परिधिः। परिक्षिप्तं परिवेलितम्। शरदि सविता दीप्त- तरतेजःप्रसरो भवतीति शरद्ग्रहणम्। जात उत्पन्नः, न तूत्सिक्तः। प्रतिसरो हस्तसूत्रम्। दिक्षु काण्डसूत्रप्रतिबन्ध इति। अत्र तिलानां कृष्णत्वात्परमाणूना- राजा ने उन तीनों से पूछा—'आप में कौन कौन है?' तीनों ने अपना अपना परिचय दिया। उन्हें साथ लेकर राजा भैरवाचार्य की सुनसान, गम्भीर और भयङ्कर साधनाभूमि में पहुँचे। वहाँ बलिदीप का प्रकाश फैल रहा था, जलते हुए गुग्गुल के धूप की सुगन्ध दिशाओं में फैल रही थी, अग्नियों में छींटे जाते हुए रक्षासर्षप के धुँए के रूप में मानों रात भाग रही थी। इस प्रकार सब सामग्री वहाँ उपस्थित थी। उस साधनाभूमि में कुमुद के पराग के समान भस्म से पुरे गए महामण्डल के बीच में बैठे हुए भैरवाचार्य को देखा। उनका स्वाभाविक तेज उस समय बढ़ गया था। विशाल परिधि से घिरे हुए शरत्कालीन सूर्य के समान लग रहे थे। मथे जाते हुए क्षीरसमुद्र की भँवरियों के बीच मन्दर के समान सुशोभित थे। रक्त चन्दन से चर्चित, लाल माला और लाल वस्त्र से अलंकृत, उत्तान पड़े हुये शव की छाती पर बैठकर उसके मुँह में अग्नि जलाकर हवन कर रहे थे। काली पगड़ी, काला अंगराग, काली राखी, काला वस्त्र पहिने हुए थे। विद्याधर बनने की इच्छा से काले तिल की आहुति दे रहे थे, मानों मनुष्य के
तृतीय उच्छ्वासः १८३ मानुषनिर्माणकारणकालुष्यपरमाणूनिव क्षयमुपनयन्तम्, आहुतिदानप- र्यस्ताभिः प्रेतमुखस्पर्शदूषितम्, प्रक्षालयन्तमिवाशुशुक्षणिं करनखदी- धितिभिः, धूमालोहितेन चक्षुषा क्षतजाहुतिमिव हुतभुजि पातयन्तम्, ईषद्विवृताधरपुटप्रकटितसितदशनशिखरेण दृश्यमानमूर्तमन्त्राक्षरपङ्क्तिनेव मुखेन किमपि जपन्तम्, होमश्रमस्वेदसलिलप्रतिबिम्बिताभिरासन्नदी- पिकाभिर्दहन्तमिव कर्मसिद्धये सर्वावयवान्, अंसावलम्बिना बहुगुणेन विद्याराजेनेव ब्रह्मसूत्रेण परिगृहीतं भैरवाचार्यमपश्यत् । उपसृत्य चाक- रोन्नमस्कारम् । अभिनन्दितश्च तेन स्वव्यापारमन्वतिष्ठत् । अत्रान्तरे पातालस्वामी शातक्रतवीमाशामङ्गीचकार, कर्णतालः कौबेरीं परिव्राट् प्राचेतसीम् । राजा तु त्रैशङ्कवेन ज्योतिषाङ्कितां ककुभ- मलंकृतवान् । मपि कालुष्यकथनम् । क्षतजमिति । प्रस्तावनानुगुण्येन रक्ताहुतिः संभाव्यते । जपव- शादीषदित्याद्युक्तम् । ईषद्विवृतत्वादेव शिखरग्रहणम् । प्रतिबिम्बादानोपपादनार्थ- मासन्नपदम् । गुणास्तन्तवः, गुणनं गुणाः । पौनःपुन्येनावर्तनं च । उत्कर्षो वा गुणः। विद्याराजो मन्त्रविशेषः । शातक्रतवीं पूर्वीम् । अङ्गीचकारेत्यनेन सर्वेषां स्वरुचिपरिगृहीतत्वमुक्तम् । कौबेरीमुत्तराम् । प्राचेतसीं पश्चिमाम् । त्रिशङ्कुरिक्ष्वाकुवंशयः शापाच्चण्डालतां प्राप्तो यज्ञेन स्वर्गमारुरुक्षुरर्धपथे देवैर्निवारितो दक्षिणस्यां दिश्युदेति । तेन त्रैश- ङ्कवेन ज्योतिषाङ्कितां ककुभं दिशं दक्षिणाम् । दक्षिणस्यामित्युक्तेऽनिष्टप्रतीतिरिति त्रैशङ्कवेनेत्युक्तम् । जन्म लेने के हेतु कालुष्य के समस्त परमाणुओं का विनाश कर रहे हों । आहुति डालते समय उनके हाथ के नखों की किरणें फैल जाती थीं मानों प्रेत के मुँह के स्पर्श से दूषित अग्नि को धोकर पवित्र कर रहे थे । धुँए के लगने से उनकी आँखें लाल हो रही थीं मानों अग्नि में रक्त की आहुति डाल रहे थे । वे जप कर रहे थे, उनका अधर कुछ खुला हुआ था, उनके दाँत मूर्तिमान् मन्त्र के अक्षरों की भाँति दिखाई पड़ रहे थे । उनके पास में रखे हुए दीये शरीर के छूटते हुए पसीनों में झलक रहे थे, मानों वे कर्मसिद्धि के लिए अपने अङ्ग जला रहे थे । उनके कन्धे से विद्याराज नामक मन्त्र के समान बहुत गुणों वाला ब्रह्मसूत्र लटक रहा था । राजा ने भैरवाचार्य के पास जाकर नमस्कार किया । फिर राजा अपने काम में लग गए । इसी बीच पातालस्वामी पूर्व दिशा में बैठा, कर्णताल उत्तर में और टीटिभ पश्चिम में डट गया । राजा ने दक्षिण दिशा को अलंकृत किया जो त्रिशंकु के तेज से चिह्नित है ।
१८४ हर्षचरितम् एवं चावस्थितेषु दिक्पालेषु दिक्पालभुजपञ्जरप्रविष्टे विस्रब्धं कर्म साधयति भैरवं भैरवाचार्येऽतिचिरं च कृतकोलाहलेषु निष्फलप्रयत्नेषु प्रत्यूहकारिषु शान्तेषु कौणपेषु गलत्यर्धरात्रसमये मण्डलस्य नातिदवी- यस्युत्तरेणाकस्मादेव प्रलयमहावराहदंष्ट्राविवरमिव दर्शयन्ती क्षितिरदी- र्यत । सहसैव च तस्माद्विरदाशावारणोत्क्षिप्त इवालान लोहस्तम्भः, महावराहपीवरस्कन्धपीठो नरकासुर इव भुवो गर्भादुद्भूतो बलिदानव इव भित्त्वोत्थितः पातालम् , इन्द्रनीलप्रासाद इवोपरिज्ज्वलितरत्नप्रदीपः, स्निग्धनीलघननिबिडकुटिलकुन्तलकान्तमौलिरुन्मीलन्मालतीमुण्डमालः, गद्गदतया स्वरस्य स्वभावपाटलतया च चक्षुषः क्षीब इव यौवनमदेन वलगद्दलदामकः, करसंपुटमृदितया मृदा दिङ्नागकुम्भाभावंसकूटौ पुनः पुनः परिपङ्कयन् सान्द्रचन्दनकर्दमदत्तैरव्यवस्थास्थासकैरितिसितजलधरशकल- शारित इव शारदाकाशैकदेशः, केतकीगर्भपत्रपाण्डुरस्य चण्डातकस्योपरि विस्रब्धमिति । एतदर्थमेव राजादीनां परिग्रहः । प्रत्यूहो विघ्नः । कौणपेषु राक्ष- सेषु । सहसेत्यादौ । कुवलयश्यामBlank: पुरुष उज्जगामेति संबन्धः । लोहस्तम्भ इति । लोहशब्देन सारता कृष्णता चोक्ता । गर्भान्मध्यात् , उदराच्च । घना निविडाः । निबिडकुटिला अतिकुञ्चिताः कुन्तलाः केशाः । मौलिश्चूडा, किरीटं च । उक्तं च- 'चूडा किरीटं केशाश्च संहता मौलयस्त्रयः' । स्थासकैश्चन्द्रकैः फाली कख्याबन्धः । इस प्रकार दिक्पाल होकर तीनों अपने-अपने स्थान पर डट गए । तीनों की भुजाओं के पिंजड़े में घुस कर भैरवाचार्य ने अनाकुल मन से अनुष्ठान आरम्भ किया । विघ्न करने वाले राक्षसों ने बहुत