हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 238, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उच्छ्वासः १६३ नरपतिस्तु क्षोणभूयिष्ठायां क्षपायां, प्रवातुमारब्धे प्रबुध्यमानकमलि- नीनिःश्वाससुरभौ, वनदेवताकुचांशुकापहरणपरिहासस्वेदिनीव साव- श्यायशीकरे परिमलाककृष्टमधुकृति कुमुदनिद्रावाहिनि निशापरिणतिजडे तुषारलेशिनी वनानिले, विरहविधुरचक्रवाकचक्रनिःश्वसितसंतापिताया- मिवापरजलनिधिमवतरन्त्यां त्रियामायां, साक्षादागतलक्ष्मीविलोकनकु- तूहलिनीष्विव समुन्मीलन्तीषु नलिनीषु, उन्निद्रपक्षिणि क्षरति कुसुमवि- सरमिव तुहिनकणनिकरं मृदुपवनलासितलते कानने, कमललक्ष्मीप्रबो- धमङ्गलशङ्खेष्विव ॰ रसत्स्वन्तर्बद्धध्वनमधुकरेषु मुकुलायमानेषु कुमुदेषु, उज्जिहानरविरथवाजिविसृष्टैः प्रोथपटुपवनैः प्रोत्सार्यमाणास्विव वारुण्यां ककुभि पुञ्जीभवन्तीषु श्यामालताकलिकासु तारकासु, मन्दरशिखराश्र- यिणि मन्दानिललुलितकल्पलतावनकुसुमधूलिविच्छुरित इव धूसरीभवति सप्तर्षिमण्डले, सुरवारणाङ्कुश इव च्युते गलति तारामये मृगे त्रीनपि टीटिभादीन्गृहीत्वा नागयुद्धव्यतिकरमलीमसानि शुचिनि वनवापीपयसि
वनेश्यादौ। अस्मिन्नस्मिन्सति नरपतिर्नगरं विवेशेति सम्बन्धः। क्षीणभूयिष्ठायां बहुतरं क्षीणायाम्। तुषारस्य शीतस्य लेशाः सन्ति तत्र तस्मिन्नीषच्छीतले। संतापितायामिवेति। संतापितश्च शीतलंस्थानमवतरन्ति। कुसुमविसरमिवेति समो- पमा। लासिता नर्तिता। उज्जिहान उद्गच्छन्। श्यामा रात्रिः, सैव लता व्रततिः।
अब तक रात बहुत ढल चुकी थी। जागती हुई कमलिनों के निश्वास की सुगन्ध से भरी हुई, वनदेवता के स्तन के वस्त्र को उड़ा लेने के परिहास में तर बतर हुई सी और तुषार के फुहारों से युक्त, सुगन्ध से भौरों को खींचती हुई और कुमुदों को सुलाती हुई, रात्रि के अवसान में ठण्डी वन की हवा बहने लगी। विरह से पीड़ित चक्रवाकों के निःश्वास से सन्ताप का अनुभव करती हुई रात पश्चिम समुद्र में उतरने लगी। मानों साक्षात् आई हुई लक्ष्मी को देखने के कुतूहल से कमलिनियाँ आँखें खोलने लगीं। जंगल के पक्षी जग पड़े। फूल के रूप में ओस पड़ रही थी। हल्की हवा से लताएँ नृत्य करने लगीं। कमल में निवास करने वाली लक्ष्मी के जागरण के लिए मंगल शंख के समान भीतर में बँधे हुए भौरे गुंजार रहे थे। कुमुद बन्द होने लगे। श्यामा लता की कली के समान तारे ऊपर आते हुए सूर्य के रथ के घोड़ों की थुथुन की तेज हवा से उड़ाये गए की तरह पश्चिम दिशा में पुंजीभूत होने लगे। मन्दराचल के शिखर पर पहुँचा हुआ सप्तर्षिमण्डल मन्द हवा से काँपती हुई कल्पलता के फूलों की धूल से धूसरित होने लगा। ऐरावत के अंकुश के समान मृगशिरा नक्षत्र नीचे चला गया। तब राजा ने १३ ह० च०