भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 236

तृतीय उच्छ्वासः १६१

भूमिपालस्तु तदाकर्ण्य हृदयेनातिमात्रमप्रीयत । भैरवाचार्योऽपि तस्या देव्यास्तेन वचसा कर्मणा च सम्यगुपपादितेन सद्य एव कुन्तली किरीटी कुण्डली हारी केयूरी मेखली मुद्री खड्गी च भूत्वावाप विद्या- धरत्वम् । प्रोवाच च—'राजन् ! अदूरव्यापिनः फल्गुचेतसामलसानां मनोरथाः । सतां तु भुवि विस्तारवत्यः स्वभावेनैवोपकृतयः । स्वप्नेऽप्य- संभावितां दातुमिमां दक्षिणां क्षमः कोऽन्यो भवन्तमपहाय । संपत्कणि- कामपि प्राप्य तुलेव लघुप्रकृतिरुन्नतिमायाति । त्वदीयैर्गुणैरुपकरणीकृ- तस्य त्वत्त एव च लब्धात्मलाभस्य निर्लज्जतेयमस्य मूढहृदयस्य । तदि- च्छामि येन केनचित्कार्यलवोपपादनोपयोगेन स्मारयितुमात्मानम्' इति । प्रत्युपकारदुष्प्रवेशास्तु भवन्ति धीराणां हृदयावष्टम्भाः । यतस्तं राजा 'भवत्सिद्ध्यैव परिसमाप्तकृत्योऽस्मि । साधयतु मान्यो यथासमीहितं स्थानम्' इति प्रत्याचचक्षे । तथोक्तश्च भूभुजा जिगमिषुः सुदृढं समालिङ्ग्य टीटिभादीन् कुवल- यवनेनेवावश्यायशीकरस्राविणा सास्रेण चक्षुषा वीक्षमाणः क्षितिपतिं

कुण्डलं कर्णवेष्टनम् । हारो मुक्ताहारः । केयूरमङ्गदं दोर्भूषा । फल्गुसारम् । प्रत्याचचक्षे पर्यहार्षीत् ।

यह सुनकर राजा हृदय में अत्यन्त प्रसन्न हुआ । लक्ष्मी के उस वचन से और अपने भलो भाँति किए कर्म से भैरवाचार्य भी शीघ्र सुन्दर बाल, मुकुट, कुण्डल, हार, केयूर, करधनी, मुद्गर, दण्ड और खड्ग धारण करके विद्याधर-योनि को प्राप्त हुआ । भैरवाचार्य ने राजा से कहा—'राजन्, सारहीन चित्त वाले मन्द लोगों के मनोरथ दूर तक नहीं होते, लेकिन सज्जनों के उपकार पृथिवी में फैले हुए होते हैं । जिसकी सम्भावना स्वप्न में भी नहीं की जा सकती ऐसी दक्षिणा आपके अतिरिक्त कौन दे सकता था ? सम्पत्ति के कण को पाकर तराजू के समान छोटी प्रकृति वाले लोग ऊपर उठ जाते हैं । आपके ही गुणों को उपकरण बनाकर आपसे ही जो मैं लाभवान् बना उससे ही मूढहृदय होकर निर्लज्ज बन गया हूँ । इसलिए अपने आपको स्मरण रखने के लिए थोड़ा भी कार्य करना चाहता हूँ ।' धीर पुरुषों के हृदय की गम्भीरता में प्रत्युपकार का प्रवेश करना कठिन होता है । जैसा कि राजा ने उत्तर दिया—'आपकी सिद्धि हो जाने में ही मैं कृतकृत्य हो गया । अब आप अपने अभिलषित स्थान में जाँय ।' इस प्रकार राजा के कहने पर भैरवाचार्य जाने के लिए तैयार हो गया । टीटिभ आदि का आलिङ्गन करके ओस टपकाते हुए कुवलयवन के समान आँसू से भरी आँखों