देर तक शोरगुल मचाया । जब उनका कोई प्रयत्न सफल नहीं हुआ तब शान्त हो गए । आधी रात हुई तब भैरवाचार्य के घेरे से थोड़ी दूर उत्तर की ओर एकाएक धरती महावराह के दांतों द्वारा हुए विवर का स्मरण कराती हुई फटी । सहसा उस विवर से कुवलय के समान श्याम वर्ण वाला कोई पुरुष बाहर आया । मानों किसी दिग्गज ने अपने लोहे के विशाल खूँटे को उखाड़ फेंका हो, या महावराह का ही स्थूल कन्धा निकल आया हो, या नरकासुर पृथिवी के गर्भ से निकल पड़ा हो, अथवा दैत्यराज बलि पाताल फोड़कर पहुँचा हो । उसके मस्तक पर रत्न दीपक के रूप में टिमटिमा रहा था जैसे इन्द्रनील के बने हुए कोठे पर दीपक जलता है । सिर के बाल चिकने, नीले, घने और अधिक घुमावदार थे । उस पर मालती का सिरमाल शोभ रहा था । उसकी आँखें स्वाभाविक लाल थीं । यौवन के मद से वह मतवाला-सा प्रतीत हो रहा था । उसके गले की माला हिल रही थी । दिग्गज के कुम्भ के समान अपने कन्धों पर हाथ से मिट्टी मळ-
[PageHeader] तृतीय उच्छ्वासः १८५ [/PageHeader]
क्षामतरीकृतकुक्षिः, कच्छाबन्धं विधाय विलासविक्षिप्तेन धवलव्यायाम- फालीपटान्तेन धरणितलगतेन धार्यमाण इव पृष्ठतः शेषेण स्थिरस्थूलो- रुरुद्दण्डः, भूमिभङ्गभयेनेव मन्थराणि स्थापयन्पदानि निर्भरगर्वगुरु कथ- मपि शैलमिव गात्रमुद्वहन्दर्पेण मुहुर्मुहुरुरसि द्विगुणिते दोष्णि वामे तिर्यगुत्क्षिप्ते च दक्षिणे जङ्घाकाण्डे कुण्डलिते चण्डास्फोटनटांकारैः कर्म- विघ्ननिर्घातानिव पातयन्नेकेन्द्रियविकलमिव जीवलोकं कुर्वन्कुवलयशा- मलः पुरुष उज्जगाम । जगाद च विहस्य नरसिंहनादनिर्घोषघोरया भारत्या—'भो विद्याधरीश्रद्धाकामुक ! किमयं विद्यावलेपः सहायमदो वा यदस्मै जनायाविधाय बलिं बालिश इव सिद्धिमभिलषसि ? का ते दुर्बु- द्धिरियम् ? एतावता कालेन क्षेत्राधिपतिरस्य मन्नाम्नैव लब्धव्यपदेशस्य देशस्य नागतस्ते श्रोत्रोपकण्ठं श्रीकण्ठनामा नागोऽहम् ? अनिच्छति
शेषेनेति । शेषो धवलः, धरणितलगतश्च । पटान्तेनापि विशेषेणावतिष्ठते । आस्फोटनं बाह्वादिशब्दः । एकेन्द्रियम् । अर्थात्श्रोत्रम् । निर्घोषो दिक्षु व्याप्तिः । अत्र विद्या- धरीत्यादि हेपनार्थमामन्त्रणम् । श्रद्धाग्रहणं फलाभावप्रतिपादनाय । अस्मायित्यादि सर्वगर्मेयमुक्तिः । बालिशो मूर्खः । अभिलषसीति फलाभावसूचनपदम् । अपस-
मल कर आर्द्र कर रहा था । शरीर में जहाँ तहाँ गाढ़ चन्दन के थापे इस प्रकार लग रहे थे जैसे शरद्काल में उजले-उजले मेघखण्डों से रंगीन आकाश का एक भाग हो जाता है । केतकी के पत्ते-जैसे उजले चंडातक के ओढ़ने से उसका उदर कुछ क्षीण सा प्रतीत हो रहा था । कच्छ बाँध कर धरती तक नीची सफेद लम्बी पटली लटक रही थी, मानों पृथिवी पर आकर शेषनाग ने अपनी पीठ पर उसे धारण कर लिया हो । उसकी दोनों जाँघें गँसी हुई और मोटी थीं । जमीन के धँस जाने की वजह से वह अपना पैर धीरे-धीरे रख रहा था । अधिक मात्रा में गर्व के बोझ से पर्वत के समान बोझिल शरीर किसी प्रकार धारण कर रहा था । दर्प से बाँया हाथ मोड़ कर छाती पर रखे हुए, दाहिना हाथ तिरछा फेंकते हुए दाहिनी जाँघ मोड़कर उस पर थपेड़ी मारते हुए वह मानों भैरवाचार्य के कर्म में विघ्न उत्पन्न करने के लिए आँधी की आवाज उत्पन्न कर रहा था । मानों वह उस आवाज से सारे संसार को कर्णेन्द्रिय से रहित बना रहा था । नरसिंह के समान गर- गराहट भरी आवाज में वह बोल उठा—'अरे विद्याधरी के पीछे भागने वाले, क्या यह तुझे विद्या का गर्व है या अपने सहायकों के मद में फूल गया है जो मुझे बलि बिना दिए ही मूर्ख की भाँति सिद्धि प्राप्त कर लेना चाहता है ? यह तेरी कौन-सी दुर्बुद्धि है ? मैं श्रीकंठ नाग हूँ । मेरे ही नाम से यह देश भी प्रसिद्ध है । अभी तूने क्या नहीं सुना था ?
१८६ हर्षचरितम् मयि का शक्तिर्ग्रहगणस्यापि गन्तुं गगने। भूनाथोऽप्ययमनाथस्तपस्वी यस्त्वादृशैः शैवापसदैरुपकरणीक्रियते। सहस्वेदानीं सहामुना दुर्नरेन्द्रेण दुर्नयस्य फलम्' इत्यभिधाय च निष्ठुरैः प्रकोष्ठप्रहारैस्त्रीनपि टीटिभप्रभृ- तीनभिमुखं प्रधावितान्सशरीरावरणकृपाणानपातयत्। अथ। पूर्वाधिक्षेपश्रवणादशस्त्रव्रणैरप्यमर्षस्वेदच्छलेनानेकसमरपीतम- सिधाराजलमिव वमद्भिरवयवैरपि रोमाञ्चनिभेन मुक्तशरशतशल्यनिकर- भरलघुमिवात्मानं रणाय कुर्वद्भिरट्टहासेनापि प्रतिबिम्बिततारागणेन स्पष्टदृष्टधवलदन्तमालमवज्ञया हसतेव कथ्यमानसत्त्वावष्टम्भः परिकर- बन्धविभ्रमभ्रमितकरनखकिरणचक्रवालेने व्यपगमनाशङ्कया नागदमन- मन्त्रमण्डलबन्धेनेव रुन्धन्दशदिशो नरनाथः सावज्ञमवादीत्—'अरे काकोदर काक ! मयि स्थिते राजहंसे न जिह्रेषि बलिं याचितुम् ? दोऽधमः। दुर्नरेन्द्रेण कुराज्ञा। दुर्नरेन्द्रो मन्त्रतन्त्रानभिज्ञः। सशरीरेत्यादि। न तु नरेन्द्रवद्दशखान्। अथेत्यादौ। नरनाथः सावज्ञमवादीदिति संबन्धः। कथ्यमानेत्यादि। अशस्त्रव्र- णैश्चावयवैश्चाट्टहासेन च। मण्डलं गरुडशास्त्रप्रसिद्धमैन्द्रादिकम्। काकोदरः सर्पः। काकेति निन्दायाम्। काकस्थ च बलियाचनमुक्तम्। राजहंसो नृपवरः, हंसभेदश्च। मेरी इच्छा के प्रतिकूल आकाश में तारों की भी जाने की हिम्मत नहीं होती। यह पुष्प- भूति राजा होकर भी अनाथ की तरह बेचारा तेरे जैसे निम्न कोटि के शैवों के फन्दे में पड़ गया है। अब तू इस दुष्ट राजा के साथ-साथ अपनी दुर्नीति का फल चख।' यह कह कर प्रचंड मुक्कों की मार से सामने वार करते हुए टीटिभ आदि को शरीर के कंचुक और तलवार आदि के साथ गिरा दिया। राजा ने कभी ऐसी डाँट नहीं सुनी थी। मानों उसके अङ्गों में शस्त्र के प्रहार के बिना ही जैसे घाव हो गए, और अनेक युद्धों में पिए हुए तलवार के धाराजल को छोड़ने लगा। वह रोमांच के रूप में अनेक बाण छोड़-छोड़ कर मानों हल्का होकर रण के लिए तैयार हो गया। तारों के प्रतिबिम्ब के समान दाँतों को स्पष्ट दिखाते हुए जोर से हँस पड़ा, इससे अधिक उत्साह का वेग प्रतीत हो रहा था। कछाड़ बाँधते हुए उसके नखों की किरणें चारों ओर घूम गईं, मानों शत्रु के भाग जाने की शङ्का से सर्पों का दमन करने वाले गरुड़ मन्त्र से दिशाओं को बाँध रहा था। उसने उसे ललकारा—'अरे दुष्ट कौवा ! तू मेरे राजहंस के रहते बलि की याचना करने में लज्जित नहीं होता? इस तरह की कठोर बातों में कुछ नहीं। पराक्रम तो भुजाओं में रहता है न कि वचन में। शस्त्र उठा ।
