भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 506 में से

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पृष्ठ 237

१६२ हर्षचरितम् पुनरुवाच—'तात ! ब्रवीमि यामीति न स्नेहसदृशम् । त्वदीयाः प्राणा इति पुनरुक्तम् । गृह्यतामिदं शरीरकमिति व्यतिरेकेणार्थकरणम् । तिलशः क्रीता वयमिति नोपकारानुरूपम् । बान्धवोऽसीति दूरीकरणमिव । त्वयि स्थितं हृदयमित्यप्रत्यक्षम् । त्वद्विरहानुकारिणी कारणेयं न सिद्धिरित्य- श्रद्धेयम् । निष्कारणस्तवोपकार इत्यनुवादः । स्मर्त्तव्या वयमित्याज्ञा । सर्वथा कृतघ्नालापेष्वसज्जनकथासु च चेतसि कर्तव्योऽयं स्वार्थनिष्ठुरो जनः' इत्यभिधाय वेगच्छिन्नहारोच्छलितमुक्ताफलनिकरताडिततारागणं गगनतलमुत्पपात । ययौ च सीमन्तितग्रहग्रामः सिद्धयुचितं धाम । श्री- कण्ठोऽपि—'राजन् ! पराक्रमक्रीतः कर्तव्येषु नियोगेनानुग्राह्यो ग्राहित- विनयोऽयं जनः' इत्यभिधाय राजानुमोदितस्तदेव भूयो भूविवरं विवेश । यामीत्यादिवक्रोक्त्या चेतः स्थितं सर्वं व्याहरति--न स्नेहसदृशमिति । स्नेहानु- रूपनिषेधेन स्नेह इव सुतरामाविष्कृत एव । उक्तं हि—'प्रतिषेध इवेष्टस्य यद्विशे- षाभिधित्सया । आक्षेप इति तं सन्तः शंसन्ति कवयः सदा ॥' इति । एवं त्वदीयाः प्राणा इत्यादौ । व्यतिरेकः पृथग्भागः । आवां किलाैक एवार्थः । तिलश इति । यावा- न्किलायमुपकारो बहुगुणस्तावन्तो नावयवास्तिलशो विभागेनास्माकम् । कारणा यातना । सीमन्तितो द्विधाकृतः । ग्रामः समूहः । से देखता हुआ राजा से फिर बोला—'तात, अगर कहूं कि जाता हू तो यह स्नेह के सदृश बात नहीं है। 'ये प्राण तुम्हारे हैं' इसमें पुनरुक्ति है। 'इस तुच्छ शरीर को स्वीकार करो' यह तो भिन्नता की बात हो जाती है। 'हमें तुमने तिल-तिल खरीद लिया' यह बात उपकार के अनुरूप नहीं, 'तुम हमारे बान्धव हो' यह तो और भी दूर कर देता है। 'यह हृदय तुम्हीं में है' इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं । 'तुम्हारा विरह कर देने वाली हमारी यह सिद्धि यातना ही हो गई' यह बात श्रद्धा के योग्य नहीं। 'तुमने बिना किसी कारण के मेरा उपकार किया' यह तो वही बात हुई। 'हमें याद रखना' यह आज्ञा हो जाती है। जब कृतघ्नों की चर्चा होगी और असज्जनों की कथा का प्रसङ्ग उपस्थित होगा तब स्वार्थ से निष्ठुर इस जन को अवश्य ध्यान में लाना।' यह कहकर भैरवाचार्य जोर से आकाश की ओर उड़ा । उसके हार के मोती टूटकर तारों में आघात करने लगे । तारों के समूह को दो भागों में बाँटता हुआ वह अपनी सिद्धि के उचित स्थान में चला गया। श्रीकण्ठ नाग ने कहा—'राजन्, पराक्रम से वश में करके नम्र किए गए इस जन को समय समय पर कार्यों में नियुक्त करके अनुगृहीत करेंगे।' यह कहकर और राजा का अनुमोदन प्राप्त करके उसने उसी विवर में प्रवेश किया ।

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