हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० हर्षचरितम् खण्डिनीम् , अतिनिशितशस्त्रधारावनभ्रमणविभ्रमसिंहीम् , असिधारा- जलकमलिनीं श्रियम् । अपहृतास्मि तवामुना शौर्यरसेन । याचस्व । ददामि ते वरमभिलषितम्' इति । वीराणां त्वपुनरुक्ताः परोपकाराः । यतो राजा तां प्रणम्य स्वार्थवि- मुखो भैरवाचार्यस्य सिद्धिं ययाचे । लक्ष्मीस्तु देवी प्रीततरहृदया विस्ती- र्यमाणेन चक्षुषा क्षीरोदेनेवोपरि पर्यस्तेनाभिषिञ्चन्ती भूपालम् 'एवमस्तु' इत्यब्रवीत् । अवादीच्च पुनः—'अनेन सत्त्वोत्कर्षेण भगवच्छिवभट्टारक- भक्त्या चासाधारणया भवान्भुवि सूर्याचन्द्रमसोस्तृतीय इवाविच्छिन्नस्य प्रतिदिनमुपचीयमानवृद्धेः शुचिसुभगमान्यसत्यत्यागशौर्यशौण्डपुरुषप्रका- ण्डप्रायस्य महतो राजवंशस्य कर्ता भविष्यति । यस्मिन्नुत्पत्स्यते सर्व- द्वीपानां भोक्ता हरिश्चन्द्र इव हर्षनामा चक्रवर्ती त्रिभुवनविजिगीषुर्द्वितीयो मान्धातेव यस्यायं करः स्वयमेव कमलमपहाय ग्रहीष्यति चामरम्' इति वचसोऽन्ते तिरोबभूव । अपुनरुक्ता भूयो भूयः क्रियमाणापि चेत्यर्थः । परोपकारकरणपरत्वेन प्रीतत्वम्। अभिषिञ्चन्तीति । अभिषेको राज्ञ उचितः । शौण्डः प्रसक्तः । प्रकाण्डशब्दः प्रशंसा- वाची । द्वितीयः स्पर्द्धावान् । के उज्ज्वल आतपत्रों में मढ़ी जाने वाली मैं मोरनी हूं। शस्त्रों की तेज धारा के वनों में विहरण करने वाली सिंहिनी हूँ। तलवारों के धाराजल में खिलने वाली मैं कमलिनी हूँ। तेरे इस पराक्रम को देखकर खिंच आई हूँ। माँग, तुझे अभिलषित वर दूँगी।' वीर परोपकार की प्रतिज्ञा करके कभी नहीं मुकरते। स्वार्थ से विमुख होकर राजा ने प्रणाम करके भैरवाचार्य की सिद्धि के लिए वर माँगा। लक्ष्मी प्रसन्न होकर एकटक उसे देखने लगी और मानों दूध से अभिषेक करती हुई राजा से बोली—'यही हो।' और फिर कहा—'राजन्, अपने बल के इस उत्कर्ष से और भगवान् शिव भट्टारक की असाधारण भक्ति से तेरा महान् राजवंश होगा जो सूर्य और चन्द्रमा के बाद तीसरा स्थान प्राप्त करेगा। अविच्छिन्न चलता हुआ प्रतिदिन बढ़ता ही जायगा और उस वंश में प्रायः पवित्र, सुभग, मान्य, सत्य, त्याग और वीरता में समर्थ पुरुष होंगे। उसी वंश में हरिश्चन्द्र के समान समस्त द्वीपों पर राज्य करने वाला चक्रवर्ती हर्ष उत्पन्न होगा जो दूसरे मान्धाता के समान त्रिभुवन को जीत लेने की इच्छा रखने वाला होगा। स्वयं मेरा यह हाथ कमल को छोड़कर उसका चँवर उठाएगा।' यह कहकर लक्ष्मी अन्तर्हित हो गई।