तृतीय उच्छ्वासः १८७
अमीभिः किं वा परुषभाषितैः ? भुजे वीर्यं निवसति, न¹ वाचि। प्रति- पद्यस्व शस्त्रम्। अयं न भवसि। अगृहीतहेतिष्वशिक्षितो मे भुजः प्रह- र्तुम्' इति। नागस्त्वनादृततरम्—'एहि, किं शस्त्रेण ? भुजाभ्यामेव भनज्मि भवतो दर्पम्' इत्यभिधायास्फोटयामास। नरपतिरपि निरायुध- मायुधेन युधि लज्जमानो जेतुमुत्सृज्य सचर्मफलकमट्टहासमसिमधोरु- कस्योपरि बबन्ध बाहुयुद्धाय कक्ष्याम्। युयुधाते च निर्दयास्फोटनस्फुटि- तभुजरुधिरशीकरसिच्यमानौ शिलास्तम्भैरिव पतद्भिर्बाहुदण्डैः शब्दम- यमिव कुर्वाणौ भुवनं तौ। न चिराच्च पातयामास भूतले भुजङ्गमं भूपतिः। जग्राह च केशेषु। उज्जखान च शिरश्छेत्तुमट्टहासम्। अपश्यच्च वैकक्षक- मालान्तरेणास्य यज्ञोपवीतम्। उपसंहृतशस्त्रव्यापारश्चावादीत्—'दुर्विनीत! अस्ति ते दुर्नयनिर्वाहबीजमिदम्। यतो विश्रब्धमेवाचरसि चापलानि' इत्युक्त्वोत्ससर्ज च तम्। अनन्तरं च सहसैवातिबहलां ज्योत्स्नां ददर्श। शरदि विकसतां कमलवनानामिव च घ्राणावलेपिनमामोदमजिघ्रत्। झटिति च नूपुरशब्दमशृणोत्। व्यापारयामास च शब्दानुसारेण दृष्टिम्।
हेतिरायुधम्। आस्फोटयामास बाहौ करघातमकार्षीत्। असिमिति प्रशंसार्थः सामान्यपदप्रयोग इति रुद्रटः। वैकक्षमालान्तरितत्वेन, पूर्वमदर्शनं यज्ञोपवीतस्याह।
अगर नहीं उठाता तो मेरी भुजा ने शस्त्रहीनों पर वार करना नहीं सीखा है।' नाग ने अनादर के साथ कहा—'अरे, आ तो जा, शस्त्र से क्या ? हाथों से ही तेरा घमण्ड चूर करता हूँ।' यह कहकर उसने ताल ठोंका। निरायुध के साथ आयुध लेकर लज्जा का अनुभव करते हुए राजा ने ढाल के साथ तलवार फेंक दी और जाँघिया तक कछाड़ बाँध लिया। दोनों निर्दय होकर थाप से मारने लगे और एक दूसरे का खून बहाने लगे। इस प्रकार की आवाज से संसार भर रहा था। देर तक लड़कर भी वह उस नाग को नहीं गिरा सका। तब उसके बालों को पकड़ा। उसका सिर उड़ा देने के लिए तलवार खींच ली। तब उसकी वैकक्षक माला के भीतर जनेऊ पर राजा की दृष्टि पड़ी। शस्त्र के वार को रोककर उसने कहा—'दुर्विनीत, अनीति करके बच निकलने का बीज, यह तेरे पास है। तभी तू इतना निर्भीक होकर चपलता कर रहा है।' यह कहकर उसे छोड़ दिया। तत्पश्चात् उन्होंने अत्यधिक प्रकाश को देखा। शरत्काल में कमल-वनों की जैसी नाक में भर जाने वाली गन्ध को सूँघा और तभी नूपुर की आवाज सुन पड़ी। शब्द की ओर उसने आँखें फैलाई।
१. न वाचि सताम्.
१८८ हर्षचरितम् अथ करतलस्थितस्याट्टहासस्य मध्ये तडितमिव नीलजलधरोदरे स्फुरन्तीं प्रभया पिबन्तीमिव त्रियामाम्, तामरसहस्ताम्, कोमलाङ्गु- लिरागराजिजालकानि च चरणलभानि वेलाबालविद्रुमलतावनानीवा- कर्षन्तीम्, करपङ्कजसंकोचाशङ्कया शशाङ्कमण्डलमिव खण्डशः कृतं निर्मलचरणनखनिवहनिभेन बिभ्रतीम्, गुल्फावलम्बिनूपुरपुटतया स्थि- तनिबिडकटकावलिबन्धनादिव परिभ्रश्यागताम् बहुविधकुसुमशकुनिश- तशोभितात्पवनचलिततनूतरङ्गादतिस्वच्छादंशुकादुदधिसलिलादिवोत्तर- न्तीम्, उदधिजन्मप्रेम्णा त्रिवलिच्छलेन त्रिपथगयेव परिष्वक्तमध्याम्, अत्युन्नतस्तनमण्डलाम्, दृश्यमानदिङ्नागकुम्भामिव ककुभम्, मदल- ग्नैररावतकरशीकरनिकरमिव शरत्तारागणतारं हारमुरसा दधानाम्, धव- लचामरैरिव च मन्दमन्दनिःश्वासदोलायितैर्हारकिरणैरुपवीज्यमानाम्, स्वभावलोहितेन मदान्धगन्धेभकुम्भास्फालनसंक्रान्तसिन्दूरेणेव करद्वयेन द्योतमानाम्, हरशिखण्डेन्दुद्वितीयखण्डेनेव कुण्डलीकृतेन ज्योत्स्नामुचा अथेत्यादौ । अट्टहासस्य मध्ये स्फुरन्तीं स्त्रियमपश्यदिति सम्बन्धः । तामरसं पद्मम् । बहुविधेति । प्रकृते कुसुमानि शकुनयश्च सूत्रमयानि । तरङ्गा मुष्टिदानक्षता भङ्गयः, वीचयश्च । अतिस्वच्छत्वमंशुकस्योदधिसलिलेन । उत्तरन्तीमिति । अंशुका- एक स्त्री को देखा जो हाथ में रखे हुए अट्टहास नामक तलवार के बीच में इस प्रकार चमक रही थी जैसे नीले मेघ के बीच में बिजली चमकती है । शरीर की कांति से रात को पीती जा रही थी । उसके हाथ कमल के समान थे । उसके चरणों की अँगुग्रियों में राग की जाली इस प्रकार लग रही थी मानो समुद्रतट के छोटे विद्रुम लताओं के वनों को खींचती चली आ रही हो । हाथरूपी कमल के मुकुलित हो जाने की शङ्का से मानों उसने चन्द्रमा के टुकड़े टुकड़े करके अपने चरणके निर्मल नखों के रूप में धारण कर लिया हो । ठिगनी तक लटके हुए नूपुर से ऐसा लगता था कि वह सैनिकों के बीच जेल के घेरे से भाग निकल आई हो । उसके वस्त्र पर अनेक प्रकार के फूल और पक्षी कढ़े हुए थे, वह हवा से फहर रहा था, और अति स्वच्छ था, मानों वह समुद्र से निकली हो । समुद्र से जन्म लेने के प्रेम के कारण मानों त्रिवलि के बहाने त्रिपथगा गङ्गा ने उसे अँकवार लिया था । उसके स्तन ऊँचे-ऊँचे थे, वह दिशा के समान प्रतीत हो रही थी, जिसके बीच दिग्गज के कुम्भस्थल दिखाई पड़ते थे । शरत्काल के तारों के समान झलकते हुए हार को वह अपने वक्ष पर धारण कर रही थी मानों मतवाले ऐरावत की सूँड़ के फुहारे उड़कर लग गए हों । सफेद चँवर के समान उसकी मन्द-मन्द साँस से हिलती हुई हार
दन्तपत्रेण विभ्राजमानाम्, कौस्तुभभमस्तिस्तबकेनेव च श्रवणलग्ने- नाशोककिसलयेनालंकृताम्, महता मत्तमातङ्गमदमयेन तिलकेनादृश्य- च्छत्रच्छायामण्डलेनेवाविरहितललाटाम्, आपादतलीदासीमन्ताञ्च च- न्द्रातपधवलेन चन्दनेनादिराजयशसेव धवलीकृताम्, धरणीतलचुम्बि- नीभिः कण्ठकुसुममालाभिः सरिद्भिरिव सागराधिष्ठात्रीभिरधिष्ठिताम्, मृणालकोमलैरवयवैः कमलसंभवत्वमनक्षरमाचक्षाणां श्रियमपश्यत् । असम्भ्रान्तश्च पप्रच्छ—'भद्रे ! कासि, किमर्थं वा दर्शनपथमागतासि ?' इति । सा तु स्त्रीजनविरुद्धेनावष्टम्भेनाभिभवन्तीवाभाषत तम्—'वीर ! विद्धि मां नारायणोरःस्थलीलीलाविहारहरिणीम्, पृथुभरतभगीरथादि- राजवंशपताकाम्, सुभटभुजजयस्तम्भविलासशालभञ्जिकां, रणरु- धिरतरङ्गिणीतरङ्गक्रीडादोहददुर्ललितराजहंसीम्, सितनृपच्छत्रषण्डशि-
च्छादितयोदञ्चन्त्या उत्तरणमिवांशुकाङ्कञ्चयत इति । वर्ण्याभिप्रायेण त्रिपथेगेति नाम । मदे दाने लग्नः सक्तः । समद इत्यर्थः । श्रीर्हस्तिपृष्ठेन यातीति मदान्धेत्या- द्युक्तम् । हस्तिवाहित्वाल्लक्ष्म्या एवमुक्तम् । धरणीतलचुम्बिनीभिर्मालाभिः, सरि- द्भिश्च । हरिणीमिति । हरिणी किल स्थाल्या लीलया विहरति । वंशोऽन्वयेऽथ वंशे वेणौ पताकोत्क्षिप्यते । सुभटेत्यादिविशेषणेन वीरातुरागित्वमस्या दर्शितम् । स्तम्भे च शालभञ्जिकोत्कीर्णपुत्रिका क्रियते । षण्डो वनम्, तत्र शिखण्डिनी मयूरी ।
का किरणें उस पर डोल रही थीं । उसके हाथों में स्वाभाविक लालिमा थी लेकिन ऐसा लगता था कि वह मतवाले गजराज के मस्तक पर रहने वाले चन्द्र का दूसरा टुकड़ा हो । कान में अशोक का किसलय कौस्तुभमणि की किरणों के गुच्छे की भाँति लग रहा था । हाथी के मद का तिलक उसके ललाट पर तिरोहित छत्र की छाया के समान प्रतीत हो रहा था । पैर से ललाट तक चाँदनी के समान उज्ज्वल चन्दन से चर्चित होकर आदिराज मनु के यश के समान धवल हो रही थी । फूल की मालाएँ उसके कण्ठ से जमीन तक लटक रही थीं, मानों वह समुद्र पर्यन्त जाने वाली नदियों से युक्त हो । मृणाल के समान कोमल अपने अङ्गों से बिना शब्द के अपने को कमल से उत्पन्न बता रही थी । उसके विषय में स्थिर होकर राजा ने पूछा—'भद्रे, तुम कौन हो, क्यों सामने आई हो ?' वह स्त्री-जाति के विरुद्ध गर्व से अभिभूत करती हुई सी बोली—'वीर, तू मुझे नारायण के वक्षःस्थल में हरिणी के रूप में लीलानिहार करने वाली लक्ष्मी समझ । मैं पृथु, भरत, भगीरथ, मनु आदि के वंशों की पताका हूँ । योद्धाओं की भुजाओं के जयस्तम्भ में विलसित होने वाली शालभञ्जिका ( पत्थर की उत्कीर्ण मूर्ति) हूँ । युद्ध में बहती हुई रक्त की नदियों की तरङ्गों में क्रीडा का सुख अनुभव करने वाली मैं राजहंसी हूँ । राजाओं
१६० हर्षचरितम् खण्डिनीम् , अतिनिशितशस्त्रधारावनभ्रमणविभ्रमसिंहीम् , असिधारा- जलकमलिनीं श्रियम् । अपहृतास्मि तवामुना शौर्यरसेन । याचस्व । ददामि ते वरमभिलषितम्' इति । वीराणां त्वपुनरुक्ताः परोपकाराः । यतो राजा तां प्रणम्य स्वार्थवि- मुखो भैरवाचार्यस्य सिद्धिं ययाचे । लक्ष्मीस्तु देवी प्रीततरहृदया विस्ती- र्यमाणेन चक्षुषा क्षीरोदेनेवोपरि पर्यस्तेनाभिषिञ्चन्ती भूपालम् 'एवमस्तु' इत्यब्रवीत् । अवादीच्च पुनः—'अनेन सत्त्वोत्कर्षेण भगवच्छिवभट्टारक- भक्त्या चासाधारणया भवान्भुवि सूर्याचन्द्रमसोस्तृतीय इवाविच्छिन्नस्य प्रतिदिनमुपचीयमानवृद्धेः शुचिसुभगमान्यसत्यत्यागशौर्यशौण्डपुरुषप्रका- ण्डप्रायस्य महतो राजवंशस्य कर्ता भविष्यति । यस्मिन्नुत्पत्स्यते सर्व- द्वीपानां भोक्ता हरिश्चन्द्र इव हर्षनामा चक्रवर्ती त्रिभुवनविजिगीषुर्द्वितीयो मान्धातेव यस्यायं करः स्वयमेव कमलमपहाय ग्रहीष्यति चामरम्' इति वचसोऽन्ते तिरोबभूव । अपुनरुक्ता भूयो भूयः क्रियमाणापि चेत्यर्थः । परोपकारकरणपरत्वेन प्रीतत्वम्। अभिषिञ्चन्तीति । अभिषेको राज्ञ उचितः । शौण्डः प्रसक्तः । प्रकाण्डशब्दः प्रशंसा- वाची । द्वितीयः स्पर्द्धावान् । के उज्ज्वल आतपत्रों में मढ़ी जाने वाली मैं मोरनी हूं। शस्त्रों की तेज धारा के वनों में विहरण करने वाली सिंहिनी हूँ। तलवारों के धाराजल में खिलने वाली मैं कमलिनी हूँ। तेरे इस पराक्रम को देखकर खिंच आई हूँ। माँग, तुझे अभिलषित वर दूँगी।' वीर परोपकार की प्रतिज्ञा करके कभी नहीं मुकरते। स्वार्थ से विमुख होकर राजा ने प्रणाम करके भैरवाचार्य की सिद्धि के लिए वर माँगा। लक्ष्मी प्रसन्न होकर एकटक उसे देखने लगी और मानों दूध से अभिषेक करती हुई राजा से बोली—'यही हो।' और फिर कहा—'राजन्, अपने बल के इस उत्कर्ष से और भगवान् शिव भट्टारक की असाधारण भक्ति से तेरा महान् राजवंश होगा जो सूर्य और चन्द्रमा के बाद तीसरा स्थान प्राप्त करेगा। अविच्छिन्न चलता हुआ प्रतिदिन बढ़ता ही जायगा और उस वंश में प्रायः पवित्र, सुभग, मान्य, सत्य, त्याग और वीरता में समर्थ पुरुष होंगे। उसी वंश में हरिश्चन्द्र के समान समस्त द्वीपों पर राज्य करने वाला चक्रवर्ती हर्ष उत्पन्न होगा जो दूसरे मान्धाता के समान त्रिभुवन को जीत लेने की इच्छा रखने वाला होगा। स्वयं मेरा यह हाथ कमल को छोड़कर उसका चँवर उठाएगा।' यह कहकर लक्ष्मी अन्तर्हित हो गई।
तृतीय उच्छ्वासः १६१
भूमिपालस्तु तदाकर्ण्य हृदयेनातिमात्रमप्रीयत । भैरवाचार्योऽपि तस्या देव्यास्तेन वचसा कर्मणा च सम्यगुपपादितेन सद्य एव कुन्तली किरीटी कुण्डली हारी केयूरी मेखली मुद्री खड्गी च भूत्वावाप विद्या- धरत्वम् । प्रोवाच च—'राजन् ! अदूरव्यापिनः फल्गुचेतसामलसानां मनोरथाः । सतां तु भुवि विस्तारवत्यः स्वभावेनैवोपकृतयः । स्वप्नेऽप्य- संभावितां दातुमिमां दक्षिणां क्षमः कोऽन्यो भवन्तमपहाय । संपत्कणि- कामपि प्राप्य तुलेव लघुप्रकृतिरुन्नतिमायाति । त्वदीयैर्गुणैरुपकरणीकृ- तस्य त्वत्त एव च लब्धात्मलाभस्य निर्लज्जतेयमस्य मूढहृदयस्य । तदि- च्छामि येन केनचित्कार्यलवोपपादनोपयोगेन स्मारयितुमात्मानम्' इति । प्रत्युपकारदुष्प्रवेशास्तु भवन्ति धीराणां हृदयावष्टम्भाः । यतस्तं राजा 'भवत्सिद्ध्यैव परिसमाप्तकृत्योऽस्मि । साधयतु मान्यो यथासमीहितं स्थानम्' इति प्रत्याचचक्षे । तथोक्तश्च भूभुजा जिगमिषुः सुदृढं समालिङ्ग्य टीटिभादीन् कुवल- यवनेनेवावश्यायशीकरस्राविणा सास्रेण चक्षुषा वीक्षमाणः क्षितिपतिं
कुण्डलं कर्णवेष्टनम् । हारो मुक्ताहारः । केयूरमङ्गदं दोर्भूषा । फल्गुसारम् । प्रत्याचचक्षे पर्यहार्षीत् ।
यह सुनकर राजा हृदय में अत्यन्त प्रसन्न हुआ । लक्ष्मी के उस वचन से और अपने भलो भाँति किए कर्म से भैरवाचार्य भी शीघ्र सुन्दर बाल, मुकुट, कुण्डल, हार, केयूर, करधनी, मुद्गर, दण्ड और खड्ग धारण करके विद्याधर-योनि को प्राप्त हुआ । भैरवाचार्य ने राजा से कहा—'राजन्, सारहीन चित्त वाले मन्द लोगों के मनोरथ दूर तक नहीं होते, लेकिन सज्जनों के उपकार पृथिवी में फैले हुए होते हैं । जिसकी सम्भावना स्वप्न में भी नहीं की जा सकती ऐसी दक्षिणा आपके अतिरिक्त कौन दे सकता था ? सम्पत्ति के कण को पाकर तराजू के समान छोटी प्रकृति वाले लोग ऊपर उठ जाते हैं । आपके ही गुणों को उपकरण बनाकर आपसे ही जो मैं लाभवान् बना उससे ही मूढहृदय होकर निर्लज्ज बन गया हूँ । इसलिए अपने आपको स्मरण रखने के लिए थोड़ा भी कार्य करना चाहता हूँ ।' धीर पुरुषों के हृदय की गम्भीरता में प्रत्युपकार का प्रवेश करना कठिन होता है । जैसा कि राजा ने उत्तर दिया—'आपकी सिद्धि हो जाने में ही मैं कृतकृत्य हो गया । अब आप अपने अभिलषित स्थान में जाँय ।' इस प्रकार राजा के कहने पर भैरवाचार्य जाने के लिए तैयार हो गया । टीटिभ आदि का आलिङ्गन करके ओस टपकाते हुए कुवलयवन के समान आँसू से भरी आँखों
१६२ हर्षचरितम् पुनरुवाच—'तात ! ब्रवीमि यामीति न स्नेहसदृशम् । त्वदीयाः प्राणा इति पुनरुक्तम् । गृह्यतामिदं शरीरकमिति व्यतिरेकेणार्थकरणम् । तिलशः क्रीता वयमिति नोपकारानुरूपम् । बान्धवोऽसीति दूरीकरणमिव । त्वयि स्थितं हृदयमित्यप्रत्यक्षम् । त्वद्विरहानुकारिणी कारणेयं न सिद्धिरित्य- श्रद्धेयम् । निष्कारणस्तवोपकार इत्यनुवादः । स्मर्त्तव्या वयमित्याज्ञा । सर्वथा कृतघ्नालापेष्वसज्जनकथासु च चेतसि कर्तव्योऽयं स्वार्थनिष्ठुरो जनः' इत्यभिधाय वेगच्छिन्नहारोच्छलितमुक्ताफलनिकरताडिततारागणं गगनतलमुत्पपात । ययौ च सीमन्तितग्रहग्रामः सिद्धयुचितं धाम । श्री- कण्ठोऽपि—'राजन् ! पराक्रमक्रीतः कर्तव्येषु नियोगेनानुग्राह्यो ग्राहित- विनयोऽयं जनः' इत्यभिधाय राजानुमोदितस्तदेव भूयो भूविवरं विवेश । यामीत्यादिवक्रोक्त्या चेतः स्थितं सर्वं व्याहरति--न स्नेहसदृशमिति । स्नेहानु- रूपनिषेधेन स्नेह इव सुतरामाविष्कृत एव । उक्तं हि—'प्रतिषेध इवेष्टस्य यद्विशे- षाभिधित्सया । आक्षेप इति तं सन्तः शंसन्ति कवयः सदा ॥' इति । एवं त्वदीयाः प्राणा इत्यादौ । व्यतिरेकः पृथग्भागः । आवां किलाैक एवार्थः । तिलश इति । यावा- न्किलायमुपकारो बहुगुणस्तावन्तो नावयवास्तिलशो विभागेनास्माकम् । कारणा यातना । सीमन्तितो द्विधाकृतः । ग्रामः समूहः । से देखता हुआ राजा से फिर बोला—'तात, अगर कहूं कि जाता हू तो यह स्नेह के सदृश बात नहीं है। 'ये प्राण तुम्हारे हैं' इसमें पुनरुक्ति है। 'इस तुच्छ शरीर को स्वीकार करो' यह तो भिन्नता की बात हो जाती है। 'हमें तुमने तिल-तिल खरीद लिया' यह बात उपकार के अनुरूप नहीं, 'तुम हमारे बान्धव हो' यह तो और भी दूर कर देता है। 'यह हृदय तुम्हीं में है' इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं । 'तुम्हारा विरह कर देने वाली हमारी यह सिद्धि यातना ही हो गई' यह बात श्रद्धा के योग्य नहीं। 'तुमने बिना किसी कारण के मेरा उपकार किया' यह तो वही बात हुई। 'हमें याद रखना' यह आज्ञा हो जाती है। जब कृतघ्नों की चर्चा होगी और असज्जनों की कथा का प्रसङ्ग उपस्थित होगा तब स्वार्थ से निष्ठुर इस जन को अवश्य ध्यान में लाना।' यह कहकर भैरवाचार्य जोर से आकाश की ओर उड़ा । उसके हार के मोती टूटकर तारों में आघात करने लगे । तारों के समूह को दो भागों में बाँटता हुआ वह अपनी सिद्धि के उचित स्थान में चला गया। श्रीकण्ठ नाग ने कहा—'राजन्, पराक्रम से वश में करके नम्र किए गए इस जन को समय समय पर कार्यों में नियुक्त करके अनुगृहीत करेंगे।' यह कहकर और राजा का अनुमोदन प्राप्त करके उसने उसी विवर में प्रवेश किया ।
तृतीय उच्छ्वासः १६३ नरपतिस्तु क्षोणभूयिष्ठायां क्षपायां, प्रवातुमारब्धे प्रबुध्यमानकमलि- नीनिःश्वाससुरभौ, वनदेवताकुचांशुकापहरणपरिहासस्वेदिनीव साव- श्यायशीकरे परिमलाककृष्टमधुकृति कुमुदनिद्रावाहिनि निशापरिणतिजडे तुषारलेशिनी वनानिले, विरहविधुरचक्रवाकचक्रनिःश्वसितसंतापिताया- मिवापरजलनिधिमवतरन्त्यां त्रियामायां, साक्षादागतलक्ष्मीविलोकनकु- तूहलिनीष्विव समुन्मीलन्तीषु नलिनीषु, उन्निद्रपक्षिणि क्षरति कुसुमवि- सरमिव तुहिनकणनिकरं मृदुपवनलासितलते कानने, कमललक्ष्मीप्रबो- धमङ्गलशङ्खेष्विव ॰ रसत्स्वन्तर्बद्धध्वनमधुकरेषु मुकुलायमानेषु कुमुदेषु, उज्जिहानरविरथवाजिविसृष्टैः प्रोथपटुपवनैः प्रोत्सार्यमाणास्विव वारुण्यां ककुभि पुञ्जीभवन्तीषु श्यामालताकलिकासु तारकासु, मन्दरशिखराश्र- यिणि मन्दानिललुलितकल्पलतावनकुसुमधूलिविच्छुरित इव धूसरीभवति सप्तर्षिमण्डले, सुरवारणाङ्कुश इव च्युते गलति तारामये मृगे त्रीनपि टीटिभादीन्गृहीत्वा नागयुद्धव्यतिकरमलीमसानि शुचिनि वनवापीपयसि
वनेश्यादौ। अस्मिन्नस्मिन्सति नरपतिर्नगरं विवेशेति सम्बन्धः। क्षीणभूयिष्ठायां बहुतरं क्षीणायाम्। तुषारस्य शीतस्य लेशाः सन्ति तत्र तस्मिन्नीषच्छीतले। संतापितायामिवेति। संतापितश्च शीतलंस्थानमवतरन्ति। कुसुमविसरमिवेति समो- पमा। लासिता नर्तिता। उज्जिहान उद्गच्छन्। श्यामा रात्रिः, सैव लता व्रततिः।
अब तक रात बहुत ढल चुकी थी। जागती हुई कमलिनों के निश्वास की सुगन्ध से भरी हुई, वनदेवता के स्तन के वस्त्र को उड़ा लेने के परिहास में तर बतर हुई सी और तुषार के फुहारों से युक्त, सुगन्ध से भौरों को खींचती हुई और कुमुदों को सुलाती हुई, रात्रि के अवसान में ठण्डी वन की हवा बहने लगी। विरह से पीड़ित चक्रवाकों के निःश्वास से सन्ताप का अनुभव करती हुई रात पश्चिम समुद्र में उतरने लगी। मानों साक्षात् आई हुई लक्ष्मी को देखने के कुतूहल से कमलिनियाँ आँखें खोलने लगीं। जंगल के पक्षी जग पड़े। फूल के रूप में ओस पड़ रही थी। हल्की हवा से लताएँ नृत्य करने लगीं। कमल में निवास करने वाली लक्ष्मी के जागरण के लिए मंगल शंख के समान भीतर में बँधे हुए भौरे गुंजार रहे थे। कुमुद बन्द होने लगे। श्यामा लता की कली के समान तारे ऊपर आते हुए सूर्य के रथ के घोड़ों की थुथुन की तेज हवा से उड़ाये गए की तरह पश्चिम दिशा में पुंजीभूत होने लगे। मन्दराचल के शिखर पर पहुँचा हुआ सप्तर्षिमण्डल मन्द हवा से काँपती हुई कल्पलता के फूलों की धूल से धूसरित होने लगा। ऐरावत के अंकुश के समान मृगशिरा नक्षत्र नीचे चला गया। तब राजा ने १३ ह० च०
. १६४ हर्षचरितम् प्रक्षाल्याङ्गानि नगरं विवेश । अन्यस्मिन्नहनि तेषामात्मशरीरानन्तरं स्नानभोजनाच्छादनादिना प्रीतिमकरोत् । कतिपयदिबसापगमे च परिव्राड् भूभुजा वार्यमाणोऽपि वनं ययौ । पातालस्वामिकर्णतालौ तु शौर्यानुरक्तौ तमेव सिषेवाते । संपादितमनो- रथातिरिक्तविभवौ च सुभटमण्डलमष्ये निष्कृष्टमण्डलाग्रौ समरमुखेषु प्रथममुपयुज्यमानौ कथान्तरेषु चान्तरान्तरा समादिष्टौ विचित्राणि भैरवाचार्यचरितानि शैशववृत्तान्तांश्च कथयन्तौ तेनैव सार्धं जरामा- जग्मतुरिति । इति महाकविश्रीबाणभट्टकृते हर्षचरिते राजदर्शनं नाम तृतीय उच्छ्वासः । प्रियङ्गुलतिका मकरिका। तारामयो मृगशीर्षस्त्रितारोऽङ्कुशाकारः । आत्मशरीरानन्तरं स्नानेति । आत्मशरीरमनन्तरं यस्य तादृशेन स्नानभोजनाच्छादिना । तेषु कृत्वा पश्चादात्मनः करोतीत्यर्थः । शौर्यानुरक्ताविति न भोगलोलुभौ । अतिरिक्तोऽधिकः । मण्डलाग्रः खङ्गः । अन्तरान्तरा मध्ये मध्ये । कथयन्ताविति स्थिरप्रीतिसिद्धये ॥ इति श्रीशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेते तृतीय उच्छ्वासः । टीटिभ आदि तीनों को साथ लेकर नाग से युद्ध करने के कारण मलिन अङ्गों को वन की बावली के पवित्र जल में साफ कर नगर में प्रवेश किया । दूसरे दिन अपने से पहले उन्हें स्नान, भोजन और वस्त्र आदि से प्रसन्न किया । कुछ दिनों के बाद राजा के रोकने पर भी परिव्राजक टीटिभ वन में चला गया । उसकी वीरता में अनुराग करने वाले पातालस्वामी और कर्णताल दोनों राजा के पास ही रह गए । राजा ने उन दोनों के लिए इच्छा से ज्यादा धन दिया । सुभट मण्डल के बीच में उत्कृष्ट खड्ग धारण करने वाले और सेना के प्रधान नियुक्त हो गए। बातचीत के अवसर पर बीच बीच में राजा के पूछने पर भैरवाचार्य के विचित्र कार्य और बाल्यकाल के वृत्तान्त कहते रहते थे । क्रम से राजा के साथ वे दोनों भी बूढ़े हो गए । हर्षचरित तृतीय उच्छ्वास समाप्त ।
चतुर्थ उच्छ्वासः योगं स्वप्नेऽपि नेच्छन्ति कुर्वते न करग्रहम्। महान्तो नाममात्रेण भवन्ति पतयो भुवः ॥ १ ॥ सकलमहीभृत्कम्पकृदुत्पद्यत एक एव नृपवंशे । विपुलेऽपि पृथुप्रतिमो दन्त इव गणाधिपस्य मुखे ॥ २ ॥ अथ तस्मात्पुष्यभूतेर्द्विजवरस्वेच्छागृहीतकोषो नाभिद्म इव पुण्ड- रीकेक्षणात्, लक्ष्मीपुरःसरो रत्नसंचय इव रत्नाकरात्, गुरुबुधकविक- योगमित्यादिना प्रसिद्धाप्रस्तुतवैलक्षण्यमुच्यते । भूपतीनां योगो युक्तिः । गूढप्रत्याहाररसादनादिच्छेत्यर्थः, संबन्धश्च । करग्रहो दण्डग्रहणम्, विवाहश्च । नाममात्रेणेति । नामैव तेषां श्रुत्वा भुवनं कम्पत इत्यर्थः । अर्थशून्येन सकलेनेत्या- दिना भाविनी हर्षोत्पत्तिः सूचिता ॥ १ ॥ महीभृद्भिरपि कम्पो वेपथुः, चलनं च । पृथुरादिराजः विस्तीर्णश्च । प्रतिमा सादृश्यम्, दन्तकोशश्च । दन्त इवेति । दन्तोऽप्यंको गणाधिपस्य मुखे, समूहाधि- पत्यप्रदाने च ॥ २ ॥ अथेत्यादौ । राजवंशो निर्जगामेति संबन्धः । द्विजवरा विप्रोत्तमाः । ब्रह्मा च द्विजोत्तमः । कोशो गञ्जः, कर्णिका च । पुण्डरीकेक्षणः कमलोचनः, विष्णुश्च । लक्ष्मीः पुरःसरा यस्य लक्ष्मीपुरःसरः । ‘जातौ जातौ यदुत्कृष्टं तद्रत्नमभिधीयते’ । मणयश्च रत्नानि । गुरव उपदेष्टारः । बुधाः पण्डिताः । कवयः काव्यकृतः । कला- महान् लोग स्वप्न में भो योग अर्थात् शत्रु से छल-कपट की युक्ति नहीं सोचते और कर अर्थात् दण्ड भी नहीं देते । इस प्रकार वे नाममात्र ही पृथ्वी के पति हो जाते हैं । ( पति होकर स्वप्न में भो योग अर्थात् मिलन नहीं चाहते और करग्रहण अर्थात् विवाह नहीं करते । इस प्रकार केवल नाम से पति बन जाते हैं ) ॥ १ ॥ बहुत बड़े राजवंश में पृथु सदृश एक ही कोई उत्पन्न हो जाता है जो समस्त राजाओं को भय से कम्पित कर देता है। जैसे गणेशजी का एक ही विशाल दाँत सारे पर्वतों को उखाड़ फेंकता है ॥ २ ॥ जैसे विष्णु से ब्रह्मा जी द्वारा स्वेच्छा से अधिष्ठित मध्य भाग वाला नाभि-कमल ( ब्राह्मणश्रेष्ठों द्वारा अपनी इच्छा के अनुसार ग्रहण की गई धन-सम्पत्ति वाला राजवंश ) निकला। जैसे समुद्र से लक्ष्मी को आगे करके रत्नसमूह ( लक्ष्मी से युक्त राजवंश ) निकला। जैसे उदयाचल से गुरु ( बृहस्पति ), बुध, कवि ( शुक्र ), कलाभृत् ( चन्द्र
१६६ हर्षचरितम् लाभृत्तेजस्विभूनन्दनप्रायो ग्रहगण इवोदयस्थानात् महाभारवाहनयोग्यः सागर इव सगरप्रभावात्, दुर्जयबलसनाथो हरिवंश इव शूराभ्र्जेगाम राजवंशः । यस्मादविनष्टधर्मधवलाः प्रजासर्गा इव कृतमुखात्, प्रतापा- क्रान्तभुवनाः किरणा इव तेजोनिधेः, विग्रहव्याप्तदिश्रुखा गिरय इव भूसृत्प्रवरात्, धरणिधारणक्षमा दिग्गजा इव ब्रह्मकरात्, उदधीन्पातुमु- द्यता जलधरा इव घनागमात्, इच्छाफलदायिनः कल्पतरव इव नन्द- नात्, सर्वभूताश्रया विश्वरूपप्रकारा इव श्रीधरादजायन्त राजानः । वन्तो गीतादिज्ञाः । तेजस्विनः शूराः । भूनन्दना राजानः; इतरत्र,-गुरुर्बृहस्पतिः । उदयः प्रभावोऽपि । महाभारो भूपालनरूपो विजयरूपो वा तस्य निर्वहणे योग्यः । सगरवत्प्रभावो यस्य तस्माद्राज्ञः, सगराणां च यः प्रभावस्तस्मात् । 'प्रभवात्' इति पाठे सगरवत्प्रकृष्टो भव उत्पत्तिर्यस्य तस्मात्; अन्यत्र,-सगरस्य यः प्रभवस्तस्मा- दिति व्याख्या । दुर्जयो दुरभिभवः । बलं प्राणाः सैन्यं वा तेन युक्तः । ततः कर्म- धारयः; अन्यत्र,-दुर्जयोऽजितो विष्णुः, बलो हलधरः, ताभ्यां सनाथा । शूराद्वि- क्रान्तात्, शूरश्च यदूनां राजा तस्मात् । अविनष्टेन पूर्णेन । धवलाः शुक्लाः । अवि- नष्टधर्मान्धवांश्चाम्तितीति वा । कृतमुखात्संसकृतात्, कृतयुगादेश्च । प्रताप आतपः, रिपुभयजननी वार्ता च । विग्रहो विरोधः, देहश्च । भूभृतां राज्ञाम्, भूधराणां च । धारणं पालनम्, उद्वहनं च । ब्रह्म करोतीति ब्रह्माकरस्तस्मात् । सामानि गायतो ब्रह्मणः करात्करिण उत्पन्ना इति वार्ता । पातुं रक्षितुम्, ग्रासीकर्तुं च । घन आगम उपदेशो यस्य, घनागमश्च वर्षाकालः । नन्दयतीति नन्दनः, देवोद्यानं च । सर्वेषां भूतानां प्राणिनामाश्नया आश्रयणीयाः, सर्वस्य वा भूतस्याश्रयाः, सर्वेषां वा भूताः पारमार्थिका अत एवाश्रयणीयाः । श्रीधरो हरिरपि । तेजस्वी (सूर्य), भूनन्दन (मंगल) आदि ग्रहों का समुदाय निकला (उपदेश देने वाले गुरु, विद्वान्, कवि, कलावन्त, शूर और पृथिवी को आनन्दित करने वाले राजाओं आदि से युक्त राजवंश) निकला । जैसे राजा सगर के प्रभाव से भारवान् वस्तुओं का वहन करने वाला सागर (पृथिवी के पालनरूप महान् भार का वहन करने वाला राजवंश) निकला । जैसे शूर नामक यदुराज से दुर्जय अर्थात् विष्णु और बल अर्थात् बलराम से युक्त हरिवंश (अजेय सैन्य-बल वाला राजवंश) निकला । वैसे ही पुष्पभूति से एक राजवंश^१ चला । विनष्ट न होने वाले धर्म द्वारा उज्ज्वल प्रजा के निर्माण जैसे सतयुग से हुए, अपने प्रताप से सारे संसार को आक्रान्त करने वाली किरणें जैसे सूर्य से हुईं, अपने विस्तार में सारी दिशाओं में फैलने वाले पर्वत जैसे प्रधान पर्वत से हुए, पृथिवी के धारण १. राजवंश के पक्ष मे घटित होनेवाले श्लिष्ट शब्दों के अर्थ कोष्ठक में दिए गए हैं।
चतुर्थ उच्छ्वासः १६७ तेषु चैवमुत्पद्यमानेषु क्रमेणोदपादि हूणहरिणकेसरी सिन्धुराज- ज्वरो गूर्जरप्रजागरो गान्धाराधिपगन्धद्विपकूटपाकलो लाटपाटवपाटच्चरो मालवलक्ष्मीलतापरशुः प्रतापशील इति प्रथितापरनामा प्रभाकरवर्धनो नाम राजाधिराजः । यो राज्याङ्गसङ्गीन्यभिषिच्यमान एव मलानीव मुमोच धनानि । यः परकीयेनापि कातरवल्लभेन रणमुखे तृणेनेव धृते- नालज्जत जीवितेन । यः करधृतधौतासिप्रतिबिम्बितेनात्मनाप्यदूयत समितिषु सहायेन रिपूणां पुरः प्रधनेषु धनुषापि नमता यो मानी मानसेना- खिद्यत । यश्चान्तर्गतापरिमितरिपुशस्त्रशल्यशङ्कुकीलितामिव निश्चलामुवाह हूणादयो जनपदभेदाः । प्रजागरो निद्राक्षयः । 'स्वेदं मूत्रं पुरीषं च मज्जा चैवं मतङ्गजाः। यस्याघ्राय विभाघ्नन्ति तं विद्याद्गन्धहस्तिनम् ॥' कूटपाकलो हस्तिज्वरः । यतो हूणाद्युन्मूलकोऽत एव प्रथितापरनामा राजा । राज्याङ्गान्यमात्याद्याः । अभि- षिच्यमानो राज्ये प्रतिष्ठाप्यमानो यस्याभितः सिच्यते सोऽङ्गसङ्गीनि मलानि मुञ्चति । कातरैति । तृणं कातरैर्मुखे ध्रियते । तृणेनेति सहोपमा मुखे तृणधारणम- नौचित्यमेव पोषयति । धौतपदेन बिम्बस्वीकारसामर्थ्यमुक्तम् । समिदिन्धनं संग्रा- मञ्च । निश्चलाम्रनपायिनीम् । समीकृतास्तटावटा यैर्विटपाटवीयुक्तैस्तरुभिस्तथा करने मे समर्थ दिग्गज जैसे ब्रह्माजी के हाथ से उत्पन्न हुए, समुद्रपान करने के लिये तत्पर मेघ जैसे वर्षाकाल से उत्पन्न हुए, इच्छानुसार फल देने वाले कल्पवृक्ष जैसे नंदनवन से उत्पन्न हुए, समस्त भूतों पर आश्रित रहने वाले संसार के दृश्यमान रूप जैसे विष्णु से उत्पन्न हुए उसी प्रकार उस राजवंश से अनेक राजा उत्पन्न हुए। इन राजाओं के उत्पन्न होने के क्रम में प्रभाकरवर्धन नाम का राजाधिराज हुआ। उसका दूसरा नाम प्रतापशील था। वह हूणरूपी हिरन के लिए सिंह, सिन्धुदेश के राजा के लिए ज्वर, गुर्जर को चैन से न सोने देने वाला अनिद्र रोग, गान्धारराज रूपी मस्त हाथी के लिए जलता हुआ बुखार, लाट देश की चालाकी का अन्त करने वाला, मालव देश की लक्ष्मीरूपी लता को काट डालने वाला कुठार था। उसने अभिषेक के अवसर में ही राज्य के अङ्गों में लगे हुए मल के समान धन-सम्पत्तियों को धो डाला। दुर्बलों के प्रिय अपने जीवन को निरन्तर परोपकार में लगे रहने पर भी रण-मुख में तृण की भाँति धारण किए समझ कर वह अपने आप में लज्जित होता था। युद्धों में वह अपने हाथ की तलवार में प्रतिबिम्बित अपने आपको भी अपना सहायक समझ कर मानसिक सन्ताप का अनुभव करता था। मानी वह युद्धों में नत होते हुए अपने धनुष को देखकर मन से खिन्न होता था। उसने शत्रुओं द्वारा बाणों की कील ठोंककर निश्चल बनाई गई
राजलक्ष्मीम् । यश्च सर्वासु दिक्षु समीकृततटावटविटपाटवीतरुतृणगुल्म- वल्मीकगिरिगहनैर्दण्डयात्रापथैः पृथुभिर्भृत्योपयोगाय व्यभजतेव वसुधां बहुधा । यं चालब्धयुद्धदोहदमात्मीयोऽपि सकलरिपुसमुत्सारकः परकीय इव तताप प्रतापः । यस्य च वह्निमयो हृदयेषु, जलमयो लोचनपुटेषु, मारुतमयो निःश्वसितेषु, क्षमामयोऽङ्गेषु आकाशमयः शून्यतायां पञ्चम- हाभूतमयो मूर्त इवादृश्यत निहतप्रतिसामन्तान्तःपुरेषु प्रतापः । यस्य चासन्नेषु भृत्यरत्नेषु प्रतिबिम्बितेव तुल्यरूपा समलक्ष्यत लक्ष्मीः । तथा च यस्त प्रतापाग्निना भूतिः, शौर्योष्मणा सिद्धिः, असिधाराजलेन वंश- वृद्धिः, शस्त्रव्रणमुखैः पुरुषकारोक्तिः, धनुर्गुणकिणेन करगृहीतिरभवत् । यश्च वैरमुपायनं विग्रहमनुग्रहं समरागमं महोत्सवं शत्रुं निधिदर्शनमरि- तृणादिभिश्च गहनैः । विटपाः शाखाः । अटवी समूहः । गुल्मा जालकानि । वल्मीकः पिपीलककृतो मृत्कूटः । दण्डश्चतुरङ्गबलम् । तस्य यात्रापथैर्गमनमार्गैः । सीमास्था- नीयैर्व्यभजत खण्डशो व्यलभत । भूशय्यादिवशेन पांसुभृतत्वात्काठिन्याच्च क्षमा- मयः शून्यतायां निश्चेष्टत्वे । आसन्नेष्विति । आसन्नानि प्रतिबिम्बं गृह्णन्ति, भूतिः सम्पत् , भस्म च । ऊष्मा चाङ्गदाहिका शक्तिः । सिद्धिः पाकोऽपि । वंशो वेणुरपि । व्रणानां मुखान्यग्राणि । गुणान्येव वा मुखान्याननानि । मुखैः किलोक्तिर्भवति । करगृहीतिर्दण्डग्रहणम् । किणश्च व्यायामहस्त एव भवति । अज्ञातः शत्रुध्वभिगमोऽ- राजलक्ष्मी को धारण किया । उसने सब दिशाओं में नदियों के किनारे, गड्ढे, वन, वृक्ष, तृण, झाड़ी, वल्मीक, पहाड़ आदि को समतल बनाकर भृत्यों के आने-जाने के लिए दूर तक विस्तृत सैन्यमार्ग बनवाकर पृथिवी को मानों कई भागों में विभक्त कर दिया । शत्रु को नष्ट करने वाला उसका अपना प्रताप भी युद्ध की इच्छा के न पूर्ण होने पर उसे ही परकीय के समान होकर जलाता था। हृदयों में अग्नि होकर जलन पैदा करता हुआ, आँखों में आँसू का जल बना हुआ, साँसों में हवा का रूप धारण किए, अङ्गों में धूल भरने के कारण पृथिवी के रूप में परिणत और शून्यता अर्थात् विरह या मूर्च्छा की अवस्था में आकाश बना हुआ, मारे गये शत्रु राजाओं के अन्तःपुरों में उसका प्रताप पाँच महाभूतों के रूप में दिखाई पड़ा। उसकी लक्ष्मी समीप में स्थित भृत्यरूपी रत्नों में समान रूप से प्रतिबिम्बित हुई सी लगती थी। उसके प्रताप की अग्नि से ऐश्वर्य हुआ, शौर्य की गरमी से सिद्धि हुई, तलवार के धाराजल से वंश की वृद्धि हुई, शस्त्रों के घाव से पौरुष समझा गया, धनुष के गुण की रगड़ के गट्टे से कर की वसूली हुई। वह शत्रु द्वारा किए गए विरोध को उपहार के रूप में स्वीकार करता, उसके साथ युद्ध को उसका ही अनुग्रह मानता, संग्राम में उपस्थित होने को महोत्सव समझता, शत्रु को देखकर उसे
चतुर्थ उच्छ्वासः १६६ बाहुल्यमभ्युदयमाह्वानं वरप्रदानमवस्कन्दपातं दिष्टवृद्धिं शस्त्रप्रहार- पतनं वसुधारारसममन्यत । यस्मिंश्च राजनि निरन्तरैर्यूपनिकरैरङ्कुरि- तमिव कृतयुगेन, दिङ्मुखविसर्पिभिरध्वरधूमैः पलायितमिव कलिना, ससुधैः सुरालयैरवतीर्णमिव स्वर्गेण, सुरालयशिखरोद्धूयमानैर्धवलध्वजैः पल्लवितमिव धर्मेण, बहिरुपरचितविकटसभासत्रप्रपाप्राग्वंशमण्डपैः प्रसू- तमिव ग्रामैः, काञ्चनमयसर्वोपकरणैर्विभवैर्विशीर्णमिव मेरुणा, द्विजदीय- मानैरर्थकलशैः फलितमिव भाग्यसंपदा । तस्य च जन्मान्तरेऽपि सती पार्वतीव शंकरस्य, गृहीतपरहृदया वस्कन्दः । दिष्टवृद्धिरानन्दवर्धनम् । धूमेनोत्प्रेक्षा कार्ष्ण्यात् । सुधा मक्कोलम् , अमृतं च । सभासदः । उक्तं च—‘समज्या परिषदङ्गोष्ठीसभासमितिसंसदः । आस्थानी क्लीबमास्थानं स्त्रीनपुंसकयोः सदः ॥’ सत्रं सदादानम् । ‘सत्रमाच्छादने यज्ञे सदा- दाने वनेऽपि च’ इत्युक्तम् । प्रपा यत्र तोयदानम् । प्राग्वंशः पत्नीशाला । उक्तं च ‘प्राग्वंशः प्राग्हविर्गेहात्’ इति । बहिरुपपादिता विकटाः सभासत्रप्रपाप्राग्वंश- रूपा यैस्तैः । तस्येत्यादौ । तस्य च महादेवी यशोमती नामाभूत्सा यस्य वक्षसि ललासेति सम्बन्धः । सती साध्वी, शोभना वा । जन्मान्तरे श्यामायाः संज्ञैषा । शंकरस्येत्या- खजाने देख लेने की प्रसन्नता होती, शत्रु के बाहुल्य को अपना अभ्युदय मानता, युद्ध के लिए गुहार को आशीर्वाद समझना, आकस्मिक आक्रमण को अपनी भाग्यवृद्धि मानता और शस्त्र के प्रहार से शत्रु के गिरने पर धन की वर्षा का आनन्द अनुभव करता। उस राजा के शासनकाल में निरन्तर यज्ञों में यूप (यज्ञ की विशेष लकड़ी) के गाड़े जाने पर मानों सतयुग अंकुरित हो गया था। दिशाओं में फैलते हुए यज्ञधूम से ऊबकर मानों कलि भाग पड़ा था। चूने से पुते हुए मन्दिरों से मानों स्वर्ग उतर आया था। देवमन्दिरों के शिखरों पर फहराती हुई उज्ज्वल पताकाओं से मानों धर्म पल्लवित हो गया था। नगर के बाहर बड़े-बड़े सभाभवन, दानगृह, पानशाला, होमगृह और मण्डप आदि से मानों गाँव के गाँव बस गए थे। सोने की बनी हुई सामग्री के भरे रहने से ऐसा लगता कि मेरु ही वहां ला दिया गया हो। ब्राह्मणों के लिये दान में समर्पित होने वाले धन से भरे कलशों से मानों सौभाग्य की सम्पत्ति फली-फूली नजर आती थी। यशोवती नाम की उस राजा की पटरानी थी। जन्मान्तर में मिली हुई पतिव्रता धर्मपत्नी वह भगवान् शंकर की पत्नी पार्वती के समान, विष्णु की दूसरों के हृदय में